वाह-वाह,वाह जी वाह,हमने सरकार क्या चुनी,चमत्कार चुने हैं. पहले लोग कहते थे कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी थोड़े है,जो पल भर में समस्याओं को हल कर दे. लेकिन उत्तराखंड में तो लगता है,सरकार वालों के पास जादू की छड़ी ही है जिससे समस्याएँ पल भर में काफ़ूर हो जाएँगी !
आप पूछते हैं – कैसे ? अजी, संसद-विधानसभा में बैठे हमारे भाग्य विधाता बतियाते हैं – वैसे ! जिस तरह के रामबाण, अचूक नुस्खे उत्तराखंडी वीरों ने संसद-विधानसभा में बताए हैं, अगर वे जमीन पर लागू हो जाएँ तो मुमकिन है कि आने वाले सालों में कोई समस्या ही न बचे ! हमारी यही समस्या रह जाये कि हमारी कोई समस्या नहीं है.
अब देखिये ना, उत्तराखंड के नैनीताल लोकसभा सीट से संसद पहुंचे हुए सांसद महोदय ने बताया कि गरुड़गंगा के पत्थर से बिना ऑपरेशन के आसानी से प्रसव हो जाता है. सरकार के सुरक्षित प्रसव की सारी योजनाओं पर होने वाले करोड़ों रुपये के खर्चे को सांसद महोदय ने एक झटके में कम क्या खत्म कर डाला. अस्पताल नहीं चाहिए,उसमें डाक्टर नहीं चाहिए,दवा नहीं,सर्जिकल इन्स्ट्रूमेंट्स भी नहीं ! बस गरुड़ गंगा से लाया गया एक अदद पत्थर और हो गया बिना ऑपरेशन के सुरक्षित प्रसव. तो भई जिसके भी घर में प्रसूता हो, अस्पताल की खोज में मत जाओ, एंबुलैंस मत खोजो, आशा कार्यकत्री के चक्कर में मत पड़ो. जाओ तो बस गरुड़ गंगा जाओ और वहाँ से गंगलोड़ा ले कर आओ.
प्रसूताओं के परिवार का एक निशाना, गरुड़गंगा से गंगलोड़ा लाना ! वाह भई वाह, इस फॉर्मूले ने तो “हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा आए” वाले मुहावरे को मात दे दी है. अस्पताल चाहिए न सर्जरी, गरुड़गंगा के गंगलोड़े से प्रसव हो जाये ! ऐसे चमत्कारी सांसदों की जय हो, अजय तो ये नाम से हैं ही!
सब समस्याओं को छड़ी घुमा कर गायब करने का फॉर्मूला उत्तराखंड सरकार भी रखती है. देवप्रयाग में शराब की फ़ैक्ट्री लगवा रही है,उत्तराखंड सरकार. देवप्रयाग के महातम्य में तीसरा डाइमैन्शन जोड़ दिया है उत्तराखंड में बैठी “रामजादों” की सरकार ने. अब तक देवप्रयाग केवल अलकनंदा और भागीरथी नामक नदियों का संगम था. इन दोनों के मेल से यहाँ गंगा बनती थी. अब अलकनंदा और भागीरथी के साथ शराब का संगम भी करा दिया, उत्तराखंड सरकार ने.
अब तक पानी ऊपर से बहता था, दारू नीचे से बन कर आती थी. अब पानी और दारू संग-संग बह सकते हैं. पुराना गीत था- जमाने से कह दो अकेले नहीं हम,हमारे संग-संग चली गंगा की लहरें. अब गंगा ही जमाने से कहेगी- अकेले नहीं हम,हमारे संग-संग चली हिल टॉप की बोतलें ! जी हाँ, यहाँ बनने वाली ब्रांड का नाम-हिल टॉप बताया जा रहा है.
और सुनिए,देवप्रयाग के संगम में सिर्फ अलकनंदा-भागीरथी और हिल टॉप का संगम मात्र ही नहीं होगा. मुख्यमंत्री जी का दावा है कि संगम में हिल टॉप का मेल होते ही रोजगार की धारा बह निकलेगी. सरकारों का कौशल देखिये, राज्य की आय से लेकर रोजगार तक, सबके लिए उन्हें केवल शराब से ही आस है. इस आस में शराब के नित नयें धारे फूटते रहते हैं. आय और रोजगार, शराब वालों के हिस्से तो खूब आता ही है !
मुख्यमंत्री जी के एक मंत्री का तो कहना है कि पहाड़ के किसानों की सब समस्याओं का हल यही संगम वाली हिल टॉप है. खेती हो नहीं रही, सूअर, बंदर, बाघ, भालू का आतंक है. खेती का रकबा निरंतर घट रहा है. पहाड़ में खेत ही नहीं गाँव के गाँव बंजर हो रहे हैं. मंत्री जी कह रहे हैं कि इन सब समस्याओं का हल निकालने को तो खोली जा रही है – शराब की फ़ैक्ट्री. मंत्री जी कह रहे हैं – कोदा(मंडुवा) झंगोरा, नींबू, माल्टा सब का सब शराब फ़ैक्ट्री के काम आएगा. उत्तराखंड राज्य आंदोलन में लोग नारा लगाते थे – कोदा, झंगोरा खाएँगे, उत्तराखंड बनाएँगे. अब नया नारा होगा – कोदा,झंगोरा देवप्रयाग ले जाएँगे, हिल टॉप घर-घर पहुंचाएंगे ! यह तय है कि कोदा, झंगोरा जितना भी उगे पर उन्हें उगाने वाले हाथों में सरकार हिल टॉप तो पहुंचा ही देगी. अब तक के उदाहरणों से साफ है कि यही काम सरकार बखूबी कर सकती है. पानी का नल पहुंचे न पहुंचे पर दारू की सप्लाई में कोई हीलहवाली सरकार कतई बर्दाश्त नहीं करती है.
शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार,सड़क,बिजली,पानी सब का एक ही हल,घर-घर लगे हिल टॉप का नल ! इस तरह से राज्य की सब समस्याओं का हल,हिल टॉप के नल में निहित है. मंत्री जी ने तो यह भी बताया कि पिछली सरकार ने भी यह मंसूबा बांधा था पर केवल बात ही होती रही. मंत्री जी की बात पर कोई संशय नहीं होना चाहिए क्यूंकि वे पिछली सरकार में भी मंत्री थे,इस सरकार में भी हैं. तो कथा का सार यह है कि हिल टॉप का हरीश रावत का ख़्वाब अधूरा, त्रिवेन्द्र रावत करेंगे पूरा !
(इन्द्रेश मैखुरी की फेसबुक वॉल से)
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