Featured

हल्द्वानी में यादों की बरात और शेट्टी की खोपड़ी

नाहिद में ‘यादों की बारात’ लगी थी. जमाने के टाइम के तकाज़े के हिसाब से हम चार दोस्त जीनातमान के जलवे और धरमेंदर की सनातन हौकलेटपंथी देखने के उद्देश्य से सेकंड क्लास की सबसे आगे की सीटों पर काबिज़ थे. टिकट पांच लिए गए थे पर नब्बू नहीं आ सका था. हममें से सबसे स्याने घनसियाम उर्फ मुर्गन उस्ताज ने पांचवां टिकट ब्लैक में निकाल लेने में सफलता हासिल कर ली थी. पिक्चर शुरू होने तक वे महात्मा नहीं आये थे जिन्हें मुरुगन ने टिकट बेचा था. (Hindi Cinema Memoir Ashok Pande)

पन्द्रह मिनट बाद ठीकठाक डीलडौल वाला, डगमग कदमों चलता एक साया मेरी बगल वाली ब्लैक टिकट सीट पर धंसा और ठीक दस सेकंड के भीतर मुंह पर गमछा डालकर बाकायदा सो गया. एक मिनट बाद उसके खर्राटे शुरू हो गए. मैं थोड़ी देर को असमंजस में आ गया लेकिन जीनातमान के जलवे उस असमंजस पर भारी पड़े. मेरा ध्यान तब टूटा जब उस साए ने गमछा अपने मुंह से हटाकर मुझसे फुसफुसाते हुए पूछा – “ओये लौंडे, ओ धरमेंदर ने शेट्टिया की खोपड़ी फोड़ दी क्या?” मेरे ना कहने पर वह फिर निद्रालीन हो गया. (Hindi Cinema Memoir Ashok Pande)

इंटरवल हुआ पर वह सोया रहा. मरियल पीली रोशनी में वह वाकई पहलवान लग रहा था. मूमफली, पपन करारे और ठंडी कोल्डींग बेचनेवालों की पुकारें भी उसके मुंह से गमछा न उठवा सकीं. हम चारों दोस्तों ने बाहर सिगरेट का लुत्फ़ लेते हुए गमछाधारी के बारे में एकाध अश्लील मज़ाक किये. हॉल के भीतर उसका मज़ाक उड़ा सकने की हमारी हिम्मत नहीं पड़नी थी क्योंकि हम चार मिलकर उसकी एक जांघ के बराबर नहीं बैठते थे.

कोई एक घंटे की खर्राटाच्छादित नींद बाद गमछा फिर से हटा और फुसफुसाते हुए पहलवान ने पूछा – “ओ धरमेंदर ने शेट्टिया की खोपड़ी फोड़ दी क्या बे लौंडे?”

इस दफा मैंने हाँ में मुंडी हिलाई.

“हाट्ट साला. वही तो देखना था. फिर रह गया!”

एक मोटी गाली देकर खीझते हुए पहलवान ने पहले ज़मीन पर ख़ूब सारा थूका और उसके बाद हॉल के बाहर का रुख किया.

अशोक पाण्डे

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

शराब की बहस ने कौसानी को दो ध्रुवों में तब्दील किया

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्म स्थली कौसानी,आजादी आंदोलन का गवाह रहा कौसानी,…

2 days ago

अब मानव निर्मित आपदाएं ज्यादा देखने को मिल रही हैं : प्रोफ़ेसर शेखर पाठक

मशहूर पर्यावरणविद और इतिहासकार प्रोफ़ेसर शेखर पाठक की यह टिप्पणी डाउन टू अर्थ पत्रिका के…

3 days ago

शराब से मोहब्बत, शराबी से घृणा?

इन दिनों उत्तराखंड के मिनी स्विट्जरलैंड कौसानी की शांत वादियां शराब की सरकारी दुकान खोलने…

3 days ago

वीर गढ़ू सुम्याल और सती सरू कुमैण की गाथा

कहानी शुरू होती है बहुत पुराने जमाने से, जब रुद्र राउत मल्ली खिमसारी का थोकदार…

3 days ago

देश के लिये पदक लाने वाली रेखा मेहता की प्रेरणादायी कहानी

उधम सिंह नगर के तिलपुरी गांव की 32 साल की पैरा-एथलीट रेखा मेहता का सपना…

4 days ago

चंद राजाओं का शासन : कुमाऊँ की अनोखी व्यवस्था

चंद राजाओं के समय कुमाऊँ का शासन बहुत व्यवस्थित माना जाता है. हर गाँव में…

4 days ago