संस्कृति

लोककथा : शेरू और श्याम

सावित्री ने आज घर पर ही रहने का फैसला किया. थकाऊ खेती के काम से आज उसे फुरसत मिली थी. हफ्ते दस दिन से वह इतनी व्यस्त हो गयी थी कि अपने बेटे को समय नहीं दे पा रही थी. चाहती थी कि आज वह अपने बच्चे को अपने हाथों से दुलराये, नहलाये और खूब प्यार करे. उसने सुबह उठने के बाद बच्चे को छाती से लगाकर भरपेट दूध पिलाया और फिर वहीं रसोई के एक कोने में लिटाकर घर का काम निपटाया. छः माह का उसका बेटा उसे टुकुर-टुकुर देखता और फिर खित-खित हँस देता. घर के काम निपटाते हुये वह जितनी बार बाहर-भीतर जाती बच्चे से उसी की नकल करते हुये तोतली जुबान में बतियाना न भूलती. बच्चा भी आज बार-बार अपनी माँ की ओर देखकर खुश हो रहा था. उसकी पनियाली आँखों में चमक साफ दिखाई दे रही थी. हो भी क्यों नहीं, माँ जो आज पास थी. (Sheru Aur Shyam)

अन्य दिनों पड़ोस की दादी जैसे-तैसे दूध पिला देती और कभी नहला भी देती थी परन्तु आज तो… आं-आं-ऊं करते हुये वह कभी नन्हें हाथों से सिर के बालों को पकड़ता और कभी अपने पैर का अंगूठा मुहँ तक लाने का प्रयास करता और कभी पलटने की कोशिश करता. रसोई का काम निपटाने के बाद पशुओं को घास पानी खिलाकर सावित्री ने पशु बाहर धूप में बाँध दिये. अकेले प्राणी के लिये घर के ही इतने काम हो जाते हैं कि कमर सीधी करनी ही मुश्किल है. सोचा क्या खाना बनेगा, पर बनाना तो पड़ेगा ही. फिर घर में एक बिल्ली भी पाल रखी है जो कि अक्सर बाहर-भीतर आती-जाती रहती है, कभी श्याम के पास आकर नाखूनों से उसका बिस्तर खींचती या फिर अपने सिर से उसके पैरों को सहलाती. यह बिल्ली उसकी सास पड़ोस के चाचा जी के यहाँ से ले आयी थी. तब तो यह चूहे के आकार की थी और आँखें बिल्कुल बन्द थी. लगा ही नहीं कि यह बच पायेगी परन्तु आज यह खूब डील-डौल की हो गयी है.

सावित्री ने बेटे श्याम को उबटन लगाकर नहलाया और कपड़े पहनाकर बाहर धूप में ही दरी बिछाकर लिटा दिया. ऊपर से छाता रख दिया जिससे वह धूप से बच सके.  माघ के महीने में भले ही धूप में उतनी गरमी तो नहीं होती है परन्तु लेटे-लेटे और अदान बच्चे को उतना भी सहन करना मुश्किल हो सकता था. सावित्री के ससुर को गुजरे कई साल हो गये थे परन्तु सास गत साल ही गुजरी. बेचारी अपने पोते का मुहँ देखने की इच्छा  मन में लेकर ही चली गई. काल के आगे किसी की चली भी तो नहीं है.

जब से श्याम आया है यह पालतू बिल्ली, जिसे वह शेरू कहकर पुकारती है, श्याम के आगे-पीछे ही ज्यादा घूमती है. कभी-कभी तो सावित्री को डर भी लगता है कि अकेले में कहीं शेरू मेरे बेटे को नुकसान न पहुँचा दे. फिर भी वह देख रही थी कि पिछले दो साल से वह साथ है और उसने आज तक ऐसा कुछ भी नहीं किया है. सावित्री को याद आया कि हफ्ते भर से अधिक वह व्यस्त रहने से घर में काफी कपड़े धोने के लिये हो गये हैं. श्याम सो गया है तो एक-आध घण्टे तो सोएगा ही. इतनी देर में वह पास की नहर से कपड़े धोकर ला सकती है. तो शेरू को जरूरी हिदायत दी और सारे कपड़े समेटकर वह नहर की ओर चल दी. शेरू ने उसकी बात कितनी समझी और कितनी नहीं, यह अलग बात है. लोककथा : ह्यूंद की खातिर

कपड़े कूटने के लिये उसने मुंगरा (मुंगरी अर्थात मक्की जैसे आकार का लकड़ी का दो फुटा डण्डा) भी साथ रखा था ताकि कपड़े जल्दी धुल सके. परन्तु फिर भी एक घण्टे से अधिक समय लग ही गया. वह जल्दी-जल्दी कपड़े समेटकर घर लौटी तो आंगन में पहुँचने से पहले ही उसकी शेरू बिल्ली आकर उसके पैरों में लिपटने लगी. उसकी तरफ देखे बिना सिर, सिर कहकर उसने हटाना चाहा तो वह नहीं हटी. फिर उसने झुककर जोर से उसे डांटना चाहा. परन्तु उसके मुहँ में लगा खून देखकर वह धक्क रह गयी. यह क्या हो गया. आज सुबह से ही मेरा मन ऐसे ही नहीं घबरा रहा था, मेरी आँख ऐसे ही नहीं फड़फड़ा रही थी. हे देव, तो क्या इसने मेरे श्याम को…? नहीं, वह जोर से चिल्लाई.  लोककथा : दुबली का भूत

इधर बिल्ली का उसके पैरों पर लिपटना जारी था और उधर सावित्री का रूदन शुरू हो गया. वह होशो-हवास खोने लगी. उसने सिर पर रखे कपड़ों से भरे तसले को नीचे पटका और हाथ में पकड़े मुंगरे से बिल्ली के सिर पर प्रहार कर स्वयं नशे की हालत में जैसी श्याम के बिस्तर की ओर भागी. वहाँ का नजारा देखकर उसकी रूह ही कांप गयी और वह धड़ाम से नीचे बैठ गयी. उसका बेटा श्याम माँ को देखकर किलकारी मार रहा था परन्तु बगल में एक नाग के खून से लथपथ कई टुकड़े पड़े थे. माजरा समझते उसे देर न लगी. उसकी आँखों से झर-झरकर आँसू बहने लगे कि यह उसने क्या कर दिया. चेतना लौटी तो वह पूरे वेग से दरवाजे पर पड़ी बिल्ली की ओर भागी परन्तु वह तो कब का दम तोड़ चुकी थी. पछाड़ खाकर गिर पड़ी सावित्री अपने शेरू से लिपटकर जार-जार रोती रही, जब तक कि उसकी आँखों के आँसू सूख नहीं गये. 

देहरादून में रहने वाले शूरवीर रावत मूल रूप से प्रतापनगर, टिहरी गढ़वाल के हैं. शूरवीर की आधा दर्जन से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपते रहते हैं.

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Sudhir Kumar

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