फोटो http://www.sportingnews.com से साभार
क्रिकेट की रनिंग कमेंट्री के क्षेत्र में बीबीसी को पायनियर का दर्ज़ा इस लिहाज़ से हासिल है कि उसके द्वारा 14 मई 1927 को चर्च में भाषण दे रहे एक पादरी महोदय से रेडियो पर लाइव क्रिकेट कमेंट्री करने का निवेदन किया गया.
इंग्लैण्ड के लेटन में मेहमान न्यूजीलैंड और मेज़बान एसेक्स काउंटी के बीच मैच चल रहा था. जॉनी डगलस एसेक्स की कप्तानी कर रहे थे. पहले दिन मेजबानों ने जैक ओ’कोनर की धीमी स्पिन की मदद से मेहमानों को 289 पर ऑल आउट किया और स्टम्प्स तक दो विकेटों के नुकसान पर 59 रन बना लिए थे. इस दिन का आकर्षण था एक पूर्व काउंटी क्रिकेटर फ़्रैंक गिलिंगहैम का माइक पर बोलना – वे पैविलियन की बालकनी में सचिव के दफ्तर के पास बैठे भीड़ की आवाज़ भी रेकॉर्ड कर रहे थे. बीबीसी पर यह पहली क्रिकेट कमेंट्री थी. चार किस्तों में गिलिंगहैम कोई आधा घंटा माइक्रोफोन पर कमेंट्री करने में सफल रहे.
एसेक्स के इस पूर्व बल्लेबाज़ को इस काम के लिए इस लिए नहीं चुना गया कि वे ठीकठाक क्रिकेटर रहे थे. वे एक पादरी भी थे और उनके भाषण सुनने को जनता भीड़ की सूरत में उमड़ा करती थी. विज़डन के मुताबिक़: “वे डिनर के बाद होने वाली पार्टियों में एक लोकप्रिय वक्ता थे जिनका सेन्स ऑफ़ ह्यूमर शानदार था; और किस्सों की वे खान थे सो अलग. भावहीन चेहरा लेकर वे ऐसी बातपोशी किया करते कि सुननेवाले लोटपोट हो जाया करते.”
फ़्रैंक गिलिंगहैम
जब लाइव कमेंट्री की योजना से सम्बंधित सूचना पहली बार रेडियो पर प्रसारित हुई तो उसका बहुत ज़्यादा स्वागत नहीं हुआ. यह अलग बात है कि “टेस्ट मैच स्पेशल” बहुत जल्दी इंग्लैण्ड में एक क्रेज़ बन जाने वाला था.
1 अप्रैल को ‘गार्डियन’ ने सूचना दी कि बीबीसी ने क्रिकेट को रेडियो स्पोर्ट्स की सूची में रखने का निर्णय लिया है. इस रपट में बीबीसी की हंसी उड़ाई गयी थी और ‘डेली हैरल्ड’ ने यहाँ तक कहा कि जल्द ही बीबीसी शतरंज और बिलियर्ड्स की कमेंट्री करना शुरू न कर दे.
25 अप्रैल को खुलासा किया गया कि रेवरेंड फ़्रैंक गिलिंगहैम लेटन से पहली लाइव क्रिकेट कमेंट्री करेंगे. सबसे पहले यह दोपहर 2:10 बजे से 2:20 बजे तक और उसके बाद हर घंटे के अंतराल पर पांच मिनट को होनी तय की गयी जिसके समापन के तौर पर 6:45 पर दिन के खेल का संक्षिप्त ब्यौरा पेश किया जाने वाला था. इस के बीच श्रोताओं के मनोरंजन के लिए लंदन रेडियो डांस बैंड अपनी प्रस्तुतियां देने वाला था.
‘डेली टेलीग्राफ’ ने इस सीमित समय की कमेंट्री को जायज़ ठहराते हुए दलील दी कि यह सोच पाना भी मुश्किल है कि श्रोताओं के लिए इससे अधिक समय तक क्रिकेट जैसे बोझिल खेल को दिलचस्प कैसे बनाया जा सकता है. कुछ दिनों बाद ‘गार्डियन’ में रपट छपी कि जब भी खेल दिलचस्प हो रहा होगा, बैंड की प्रस्तुति को विराम देकर लाइव कमेंट्री प्रसारित किये जाने की बात चल रही है. ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक भी थी. उन दिनों रेडियो को प्रेस अपने सबसे बड़े शत्रु के रूप में देखती थी और लम्बे समय तक अखबारों ने रेडियो प्रोग्रामों का शेड्यूल छापने से गुरेज़ ही किया.
