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हेमवती नंदन बहुगुणा: राजनीति के शिखर पर पहाड़ का सितारा

भारतीय राजनीति में हेमवंती नंदन बहुगुणा को चाणक्य का दर्जा दिया जाता है. उन्हें दूरदर्शी, जनप्रिय नेता माना जाता है. उनके राजनीतिक विवेक के कायल विरोधी तक हुआ करते थे. वे आजादी के आन्दोलन की अग्रणी पांत में रहे. वे विधानसभा सदस्य रहे, उत्तर प्रदेश विधानसभा सदस्य रहे. अखिल भारतीय कांग्रेस समिति और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के भी सदस्य रहे. मंत्रिमंडल महासचिव, समाज कल्याण विभाग के पार्लियामेंट सेकेरेट्री, उद्योग विभाग के उपमंत्री, श्रम विभाग के उपमंत्री, वित्त व परिवहन मंत्री, केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री, केन्द्रीय मंत्रिमंडल में पेट्रोलियम, रसायन तथा उर्वरक मंत्री, केन्द्रीय वित्त मंत्री रहे. 2 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे.

25 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश शासन के दौरान पौड़ी के बुधाणी गाँव में हेमवंती नंदन बहुगुणा का जन्म हुआ. उस समय देश में राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर थी. आजादी के आन्दोलन की विभिन्न धाराओं का दौर था. बहुगुणा भला इससे अछूते कैसे रह सकते थे. डीएवी कॉलेज में उच्च शिक्षा हासिल करने के दौरान वे लाल बहादुर शास्त्री के सान्निध्य में आए.

लाल बहादुर शास्त्री के संपर्क से राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले बहुगुणा जल्द ही छात्र आंदोलनों के अगुवा बन गए. वे 1936 के बाद लगातार छात्र राजनीति में सक्रिय रहे.

1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान उनकी सक्रियता से अंग्रेज काँप उठे. बहुगुणा के सर पर 5 हजार रुपये का ईनाम रख दिया गया, जिंदा या मुर्दा. करीब एक साल बाद बहुगुणा दिल्ली में गिरफ्तार किये जा सके. इस बीच वे अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर लगातार आजादी के आन्दोलन में सक्रिय रहे.

हेमवंती नंदन बहुगुणा 1945 में जेल से रिहा हुए और पुनः आजादी की लड़ाई में सक्रिय हो गए. उन जैसे ढेरों सूरमाओं की बदौलत आखिरकार देश आजाद हुआ.

आजादी के बाद हेमवंती नंदन बहुगुणा मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हो गए. उन्होंने 1952 के बाद से ही बहुगुणा उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के सदस्य बने रहे. 1958 में उद्योग उपमंत्री रहे. कई सालों तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव रहे.

1967 के आमचुनाव के बाद उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कांग्रेस के महामंत्री जैसा जिम्मेदार और महत्वपूर्ण पद दिया गया.

1969 में इंदिरा गाँधी के खिलाफ बगावत हुई और कांग्रेस 2 हिस्सों में बंट गयी. इस समय बहुगुणा ने इंदिरा गाँधी के साथ मजबूती से खड़े रहकर कांग्रेस को मजबूती और स्थायित्व प्रदान किया.

1971 में वे केंद्र सरकार को मजबूती प्रदान करने की गरज से पहली दफा सांसद बने, उन्हें संचार विभाग का दायित्व मिला.

इसके बाद इंदिरा गाँधी ने उन्हें उत्तर प्रदेश में हाशिये पर चल रही कांग्रेस में जान फूँकने का जिम्मा सौंपा. बहुगुणा ने न सिर्फ कांग्रेस में जान डाली बल्कि चुनाव भी जितवाया.

आपातकाल के दौर में बहुगुणा की इंदिरा गाँधी के साथ अनबन हुई. कहा जाता है कि बहुगुणा संजय गाँधी के लम्पट रवैये से क्षुब्ध थे. नतीजा 1977 के आम चुनावों में बहुगुणा की बगावत के रूप में सामने आया. बहुगुणा और जगजीवन राम ने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी पार्टी का गठन किया और 28 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की. इस पार्टी का जनता पार्टी में विलय हुआ.

जनता पार्टी के बिखर जाने के बाद बहुगुणा 1980 में पुनः कांग्रेस में शामिल हुए. चुनाव लड़ा और जीते भी. इंदिरा के दुर्वयवहार से आहत होकर एक बार फिर कांग्रेस के साथ-साथ लोकसभा सदस्यता भी त्याग दी.

1984 के चुनाव में बहुगुणा जैसे कद्दावार नेता राजनीति के नौसिखिये अमिताभ बच्चन से चुनाव हार गए.

इस हार और देवीलाल से मनमुटाव के चलते बहुगुणा राजनीति छोड़कर पर्यावरण के लिए काम करने लगे. 17 मार्च 1989 को भारतीय राजनीति के इस सितारे का निधन हो गया.

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Sudhir Kumar

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