समाज

पिथौरागढ़ का हनुमान मंदिर

वर्तमान में पिथौरागढ़ नगर के लगभग बीचों बीच एक हनुमान का मंदिर है. 1970 में जब इस मंदिर का निर्माण हुआ उस समय यह मुख्य नगर से बिलकुल हटकर एक कोने की ओर था. कुमौड़ गांव से लगे इस मंदिर के निर्माण और विकास कार्य को पिथौरागढ़ की दो पीढ़ियों ने अपने सामने देखा है. वर्तमान में इस मंदिर की पूरे नगर में मान्यता है हर मंगलवार को मंदिर में उमड़ी भीड़ इसका प्रमाण है.

इस हनुमान मंदिर की स्थापना बाबा नीम करोली द्वारा बताई जाती है. कहा जाता है कि उत्तराखंड में अपनी विभिन्न यात्राओं के दौरान बाबा नीम करोली ने काकड़ी घाट में मंदिर की स्थापना के बाद इस मंदिर निर्माण के आदेश दिये. शंकर दत्त जोशी ( उप जिलाधिकारी ) मंजुल कुमार जोशी ( गृह सचिव जेल उत्तराखंड ) रमेश चन्द्र पांडे ( वकील ), बिहारी लाल शांति प्रसाद, हीरालाल साह और बसंत लाल साह के सहयोग से 1970 में विजयादशमी के दिन हनुमान मंदिर की स्थापना की गई.

इस मंदिर की स्थापना के बारे में कहा जाता है कि इसकी स्थापना के कुछ सालों बाद एक चर्चा के दौरान बाबा नीम करोली से किसी ने कहा कि यह मंदिर शहर से बहुत दूर हो गया है. इस पर बाबा नीम करोली ने कहा कि मंदिर स्वयं एक दिन शहर के बीचों बीच आ जायेगा. वर्तमान संदर्भ में यदि देखा जाये तो बाबा नीम करोली की बात सच ही साबित हुई.

बाबा नीम करोली ने ही रामदत्त जोशी को मंदिर का पुजारी नियुक्त किया. आज भी इस मंदिर में पुजारी का कार्य जोशी परिवार द्वारा ही किया जा रहा है.

आस्था के अतिरिक्त इस मंदिर से पिथौरागढ़ के हजारों युवाओं की यादें जुड़ी हुई हैं. कुमौड़, विण, चैसर, जाखनी आदि गांवों के कई खिलाड़ी हनुमान मंदिर मार्ग से ही स्टेडियम की ओर दौड़ लगाया करते थे. इस मंदिर पर माथा टेककर न जाने कितने युवा फौज की भर्ती में दौड़ने गये और सफल हुये. टकाना, ऐन्चोली से देवसिंह, मिशन, विवेकानन्द, जीजीआईसी जाने वाले न जाने कितने बच्चों ने परीक्षा के दिनों आते जाते यहाँ अपना माथा टेका है.

हनुमान मंदिर जाने के दो रास्ते हैं. पहला मुख्य सड़क से सीधा लगभग सौ सीढियां चढ़ने के बाद. इस रास्ते का निर्माण भले लगभग सन 2000 के आस-पास हो गया था लेकिन आम लोगों द्वारा इसका प्रयोग लगभग नहीं के बराबर ही किया जाता था. इस मंदिर को दूसरा रास्ता कुमौड़ गांव से होता हुआ जल संस्थान के नीचे से एक पतली पंगडंडी के रूप में जाता था. जिसे बाद में चौड़ा किया गया. मंदिर निर्माण से पहले इस पूरे इलाके का प्रयोग कुमौड़ गांव वालों द्वारा घास के लिये किया जाता था. जहां वर्तमान में हनुमान मंदिर है वहां एक छोटा सा देवी का थान ( मंदिर ) हुआ करता था. वर्तमान में यह रास्ता भी चौड़ा कर दिया गया है.

सोर घाटी के लगभग बीचों बीच स्थित इस मंदिर से पिथौरागढ़ शहर का एक बड़ा हिस्सा एक ही नज़र में देखा जा सकता है. कम उंचाई से पिथौरागढ़ नगर की भव्यता यहाँ से देखी जा सकती है. वर्तमान पिथौरागढ़ नगर निर्माण के साक्षी रहे इस मंदिर का विकास और पिथौरागढ़ शहर का विकास लगभग साथ साथ ही हुआ है.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

जब तक सरकार मानती रहेगी कि ‘पलायन’ विकास की कीमत है, पहाड़ खाली ही होते रहेंगे

पिछली कड़ी  : उत्तराखंड विकास नीतियों का असमंजस उत्तराखंड में पलायन मात्र रोजगार का ही संकट…

7 days ago

एक रोटी, तीन मुसाफ़िर : लोभ से सीख तक की लोक कथा

पुराने समय की बात है. हिमालय की तराइयों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाने वाले…

1 week ago

तिब्बती समाज की बहुपतित्व परंपरा: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विवेचन

तिब्बत और उससे जुड़े पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों का समाज लंबे समय तक भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक…

1 week ago

इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक स्मृति के मौन संरक्षक

हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों और कस्बों में जब कोई आगंतुक किसी…

1 week ago

नाम ही नहीं ‘मिडिल नेम’ में भी बहुत कुछ रखा है !

नाम को तोड़-मरोड़ कर बोलना प्रत्येक लोकसंस्कृति की खूबी रही है. राम या रमेश को रमुवा, हरीश…

1 week ago

खेती की जमीन पर निर्माण की अनुमति : क्या होंगे परिणाम?

उत्तराखंड सरकार ने कृषि भूमि पर निर्माण व भूमि उपयोग संबंधित पूर्ववर्ती नीति में फेरबदल…

1 week ago