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पीहू की कहानियाँ – 4

ऐसा भी लगा था कि ये फ़िल्म शायद शूट नहीं कर पाएँगे

पीहू की शूटिंग के लिए हमें बहुत कुछ नॉन फ़िल्मी करना था. हम सब जानते थे कि ये कोई रोज़ शूट होने वाली फ़िल्म नहीं है. ये एक अलग फ़िल्म है. एक दो साल की बच्ची के साथ पूरी फ़िल्म. इसके लिए हमने ख़ास तैयारियां भी की थी.

सबसे पहले ग्रेटर नोएडा की गंधर्व सोसायटी के नौवीं मंज़िल में एक घर लिया. बड़ा सा घर. उसी घर में भी पीहू की पूरी टीम रुकी थी. पीहू के परिवार के साथ. पूरी टीम शूटिंग से कम से कम दस दिन पहले ही उस घर में पहुँच गई थी. परिवार को भी पहले ही बुला लिया गया था.मक़सद ये था कि टीम , पीहू को जान सके और पीहू टीम को समझ सके. जिस फ़्लोर पर हमने घर लिया था, उसी फ़्लोर पर हमने शूटिंग वाला घर भी तैयार करना शुरू किया. शूटिंग वाले घर को आर्ट डायरेक्टर असीम चक्रवर्ती ने बहुत प्यार से बनाया . हमने पूरी कोशिश की कि शूटिंग वाला घर बिलकुल वैसा ही घर लगे , जैसे घर में पीहू अब तक रहती आयी थी. पीहू के कपड़े पीहू की चादर, पीहू के खिलौने, पीहू का सामान, पीहू का टूथ ब्रश, पीहू की डॉल, पीहू की साइकिल, पीहू का डॉगी सब कुछ उस घर में था.सरल शब्दों में , हमारी पूरी कोशिश थी कि पीहू को कभी लगे ही नहीं कि वो किसी दूसरे घर में आ गई है.

शूटिंग का दिन क़रीब आता जा रहा था और मैं वाक़ई बहुत घबराया हुआ था. आप यक़ीन नहीं करेंगे लेकिन ये सच है की शूटिंग से पहले पूरी टीम लगातार दिन रात कहानी और स्क्रिप्ट लेकर यही माथापच्ची करती रहती थी कि अमुक सीन को कैसे शूट किया जाएगा या कहें पीहू से वो अमुक सीन कैसे शूट करवाया जाएगा? हम लोगों ने एक पूरा ब्रेकअप बना लिया था और नोट्स भी तैयार थे, जिसमें बाक़ायदा लिखा होता था कि अमुक सीन पीहू से कैसे शूट करवाना है.

माता पिता प्रेरणा और रोहित अक्सर पीहू के बारे में बहुत ही ख़ास जानकारी दे देते थे, जिससे हमें लगता था कि शायद हम लोग 2 साल की बच्ची के साथ शूटिंग कर पाएंगे. लेकिन इसके बावजूद मन में डर बना हुआ था कि शायद शूटिंग न हो पाए और फ़िल्म हमें बीच में ही रोकनी पड़े. ये बात मैंने प्रोड्यूसर किशन को भी बता दी थी. उनसे साफ़ साफ़ कह दिया था कि हम लोग ईमानदारी से पाँच छह दिन पूरी कोशिश करके फ़िल्म को आगे बढ़ाएंगे लेकिन हो सकता है कि पाँच छह दिन के बाद अगर हमें ये एहसास होगा कि इस फ़िल्म की शूटिंग नहीं हो सकती है तो हम शूटिंग रोक देंगे. आप के कम से कम 14-15 लाख रुपये डूब सकते हैं. किशन भी दिलदार आदमी था. वो बोला हमारे हाथ में सिर्फ़ कोशिश है , नतीजा नहीं. जो करना है करो यार. चिंता की कोई बात नहीं. इसी दौरान किशन ने मुझे एक राज़ की बात बतायी. किशन ने बताया कि जिस दिन पहली बार मैंने किशन को पीहू की कहानी सुनाई थी और पूछा था कि कि क्या वो इस फ़िल्म में मेरी मदद करेंगे ? तब किशन के पास ख़ुद पैसों की बहुत कमी थी और किशन को उम्मीद भी नहीं थी कि उसके पास भविष्य में पैसा आने वाला है. फिर भी मेरा मन रखने के लिए किशन ने कह दिया की 2 दिन में बताता हूँ. ये जानते हुए कि उसके पास पैसा नहीं है. किशन ने बताया कि वो इसे चमत्कार ही मानेगा कि अगले 24 घंटे में उसके पास एक ऐसी जगह से पैसा आ गया , जिसे वो बिलकुल डूबा हुआ मान रहा था. किशन कहता था कि यार ये फ़िल्म नहीं है , ये एक्ट ऑफ़ गॉड ( act of God ) है और वो ही इसे करा रहा है. हम दोनों तो बस ज़रिया बने हुए हैं और देखना ये फ़िल्म शूट भी हो जाएगी.

कितना सही कहता था किशन. पर दुर्भाग्य ये है कि आज किशन ही अपनी पीहू का रिलीज नहीं देख पा रहा है. किशन की कहानी आगे बताऊँगा.

( जारी है )

अगले हिस्से में : शूटिंग का पहला दिन , 12 घंटे के शूट में 10 घंटे क्या होता था ?

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Girish Lohani

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