लाइव कमेंट्री को लेकर बीबीसी में भी कोई ख़ास उत्साह नहीं था. उनके अपने प्रकाशन ‘रेडियो टाइम्स’ में इस बात को स्वीकार किया गया कि यह नया प्रयोग एक एडवेंचर है क्योंकि उसे पता है कि क्रिकेट दुनिया के सबसे धीमे खेलों में एक होने के कारण श्रोताओं को लम्बे साय तक बांधे रख सकने के लिहाज़ से कतई अनुपयुक्त है. “उन्हें मेडेन ओवरों के वर्णन सुनने पड़ेंगे या उस वक्त इंतज़ार करना होगा जब बल्लेबाज़ पैविलियन से अपनी टोपी मंगा रहा होगा.
यह अलग बात है कि ऑस्ट्रेलिया में रेडियो पर क्रिकेट मैचों के बारे में कार्यक्रम खासे लोकप्रिय हो रहे थे जिनमें क्लेम हिल जैसे पूर्व दिग्गज क्रिकेटर मैच के संक्षिप्त वर्णन पेश किया करते थे. 1924-25 के सिडनी टेस्ट के दौरान भी ऐसा किया जा चुका था.
उसके अलावा बीबीसी के स्वप्नदृष्टा प्रोड्यूसर लांस सीवकिंग उन्हीं दिनों अमेरिका में प्रसारित होना शुरू हुई लाइव बेसबॉल कमेंट्री से खासे मुतास्सिर थे. इस लिहाज़ से बेसबॉल ने क्रिकेट को उन्नीस साबित कर दिया था जब 5 अगस्त 1921 को पिट्सबर्ग पाइरेट्स और फिलाडेल्फिया फिलीज़ के बीच हुए मैच का लाइव ब्रॉडकास्ट हुआ था.
सो बीबीसी ने अपना एडवेंचर किया. इस बात की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि पादरी गिलिंगहैम ने अपनी वक्तृता का कैसा इस्तेमाल किया होगा क्योंकि उसके दस्तावेज़ अब नष्ट हो चुके हैं. अखबारों की रपटें अलबत्ता बहुत उत्साह बढाने वाली नहीं थीं. ‘द वेस्टर्न डेली प्रेस’ ने इसे “भीषण उबाऊ” करार दिया अलबत्ता ‘द एडिनबर्ग ईंविंग’ के मुताबिक़ यह प्रयोग आंशिक रूप से सफल रहा था.
बीबीसी के लिए इतना प्रोत्साहन पर्याप्त था और जल्द ही काउंटी मैच, ईटन-हैरो के मैच और जेंटलमैन एनकाउंटर्स को लॉर्ड्स और ओवल से ब्रॉडकास्ट किया जाने लगा और क्रिकेटप्रेमियों के बीच पेल्हाम वार्नर एक जानी पहचानी आवाज़ बनने लगे थे. स्थानीय स्टेशनों ने भी ऐसा करना शुरू किया – बेलफ़ास्ट और कार्डिफ के स्टेशन इसमें पायनियर रहे. हालांकि अखबार क्रिकेट कमेंट्री पर हमला बोलते रहे पर श्रोताओं के बीच वह लोकप्रिय होने लगी थी.
1930 में डॉन ब्रैडमैन की पहली एशेज़ सीरीज का लाइव ब्रॉडकास्ट हुआ और ऑस्ट्रेलिया में मैच की कवरेज के लिए तार-सेवा का इस्तेमाल किया गया.
अफ़सोस की बात यह रही कि रेवरेंड गिलिंगहैम को कमेंट्री बॉक्स से सदा के लिए हटा दिया गया. द ओवल में एक मैच में बरसात से पड़े व्यवधान के दौरान उन्हें मैदान में लगे हुए विज्ञापन बोर्ड्स को पढ़कर सुनाने का उबाऊ काम करते पाया गया. इसकी सजा उन्हें तत्कालीन बीबीसी प्रमुख लार्ड राईट के गुस्से के रूप में झेलनी पडी जो रेडियो को किसी भी तरह की व्यावसायिकता से दूर रखना चाहते थे.
तसल्ली की बात यह रही कि इस “हिमाकत” की सजा उन्हें राजशाही ने नहीं दी. 1939 में रेवरेंड गिलिंगहैम को चैप्लेन टू द किंग नियुक्त किया गया.
(क्रिकेट कमेंट्री पर आधारित इस सीरीज की अगली क़िस्त में एलन मैकगिल्वरे)
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