चित्र में दोनों बहिने, जिसमें दाई ओर मिस ब्लोसम हैं. फोटो : प्रो0 राकेश बेलवाल की फेसबुक वाॅल से साभार
रानीखेत रोड से बाजार की तरफ बढ़ने पर बाईं ओर एमईएस परिसर की तरफ पक्के पैराफिट से लगे कई कच्चे फड़ थे, जिसमें एक चाय की दुकान कोई वयोवृद्ध व्यक्ति की हुआ करती थी. चौगर्खा पट्टी के होने से लोग उन्हें चौगर्खिये की दुकान नाम से जानते थे, उनका नाम तो ज्ञात नहीं, लेकिन चाय लाजवाब बनाते. तब चाय अद्धी व गिलास में मिलती थी. जहां तक मुझे याद है बन तथा एक अद्धी चाय मलाई के साथ 10 पैसे की जब कि बिना मलाई की 8 पैसे में मिला करती. छात्र जीवन में कई वर्षों तक हमने इस चाय का खूब आनन्द लिया.
(History of Bhowali)
भवाली तिराहा, जिसे बेजवह चौराहा नाम दे दिया गया, वहां गोपाल दा की चाट व आलू की टिक्की की दुकान बहुत प्रसिद्ध थी, चौराहे पर पैराफिट में बैठकर कुछ लोग मूंगफली बेचा करते, बाकी पैराफिट यात्रियों व स्थानीय लोगों के बैठने व धूप सेंकने का अड्डा हुआ करत थे. जहां पर भवाली की लाजवाब करारी मॅूगफली ठॅूङने का अलग ही आनन्द था. पूरा तिराहा खुला-खुला था, गोपाल दा की चाट के फड़ के ठीक पीछे सीमेंट से बने गोले के व्यास पर सीमेंट से निर्मित अंग्रेजी के अक्षरों को आकार देकर भवाली लिखा दूर से ही नजर आता था.
रानीखेत रोड पर रोडवेज बसों की कतारें लगती थी और स्टेशन के टिकट काउन्टर से ही टिकट लेने का नियम था. स्टेशन के टिकट काउन्टर पर भी लम्बी कतारें लगी होती और तब के टिकट बाबू मोहन तिवारी हंसते-मुस्कराते प्रेम से निबटा जाते. टिकट भी अलग अलग स्थानों के नाम से मुद्रित अलग-अलग रौल टाइप में हुआ करते. उस समय के टिकटों में भवाली को भुवाली तथा कभी भोवाली मुद्रित होता. सही नाम क्या रहा होगा, यह खोज का विषय है. खोज का विषय तो यह भी है कि भवाली शहर से लगभग 5-6 किमी की दूरी पर स्थित भवालीगांव पहले वजूद में आया अथवा भवाली कस्बा ? इस संबंध में जब जानकारी जुटाने का प्रयास किया गया तो मूलतः भवालीगांव के तथा वर्तमान में नगर के वरिष्ठतम सामाजिक कार्यकर्ता तथा स्थानीय व्यवसायी घनश्याम सिंह बिष्ट पुरानी यादों को साझा करते हुए बताते हैं कि गांव में उनकी एक बूढ़ी दादी हुआ करती थी, जिनकी पैदाईश सन् 1860 की बताते थे और पूरे 100 वर्ष की आयु उन्होंने पूरी की. जब वे कभी-कभार बाहर जाती तो हम उनसे पूछते कहाॅ गई थी ? तो जवाब मिलता, दुगै (दुगई ) से आ रही हॅू.
यह दुगै अथवा दुगई और कोई नहीं बल्कि वर्तमान भवाली शहर का पुराना नाम था. वे आगे बताते हैं कि यहां किसी अंग्रेज का इस्टेट हुआ करता था, जिसमें चाय बागान भी थे. बाद के वर्षों में कस्बे के पूर्वी ढलान का एक हिस्सा तत्कालीन वकील एवं भारत सरकार के गृहमंत्री पं0 गोबिन्द बल्लभ पन्त व स्थानीय व्यक्ति नारायण दत्त भट्ट ने संयुक्त रूप से खरीदा और फिर इस खरीदी गई सम्पत्ति का बंटवारा दोनों के बीच हुआ, उसी जमीन पर पन्त इस्टेट बना.
