अगर इतिहास में एक ऐसे व्यक्ति की खोज की जाय जो उत्तराखंड का हो और पहला ऐसा व्यक्ति हो जिसने आजाद भारत की राजनीति में अपना अलग नाम किया हो तो एक महत्वपूर्ण नाम आता है हेमवती नंदन बहुगुणा का. हेमवती नंदन बहुगुणा वह राजनेता हैं जिन्होंने हमेशा स्वयं को प्रासंगिक बना कर रखा.
वरिष्ठ पत्रकार जनार्दन ठाकुर की किताब ‘आल द जनता मेन’ में 25 अप्रैल 1919 को जन्मे हेमवंती नंदन बहुगुणा से जुड़ा एक किस्सा यूं है –
1951 में जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने. इसके बाद उनका इलाहाबाद का दौरा होना था. लाल बहादुर शात्री ने इलाहबाद में नेहरू के स्वागत की जिम्मेदारी हेमवती नंदन बहुगुणा को सौंपी. बहुगुणा ने टंडन पार्क में भीड़ जमा करने के लिये अपना पूरा दमख़म लगा दिया. लेकिन जब नेहरू आये तो बहुगुणा को आगे नहीं जाने दिया गया. बहुगुणा पीछे हो गए और चाट खाने लगे. अचानक बत्ती चली गयी. अंधेरे बहुगुणा-बहुगुणा की आवाजें उठने लगी. बहुगुणा भागते हुए मंच पर पहुंचे जैसे बहुगुणा ने मंच पर पैर रखा बत्ती वापस आ गयी. नेहरू की उपस्थिति में ही बहुगुणा जिंदाबाद के नारे लगने लगे.
कुछ लोगों का मानना है कि बहुगुणा ने स्वयं ही बत्ती गुल करवा दी थी. खैर इस घटना का एक प्रभाव यह रहा कि बहुगुणा नेहरू की नजरों में भी आ गये. 1952 का चुनाव था राजकुमारी अमृत कौर को मंडी से टिकट मिला. तीन दिन में कभी पहाड़ में न रही अमृत कौर ने नेहरू को दिल्ली में फोन लगाकर कहा कि तुमने हमें ये कहा भेज दिया है, मदद के लिये तुरंत किसी को भेजो.
नेहरू ने शास्त्री को बुलाया और पूछा वो इलाहाबाद वाले पहाड़ी लड़के का नाम क्या था? शास्त्री ने कहा बहुगुणा. नेहरू ने कहा उसे तुरंत राजकुमारी की मदद के लिये मंडी भेजो. बहुगुणा स्वयं मंडी से परिचित नहीं थे इसके बावजूद दो महिने उन्होंने ऐसा काम किया कि राजकुमारी अमृत कौर भारी मतों से चुनाव जीत गयी और बहुगुणा का कद न केवल इलाहबाद में बल्कि दिल्ली भी बड़ गया.
हेमवती नंदन बहुगुणा भारत के उन नेताओं में थे जिन्होंने इंदिरा युग में भी इंदिरा गांधी के सामने कभी नतमस्तक नहीं हुए. बीबीसी को दिये अपने एक इंटरव्यू में बहुगुणा स्वयं बताते हैं कि 1974 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के पहले दिन से ही उनके और इंदिरा के बीच मतभेद हो गये थे. इंदिरा गांधी चाहती थी कि बहुगुणा बिना किसी सवाल जवाब के उनका कहा हुआ मानें और उनके बेटे संजय गांधी को और राज्यों के मुख्यमंत्री की तरह राज्य घुमायें. बहुगुणा ने सीधा शब्दों में कहा बैक सीट से ड्राइविंग नहीं हो पायेगी.
राजनीति में नये प्रयोग और हमेशा सुर्ख़ियों में रहने वाले नताओं में शुमार हेमवती नंदन बहुगुणा के विषय में एक किस्सा यह भी मशहूर है कि जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगायी तो हेमवंती नंदन बहुगुणा ने दिल्ली में इंदिरा गांधी को सदबुद्धि देने के लिये जागर का आयोजन किया.
1984 में हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ इलाहाबाद से राजीव गांधी ने अभिताभ बच्चन को उतारा. बहुगुणा के समर्थन में नारे चले
हेमवती नंदन इलाहबाद का चंदन.
दम नहीं है पंजे में, लंबू फसा शिकंजे में.
सरल नहीं है संसद में आना, मारो ठुमका गाओ गाना.
इस चुनाव में बच्चन ने बहुगुणा को 1 लाख 87 हजार वोट के अंतर से हराया था. इसके कुछ वर्षों बाद ही हेमवती नंदन बहुगुणा ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया.
काफल ट्री डेस्क
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