देवेन मेवाड़ी

पहाड़ की प्यारी घुघुती के बारे में सब कुछ जानिये

कोरोना काल के इसी सन्नाटे में उस दिन दो फाख्ते भी मिलने चले आए. जब भी फाख्तो को देखता हूं, और उनकी आवाज सुनता हूं तो गुजरे हुए जमाने की न जाने कितनी बातें याद आ जाती हैं. उत्तराखंड के अपने गांव में हम इन्हें घुघुती कहते थे. वहां ये घर के आंगन और खेतों में अनाज के दाने चुगने आती थीं. वहीं कहीं किसी ऊंची शाख या घर की छत पर बैठ कर अपनी दर्द भरी आवाज में गाती थी- कुकुकू…..कू…कू…कू! घुघुती की उस आवाज को मैं कभी भूल ही नहीं पाया. कान लगा कर उस आवाज को सुनता रहता था.
(Ghughuti Bird in Uttarakhand)

आज वह फिर आई थी, यहां दिल्ली में. हरसिंगार की शाख पर बैठ कर वही दर्द भरा गीत गा रही थी. वह तो अपने गीत में न जाने क्या कहती है, लेकिन उत्तराखंड के लोकगीतों में इसकी आवाज को मायके से दूर ब्याही गई बेटी की विरह-वेदना से जोड़ा गया हैः

नैं बासा घुघुती आमै कि डाई मां, नैं बासा
तेरी घुरु-घुरू सुणी मैं लागूं उदासा, घुघुती नैं बासा

(मत बोल घुघुती, आम की डाली पर, मत बोल. तेरी घुरु-घुरू सुन कर मेरा मन उदास हो जाता है, मत बोल घुघुती)

हिंदी और उर्दू में फाख्ता, पंडुक, पडकी, भोजपुरी में पेढुकी, पेंडुकी, कुमाउनी-गढ़वाली (उत्तराखंड) में घुघुती, राजस्थानी में डेकण, कमेडी, पंजाबी में घुग्गी, मराठी में कावड़ा और गुजराती में धोल कहलाने वाली यह चिड़िया अंग्रेजी में डव कहलाती है. इसे प्राचीन यूनान में देवी एफ्रोडाइट का प्रिय और पवित्र पक्षी माना जाता था. डव भी कबूतरों की ही बिरादरी में आते हैं. इसलिए इनको और कबूतरों को एक ही परिवार ‘कोलंबिडी’ में रखा गया है. लेकिन, इनका वंश और प्रजातियां बिल्कुल अलग हैं. आमतौर पर घरों के आसपास पाए जाने वाले हमारे जाने-पहचाने कबूतर का वंश ‘कोलंबा’ और डव यानी पंडुक का वंश ‘स्ट्रेप्टोपेलिया’ है.

ढोर फाख्ते के वैज्ञानिक नाम की भी कहानी सुनिए. इसके वंश का नाम है ‘स्ट्रेप्टोपेलिया’. ‘स्ट्रेप्टो’ का मतलब है कॉलर यानी घेरा और ‘पेलिया’ का अर्थ डव यानी फाख्ता. इसकी प्रजाति है ‘डेकाओक्टो’. ग्रीक यानी यूनानी भाषा में डेका का मतलब है दस और ओक्टो माने आठ. कुल मिला कर हुआ अठारह. इस शब्द के पीछे एक यूनानी मिथक छिपा हुआ है. कहा जाता है कि प्राचीन यूनान में कभी एक गरीब मेड यानी घरेलू सेविका थी. उसकी कंजूस मालकिन उसे तनखा में केवल 18 सिक्के देती थी. यानी, डेकाओक्टो! वह बहुत दुखी रहती थी. तब देवताओं ने उसकी मालकिन को सबक सिखाने के लिए ‘डव’ रचा ताकि वह बार-बार बोलता रहे- डेकाओक्टो! डेकाओक्टो! कुकु…कू…कू!

हां, तो यह जो हमारा ढोर फाख्ता है, यह रूखे-सूखे और झाड़ियों वाले इलाकों में ज्यादा पाया जाता है. वैसे इसे शहरों के हो-हल्ले की भी आदत पड़ गई है. इसलिए घरों के आसपास और बाग-बगियो में भी दाने चुगता हुआ दिखाई देता है. वहीं कहीं एकांत में किसी ऊंची डाल पर बैठ कर ‘कुकू…कू..कू’ गाते हुए देख और सुन सकते हैं. सिर के पीछे इसकी गर्दन पर आपको काला, आधा घेरा यानी रिंग दिखाई देगा. इसलिए इसे ‘रिंग डव’ भी कहा जाता है. यह केवल अनाज और घासों के बीज खाता है.

इसकी एक बड़ी खासियत है. वह यह कि प्यार के मौसम में यह मादा को रिझाने के लिए किसी ऊंची जगह से तेज आवाज में गीत गाता है- कुकु…कू! अगर मादा ध्यान न दे तो दिन भर भी रह-रह कर गाता रहता है. इसके अलावा मादा को चकित करने के लिए तालियों की फट-फट की तरह पंख फटफटा कर सीधे ऊपर आसमान में उड़ान भरता है. वहां से गोता लगा कर सर्पिलाकार चक्कर काटता हुआ नीचे चला आता है.

