समाज

पहाड़ की माईजी से सुनिये घुघूती ना बासा

कुछ गीत होते हैं, जो अपने मूल में तो लोकप्रिय होते ही हैं पर उनके परिवर्तित रूप भी खूब आकर्षित करते हैं. वैश्विक महामारी के इस समय में इन्हें म्यूटेंट के रूप में भी समझा जा सकता है.
(Ghughuti Na Basa by Female Monk)

उत्तराखण्ड के लोकप्रिय गायक गोपाल बाबू गोस्वामी का एक लोकप्रिय गीत है – घुघूती ना बासऽ… घुघूती, जिसे फाख्ता, पंडूक, डव के नाम से भी जाना जाता है, घरों के आसपास दिखने वाला, सामाजिक पक्षी है. प्रवर्जन करता है इसलिए माळ घुघूती भी कहा जाता है. घुघूती का स्वर उदासी-भरा होता है जो विरह-वेदना को बढ़ा देता है.

घुघूती ना बासऽ… गीत में भी उदासी है, विरह-वेदना है. उदासी के कारण गीत में वर्णित कारणों से अलग भी हो सकते हैं. विरह का भी अलग रंग हो सकता है.

किसी गीत के जितने अधिक रूप (पैरोडी नहीं) मिलें, उतनी उसकी सफलता सिद्ध होती है. गीत का एक रूप ये भी है. माईजी ने इसे जिस तरह गाया है उसमें उभरती उदासी और भी गहरी है. गीत क्या है, एक तरह से माईजी का आत्मकथ्य है. सास के उलाहनों और गृहस्थी के कष्टों से मुक्ति की कामना से सन्यास ले लिया. अपने निर्णय को भरपूर सही भी ठहरा रही हैं. पर एक टीस जो दबी-छिपी है उसे उनके आत्मकथ्य के गीत की टेक ने प्रकट कर दिया है. आखिर ये टेक घुघूती ना बासऽ की ही क्यों ली गयी? उत्तर साफ है कि गहरी उदासी, निराशा और जीवन की क्रूरता को व्यक्त करने की सामर्थ्य इस टेक से अधिक किसी दूसरे गीत की टेक में उनको नहीं मिली.
(Ghughuti Na Basa by Female Monk)

घुघूती, गृहस्थों के लिए ही नहीं सन्यासियों के लिए भी दुःख साझा करने की पात्र रही है. घुघूती के दर्शन से ही पहाड़ की ब्याहताओं को खुद/नराई लग जाती है. और उसका बासना (उदासी भरा स्वर) तो उन्हें व्याकुल ही कर देता है.

कोरोना से त्राहि-त्राहि हो रही है. सब चाहते हैं कि गीत-संगीत भी खुशी का हो जिसमें शतुरमुर्ग की तरह हम अपने दु:ख को भूल जाएँ. फूल मुस्कराएँ, पक्षी चहचहाएँ. कोई उदास न दिखे, किसी का स्वर कातर न हो. खुशी अंदर न हो तो चेहरों पर तो हो. पर घुघूती का क्या करें, देश-काल के अनुसार स्वर परिवर्तित करने का इंसानी हुनर वो नहीं सीख सकी है. उससे विनती ही कर सकते हैं कि, घुघूती ना बासऽ…
(Ghughuti Na Basa by Female Monk)

देवेश जोशी

इसे भी पढ़ें: बागेश्वर की चेली जिसके गीत ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया है

1 अगस्त 1967 को जन्मे देवेश जोशी फिलहाल राजकीय इण्टरमीडिएट काॅलेज में प्रवक्ता हैं. उनकी प्रकाशित पुस्तकें है: जिंदा रहेंगी यात्राएँ (संपादन, पहाड़ नैनीताल से प्रकाशित), उत्तरांचल स्वप्निल पर्वत प्रदेश (संपादन, गोपेश्वर से प्रकाशित) और घुघती ना बास (लेख संग्रह विनसर देहरादून से प्रकाशित). उनके दो कविता संग्रह – घाम-बरखा-छैल, गाणि गिणी गीणि धरीं भी छपे हैं. वे एक दर्जन से अधिक विभागीय पत्रिकाओं में लेखन-सम्पादन और आकाशवाणी नजीबाबाद से गीत-कविता का प्रसारण कर चुके हैं. 

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