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कस्बे का पूर्वी ढलान का एक बड़ा हिस्सा आज भी दुगई इस्टेट के नाम से ही जाना जाता है. उ0प्र0 के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक शैलन्द्र प्रताप सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट साझा करते हुए बताया है कि घोड़ाखाल से लेकर महरागांव तक यह क्षेत्र फ्रेडरिक नामक अंग्रेज का हुआ करता लेकिन बाद में घोड़ाखाल क्षेत्र को रामपुर के नवाब द्वारा रूपये में खरीद लिया गया. जिस भूमि में आज सैनिक स्कूल घोड़ाखाल है. दुगई का नाम भवाली (अतीत में इसे भोवाली व भुवाली भी बोला जाता था, अंग्रेजी वर्तनी के अनुसार तो आज भी भोवाली ही लिखा जाता है लेकिन हिन्दी में भवाली शब्द ही अब चलन में आ चुका है।) कब से दिया गया ये तो ज्ञात नही है, लेकिन पुराने बुजुर्ग बताते थे कि यहां कभी भांग के पौधों के भूड़ (झाड़ियां) हुआ करते थे, इसलिए इस जगह को भूड़वाली – भुवाली फिर भवाली कहा जाने लगा.
जब कि कुछ किंवदन्तियों के अनुसार पुरानी आरा मशीन के पास एक भौ (शिुश) वाली विधवा कभी रहा करती थी, उसी से इसका नाम भौ वाली से भोवाली पड़ा. यों भी किसी स्थान विशेष के इतिहास की जानकारी के लिए धार्मिक स्थल मुख्य स्रोत होते हैं. भवाली शहर में स्थित मैथोडिस्ट चर्च , देवी मन्दिर तथा सेनेटोरियम स्थित मस्जिद ही हमारी जानकारी हासिल करने के स्रोत हो सकते हैं. भवाली बाजार स्थित देवी मन्दिर भी एक स्रोत अवश्य है, लेकिन लोग बताते हैं, कि देवी मन्दिर लगभग 100 साल पुराना है. पचास के दशक के चित्र में जो छोटा मन्दिर दिखाई दे रहा है, आज यह भव्य रूप ले चुका है.
रही घोड़ाखाल गोल ल्यू मन्दिर की स्थापना का वर्ष, इसकी कोई निश्चित जानकारी तो नहीं है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना चन्द वंश के राजा बाजबहादुर चन्द द्वारा की गयी. बाजबहादुर चन्द का शासनकाल 1638ई0 से 1678ई0 तक माना जाता है. इस आधार पर गोलज्यू मन्दिर 350 से 400 वर्ष पुराना माना जा सकता है. इस नजरिये से भवाली कस्बे के वजूद में आने से पहले घोड़ाखाल का गोलज्यू मन्दिर रहा होगा. फिर नजर टिकती है मैथोडिस्ट चर्च व मस्जिद पर. कयास ये लगाया जा सकता है कि जब भवाली सेनेटोरियम की 1912 में स्थापना हुई तो उसमें नियुक्त अधिकांश मुलाजिम अंग्रेज तथा कुछ मुस्लिम समुदाय के लोग भी रहे होंगे,इसलिए उन्हीं की सुविधा के लिए मैथोडिस्ट चर्च तथा सेनेटोरियम के पास मस्जिद का निर्माण हुआ होगा.
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साठ के दशक तक तिराहे के पैराफिट्स में बैठकर हल्द्वानी तथा नैनीताल की ओर से आने वाली गाड़ी दूर से ही दिख जाती थी, जो आज भवनों की ओट से ढक चुका है. सामने सीमेंट से बने वृत्ताकार घेरे में बीचों बीच अंग्रेजी में सीमेंट से ही अक्षरों को आकार देकर भवाली लिखा हुआ दूर से नजर आता था, जो अब दुकानों की ओट में छिप चुका है.
वहीं पीठ की ओर एमईएस परिसर में समय समय पर अल्पकाल के लिए बाहर आने वाले फौजियों से गुलजार रहता. उन्हें विशेष प्रकार की टिन की सफेद रंग की एनामेल्ड प्लेटें व कप थामे मैस के सामने कतारबद्ध देखना रोमांचक अनुभव था. तब चौराहे से नैनीताल रोड की ओर बढ़ने पर दाईं ओर थाने के गधेरे तक केवल पैराफिट थे, कोई भवन नहीं थे, जब कि बाई ओर जहां आज टूरिस्ट होटल है, यहां पर एक मेडिकल स्टोर भी हुआ करता था.