अगर मादा रीझ गई तो उसके साथ जोड़ा बनाता है. प्यार करने के बाद उसे घोंसले के लायक जगहें दिखाता है. जगह पसंद आ जाने पर मादा वहां बैठ जाती है. नर फाख्ता पतली डंडियां, घास-फूस, पंख, रुई, ऊन, तार वगैरह ला-ला कर मादा को देता है. वह नीड़ का निर्माण करती है और उसमें दो सफेद अंडे दे देती है. दिन भर मादा अंडे सेती है. शाम होने पर पारी बदल करके रात भर नर फाख्ता अंडे सेता है. बच्चों का पालन-पोषण नर और मादा दोनों मिल कर करते हैं.

ढोर फाख्ता के अलावा हमारे आसपास लिटिल ब्राउन डव यानी छोटा फाख्ता या पंडुक भी अक्सर दिखाई देता है. यह देखने में मैना के बराबर होता है और इसे भी रूखे-सूखे रेगिस्तानी इलाके पसंद हैं. नागफनी के कंटीले झाड़ शायद इसे ज्यादा पसंद हैं. यों यह भी घर-आंगन और बरामदों में चक्कर लगा लेता है और किसी ऊंची जगह पर बैठ कर धीरे-धीरे गाता रहता है. हमारी हंसी से मिलती-जुलती आवाज़ के कारण इसे ‘लाफिंग डव’ भी कहा जाता है.

इस नन्हे फाख्ते का नामकरण खुद प्रसिद्ध प्रकृति विज्ञानी कार्ल लिनियस कर गए हैं. उन्होंने इसका नाम स्ट्रेप्टोपेलिया सेनेगालेंसिस रखा. शायद इस फाख्ते का नमूना उन्हें सेनेगल, पश्चिम अफ्रीका से मिला होगा. यों भी यह छोटा फाख्ता अफ्रीका, मध्य-पूर्व और भारतीय उपमहाद्वीप का ही निवासी है. इसे आप गौर से देखेंगे तो आपको लगेगा जैसे इसकी गर्दन के दोनों ओर शतरंज की बिसात बिछा दी गई हो. आमतौर पर लोग इसे फाख्ते की माला कहते हैं.
(Ghughuti Bird in Uttarakhand)

छोटा फाख्ता भी अनाज के दाने और घासों के बीज ही खाता है. प्यार का मौसम आने पर यह भी मादा को रिझाने के लिए ढोर फाख्ता की तरह उड़ान का करतब दिखाता है. इसके अलावा ज़मीन पर मादा के सामने झूमता, गाता और उछलता भी है. ये भी जोड़ा बना कर रहते हैं और ढोर फाख्ते की तरह ही घोंसला बना कर दोनों बच्चों का पालन-पोषण करते हैं.

प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली ने फाख्ते की इन दो प्रजातियों के अलावा हमारे देश की पांच अन्य प्रजातियों के फाख्तों का भी वर्णन किया है. ये हैं: एमराल्ड डव, चित्रोखा फाख्ता यानी स्पाटेड डव, काला फाख्ता यानी ओरिएंटल टर्टल डव, बार्ड कुक्कू डव और रेड कालर्ड डव. इन सबकी अपनी-अपनी अलग पहचान है.

उत्तराखंड में घुघुती यानी फाख्ते की एक मार्मिक कथा प्रचलित है- भै भुकी, मैं सिती. मतलब भाई भूखा रहा, मैं सोती रह गई. वहां चैत माह में भाई दूर ब्याही बहिनों को कपड़े, रूपए, पैसे और पकवानों की भेंट देने के लिए जाते हैं. इस माह बहिनें भाइयों का इंतजार करती हैं. यह परंपरा भिटौली कहलाती है. कहते है, प्राचीनकाल में एक भाई इसी तरह अपनी बड़ी बहिन को भिटौली देने गया. नदी, घाटियां, पहाड़ और जंगल पार करके वह बहिन के ससुराल पहुंचा तो देखा, उसकी प्यारी दीदी सोई हुई है. घर में बूढ़ी मां अकेली थी, इसलिए वह भिटौली की टोकरी बहिन के पास रख कर चुपचाप वापस लौट आया.

सुबह बहिन की नींद खुली तो उसने भिटौली देखी. भाई को वहां न पाकर वह परेशान हो गई. पता लगा, वह तो रात में ही वापस लौट गया था. बहिन रो-रो कर कहने लगी- “भै भुकी, मैं सिती! भै भुकी मैं सिती!” (भाई भूखा रहा मैं सोती रह गई). और, एक दिन यही कहते-कहते उसके प्राण पखेरू उड़ गए. वह घुघुती चिड़िया बन गई और यही कहती रही- “भै भुकी मैं सिती! कुकु…कू…कू…कू!”

हरसिंगार के पेड़ पर अपना दर्द भरा गीत गाकर घुघुती चली गई. आशा कर रहा हूं कि लॉकडाउन के इस एकांत में वह फिर लौट कर आएगी.
(Ghughuti Bird in Uttarakhand)

वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

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