इन दिनों भादो-असोज के चटक नीले आसमान से बिखरते घाम से हरे गलीचे सी बिखरी घास, पेड़ों की टहनियों से लिपटे पत्ते, एक दूसरे से उलझी लिपटी झाड़ियाँ सब हलके पीलेपन से ढंकने लगी थीं. ठागरों के सहारे आसमान की तरफ तनी ककड़ी के लगूले (बेलें) पीली होती मोटी मोटी ककड़ियों के बोझ से झुकी जा रही थीं.
हम जैसे छिद्दर बच्चों का झुण्ड घर की छज्जा में बैठी बूढ़ी दादियों की आँखों के चौकन्नेपन को ठगा कर अपने बोझ से झुकी बेलों के आस-पास झूठ-मूठ की लुकाछिपी का खेल खेलते छोटी हरी ककड़ियों की ताक में लगे रहते. दादिया धुंधली आँखों के ऊपर हथेलियों की ओट करती हमें बरजती रहती खबरदार रै छोरो लागुली मत खेंचना. काखड़ी सूख जाएंगी. कखड़ी ह्यूंद के लिए हैं.
एक चखुली कर्र कर्र की कर्कश आवाज निकालती हमारी चोरी को दादी की तरफ धकेलती रहती. हम लंबा-सा डंडा उठा कर भगाते – ह्वा ह्वा चखुली ह्वा ह्वा. बिना किसी बात की पंछियों को उड़ाने के लिए की गयी ह्वा ह्वा घर में काम से अंदर बाहर रीटती माँ को ये बताने के लिए काफी होती की बाहर सगोड़ी में खड़े झुण्ड में कुछ तो बदमाशी चल रही है.
हर घर से धै लगती यख आओ छोरो कखड़ी पर हाथ मत लगना ह्यूंद के लिए पकने रखी हैं. हमारा झुण्ड कपाल में हाथ मारता ये क्या बात हुई जिस चीज को हमारा मन खाने को हो वही चीज ह्यूंद के लिए . कखड़ी ह्यूंद के लिए, मुंगरी( मक्की) ह्यूंद के लिए, अखरोट ह्यूंद के लिए, च्यूड़ा ह्यूंद के लिए, बूखाणा ह्यूंद के लिए. तभी चखुली कर्र कर्र करती हमारे सिरों के आस-पास फिर बोलने लगती.
तेरी चखुले की साले … लै …अर वो मारा ढुंगा पीछे से – ह्वा ह्वा. तेरी ह्यूंद की भी लै साले ह्यूंद … वो फेंका एक पैना ढुंगा. लै!
सारा गुस्सा ढुंगी को चुटाने के साथ बाहर हवा में हिचकोले खाने लगता.
हमारा ये खेल दम लगा के गारी चुटाना भी दादी को खलने लगता. भारै खबरदार किसी आने-जाने वाले को न लग जाये. इन सब बदमाशियों का अंत तब होता जब कथा लगाने की करार तैरती हुई हम तक आतीं. तो आज रूमकी दफे ह्यूंद की कथा पक्की रही.
थोड़ी खुशामद के बाद … आवा रै बैठो रै … गांव में सबसे ऊपर वाले एकुलांश वाले कूड़े में एक माँ अपने थोड़े लाटे बेटे के साथ रहती थी. दिन रात दोनों काम में लगे रहते तब जा के गुजर बसर हो पाती वो भी मोटी झोटी, कोदा, झंगोरा, कौणी मारसा खा कर. धान गेहूं तीज त्यौहार बरसी तेरहवीं के लिए बचा के रखते. काखड़ी, मुंगरी, खाजे, सब्जियों के सुकसे, च्यूड़े, बुखँणे सब ह्यूंद के उन दिनों के लिए बचा कर रखते जब बर्फ पड़ जाती, घर से बाहर जाना मुश्किल होता.
बुढ़िया माँ का लाटा लड़का हमेशा अपनी माँ से सुनता – फलानी चीज ह्यूंद के लिए सम्हाल दे बाबा. लड़का चुपचाप सब चीजों को ह्यूंद के लिए सम्हाल देता. उनके घर में एक अखोड़ की पुरानी डाली भी थी जिसमे छोटे छोटे काठी अखोड़ लगा करते थे. एक दिन लाटा लड़का अपने गुठ्यार में बैठा अखोड़ के छिलके उतार कर सुखाने डाल रहा था. तभी एक चोर घर के पास से इधर उधर चलके बलके (ताक़ झांक) लगाता गुजर रहा था.
लड़के की माँ उस समय धारे से पानी लाने गयी थी. चोर ने देखा कि घर में लाटे के सिवाय कोई नहीं है. लड़के से बोला तेरा नाम क्या. लड़का बोला मेरा लाटू अर तेरा नाम क्या.
चोर फ़ौरन बोला मेरा नाम ह्यूंद है.ये सुन कर लाटू राम बहुत खुश हुआ. चोर के लिए बोरा बिछाता बोला अरे भैजी आ बैठ जा. मेरी माँ ने तेरे लिए भौत सारा सामान रखा है. खूब हुआ तू खुदी आ गया. नी तो माँ मेरे सिर पर बोझा लाद के भेजती तेरा सामान.
चोर को सारा मामला समझ आ गया.
बोला अरे भुला तेरी माँ तो मेरी काँणसी माँ लगती है. उसी ने मेरा नाम ह्यूंद रखा है. जब तक लाटू घर की लट्टी पट्टी बांधता रहा चोर बैठा चौकीदारी करता रहा. सब सामान मिलते ही चोर ने उसी बोरे में सारा माल मत्ता बांधा जिसमें बैठा था और चम्पत हो गया.
इधर उधर के काम निबटा, पानी की गागर भर कर बूढ़ी माँ जब घर लौटी तो लाटू राम जी डिण्डियाले में दोनों हाथ सर के नीचे रखे एक पैर के ऊपर दूसरा पैर रख झूलाते गीत लगा रहे थे – रणी हॉट नी जाणू गजे सिंगा, राणयूं कु हौशिया गजेसिंगा.
इससे पहले कि माँ कुछ पूछती लाटू उछल कर माँ के पास आया और बोला माँ अब मत बोलना मुझे लाटू. आज तो मैंने भौत बढ़िया काम कर दिया तू बगछट (खुश) हो जायेगी. तूने ह्यूंद के लिए जितना सामान रखा था सब मैंने उसे दे दिया. वो खुदी आ गया था भई.
माँ को पूरा माजरा समझते देर नहीं लगी अपने कपाल पर दोनों हाथ मारते बोली द लाटा छोरा कन खड़वाल धरा तुझे मैंने. अपनी कमाई धमाई की चोरी सुन कर जोर जोर से रो पडी.
लाटू राम भौंचक्क. उसने तो अच्छा काम किया और ये माँ तो कारुणा लगा कर रो रही है. तभी से कहते है चोर की चौकीदारी. अब हम सब उचक के बैठ गए. अपनी की गयी चोरियां एक दूसरे पर थोपते – तू चौकीदार … तू चौकीदार – बोल के घिपरोल मचाते, सपनों में गुम फिर गाँव भर में फलों, काखड़ी, मुंगरी की चोरी करने चल दिए.
-गीता गैरोला
देहरादून में रहनेवाली गीता गैरोला नामचीन्ह लेखिका और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं. उनकी पुस्तक ‘मल्यों की डार’ बहुत चर्चित रही है. महिलाओं के अधिकारों और उनसे सम्बंधित अन्य मुद्दों पर उनकी कलम बेबाकी से चलती रही है. वे काफल ट्री के लिए नियमित लिखेंगी.
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