साठ के दशक में रैतखान के पाण्डे जी द्वारा इस जगह को खरीकर टूरिस्ट होटल का निर्माण किया गया, तब यह भवाली के आलीशान भवन में शुमार था. वर्तमान पोस्ट ऑफिस जाने वाले रास्ते के बाईं ओर शंकर दत्त जोशी जी की दुकान हुआ करती, जो नैनीताल रोड की अन्तिम दुकान थी. बगल में केमू का दफ्तर होने से केमू का यह स्टेशन भी था, जहां बाकायदा केमू के टिकट बाबू तिवारी जी बैठा करते. केमू का टिकट भी काउन्टर से ही दिया जाता था. केमू स्टशेन, पोस्टआफिस आदि की वजह से दुकान अच्छी चलती थी. स्टेशन के पास ही राजेन्द्र फ्रूट मार्ट नाम से फलों की दुकान थी, वही राजेन्द्र सिंह जिन्होंने लम्बे समय तक भवाली की रामलीला में रावण का किरदार निभाया था. इस पूरे क्षेत्र की एकमात्र स्टेट डिस्पेन्सरी, पोस्टआफिस के ऊपर भट्ट जी के भवन में चलती, जहां लम्बे समय तक डॉ. आन सिंह बिष्ट, एक कुशल व चर्चित चिकित्सक के रूप में जाने जाते रहे। जिन पर अलग से आलेख काफल ट्री में प्रकाशित हो चुका है.
यहां देखें : भवाली के लोग भूले नहीं हैं डॉ. आन सिंह को
उस दौर में जब आप भवाली चौराहे पर बैठे हों और ब्लोसम (प्रचलित नाम बिलोसन) से आपकी मुलाकात न हो, नामुमकिन है. बीड़ी- सिगरेट अथवा दस पईंसा दे दो, की गुजारिश करते हुए ब्लोसम (बिलोसन) का हुलिया शहर में पहली बार आये, अजनबी को तो यह सोचने को विवश कर ही देता कि आखिर यह औरत है कि मर्द.
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नाम भी ऐसा कि सहज ही कोई राय बना लेना मुश्किल. मर्दों की तरह बॉयकट छोटे तथा काले व सफेद बालों की खिचड़ी, जो अक्सर बेतरतीब बिखरे रहते, पुरूष होने का भ्रम कराते. ऊपर के शरीर में एक बेढंगी पहनी हुई लटकती कमीज, जिसके बटन और काज के बीच सामंजस्य शायद कम ही होता, नीचे पैंट तथा चेहरे पर दाड़ी के छिटपुट बाल और मर्दों की सी मूंछें, उस पर भी बीड़ी अथवा सिगरेट का धुंआ उड़ाते हुए चलना, पुरूष होने का पूरा अहसास करा देते। ज्यों ही जुबान खुलती तो एक औरत की आवाज सुनकर संशय गहरा जाता, नजर कानों पर लटकी टॉप्स पर टिकती तो औरत होने का सबूत पुख्ता होकर यकीन में बदल जाता.
ब्लोसम की एक बहिन ब्लांची भी साथ रहती जो शारीरिक रूप से अपाहिज थी. दोनों बहिनें कुंवारी थी. बताते हैं कि ब्लोसम ही परिवार का भरण-पोषण करती थी जब कि वह मेरज जनरल व्हीलर के परिवार की निकट संबधी थी और दुगई इस्टेट में मि0 बीनलैण्ड के कॉटेज के समीप रहती थी. हर इन्सान से उसके हुलिये के अनुसार ही वह उससे बात करती. सामान्य लोगों से हिन्दी में जब कि जिसे वो संभ्रान्त अथवा पढ़ा लिखा समझती, धाराप्रवाह अंग्रेजी में बोलती.
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प्रो0 राकेश बेलवाल बताते हैं कि वह कॉन्वेन्ट स्कूल से पढ़ी थी और एक अच्छी गायिका भी थी, लेकिन परिवार से सहयोग न मिलने के कारण जीवन का उत्तरार्द्ध अभावों व संघर्षों में बिताया. हालांकि उनकी एक बहिन मौलि काठगोदाम में छात्रावास संचालित करती थी, शायद उनके सहयोग से भी वह महरूम ही रही. अस्सी के दशक तक भवाली की गलियों में चक्कर लगाती ब्लोसम अक्सर मिल जाया करती थी, लेकिन कब ये भवाली से अलविदा कर गयी, इसकी सही-सही जानकारी नहीं है. नैनीताल के लोग बताते है कि वहां भी वह अंग्रेज मैम नाम से चर्चित थी.
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पिछली क़िस्त : आज़ादी के बाद भवाली के इतिहास के पन्ने और मां काली के उपासक श्यामा बाबा
भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.
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