उत्तराखण्ड अद्वितीय प्राकृतिक सुन्दरता और अनूठी लोकसंस्कृति से समृद्ध है. यहाँ के समाज में प्रचलित ढेरों किस्से-कहानियाँ मन को आनन्दित तो करते ही हैं, ये अलिखित इतिहास भी हैं. रोमांच से भर देने वाली कई दास्तानों से दादी-नानी के पिटारे भरे रहते हैं. इनमें सबसे रोचक किस्से होते हैं, भूतों के. बच्चों के लिए तो ये किस्से सबसे ज्यादा रोमांचित कर देने वाले होते हैं. भले ही इन्हें सुनने के बाद एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए किसी को साथ ले जाना पड़े, लेकिन किस्से सुनेंगे तो भूतों के ही. रात में सोते समय इन किस्से-कहानियों को सुनते-सुनते सो जाने का आनन्द आपने भी जरूर लिया होगा. (Folk Belief Dead Souls)
आज हम इसे अन्धविश्वास कह सकते हैं, लेकिन बीते समय में हमारे उत्तराखण्ड के लोकविश्वासों में ये महत्वपूर्ण स्थान रखते थे. हमारे पूर्वजों द्वारा कहे जाने वाले ये किस्से-कहानियाँ उनके अनुभवों की वर्णमाला हुआ करते थे, जिनमें पीढ़ी दर पीढ़ी नये-नये अक्षर जुड़ते चले जाते थे.
आइए जानते हैं, उत्तराखण्ड में प्रचलित मृतात्माओं से जुड़े कुछ ऐसे ही लोकविश्वासों के बारे में.
प्राचीन समय में क्षेत्र के लोगों में परम्परागत रूप से यह धारणा पायी जाती थी कि ऐसी अतृप्त और पीड़ित आत्माएं— जिनकी किसी हादसे में अकाल मृत्यु हुई हो, जिन्हें किसी गम्भीर अपराध स्वरूप मृत्युदण्ड दिया गया हो, जिन्होंने स्वयं परिस्थितियों से हार मानकर आत्महत्या कर ली हो, जो सांसारिक सुख-भोग की अतृप्त इच्छाओं के साथ ही मर गये हों अथवा जिनका उचित गतिकर्म, दाह-संस्कार नहीं हो पाया हो, मृत्यु के बाद अमावस्या या कृष्णपक्ष की अंधेरी रातों में वहीं अपने परिवेश में घूमती-भटकती रहती हैं और पीड़ित करने वाले व्यक्ति या उसके अग्रजों को दण्डित करने अथवा अपनी अतृप्त वासनाओं की तृप्ति एवं गतिक्रिया करवाने के लिए कई रूपों में अपनी सत्ता का आभास कराती हैं. ऐसा विश्वास किया जाता था/है कि साधारण मृतात्मा भी मृत्यु के बाद पीपलपानी तक घर के आस-पास ही भटकती रहती है और गतिक्रिया सम्पन्न होने के बाद तृप्त हो पितृलोक को चली जाती है. यहाँ के समाज में अनेक किवदन्तियाँ प्रचलित हैं, जिनमें मृतात्माओं एवं भूत-प्रेतादि को कुछ इस प्रकार चित्रित किया जाता है—
प्राचीनकाल में उत्तराखण्ड के जनमानस में यह विश्वास किया जाता था कि अगतिक शिशु, किशोर एवं अविवाहित युवकों की प्रेतात्माएं अपने सिरों पर आग लिए शमशान भूमि व निर्जन प्रदेशों में भटकती रहती हैं, जिन्हें ट्वाल अथवा टोला कहा जाता था. दूर से ये रोशनी की चलती-फिरती मशालों की भांति दिखाई पड़ती थी तथा इनकी संख्या 2-4 से प्रारम्भ होकर 20-25 तक हो जाती थी. सामान्यतया ये रात्रि के प्रथम प्रहर अथवा अन्तिम प्रहर में दिखती थी.
बाण भूतों की ऐसी टोली हुआ करती थी, जो दिन में 12 बजे बाद या रात में 12 बजे बाद निकलती थी. माना जाता था कि ये विशेष रूप से भाद्रपद और अश्विन माह में देखी जाती थी. ये अपने साथ बरछीनुमा हथियार लेकर चलते थे और इनके मार्ग में आने वाले इंसान को मारकर अपनी टोली में शामिल कर लेते थे. लोकमान्यता है कि स्थानीय देवता ’चंपवा.’ लोगों को इनके प्रकोप से बचाने के लिए ’बाटा का अबाटा’ कहकर सतर्क कर दिया करते थे. इसी प्रकार बयाल भी प्रेतात्माओं की टोली होती थी. गढ़वाल में कुछ स्थानों पर इन्हें कुलदेवताओं के गणों का समूह भी माना जाता था, लेकिन इन्हें अनिष्टकारी माना जाता था. अतः इनसे बचने के लिए अनके प्रकार के मंत्र भी प्रचलित थे.
आंचरी के विषय में लोकविश्वास व्याप्त था कि अविवाहित युवतियाँ अकालमृत्यु को प्राप्त कर आंचरियों के रूप में पर्वत की चोटियों एवं गाड़-गधेरों (नदी-नालों) में छाया बनकर विचरती रहती हैं और लाल रंग के वस्त्र पहने युवक-युवतियों व बच्चों को अपना शिकार बनाती हैं. मान्यता के अनुसार लोग गले में लाल डोरी बांधकर इससे बचाव का यत्न किया करतें थे.
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गड़देवी को दुर्घटना, आत्महत्या अथवा मारकाट में मारे गए अगतिक मृतात्माओं के प्रतिनिधित्वकर्ता प्रद्वेषी प्रेतात्मा के रूप में जाना जाता था. इनके विषय में मान्यता थी कि ये अपने मृत्युस्थल के आस-पास घूमती रहती हैं तथा वहाँ से विचरने वाले लोगों में प्रविष्ट होकर उन्हें उत्पीड़ित करती हैं. जागर अथवा डंगरिये द्वारा लगाये गए बभूति आदि के माध्यम से इनसे मुक्ति पायी जाती थी.
दो नदियों के संगम, घने जंगलों, शमशान घाट तथा नदियों के किनारे बसने वाली इस प्रेतात्मा को अत्यधिक शक्तिशाली और खतरनाक माना जाता था. इसके विषय में मान्यता थी कि यदि कोई व्यक्ति उक्त स्थानों में अकेले या समूह में जाते वक्त डर जाता है तो मसाण उसके शरीर में प्रविष्ट हो जाता है. यह अधिकतर सुन्दर युवतियों को अपनी पकड़ में लेता है. यदि समय रहते किसी शक्तिशाली डंगरिये द्वारा उस युवती को इसके चंगुल से न छुड़ाया जाय तो यह उसे अपने साथ ले जाता है यानि उसकी मृत्यु हो जाती है. इसलिए उन्हें अकेले ऐसे स्थानों पर जाने से बचने की सलाह दी जाती थी.
भयंकर डरावनी रूपाकृति वाला यह भूत घने जंगलों तथा अंधकारयुक्त गिरि-गुहाओं में निवास करता है, इस विश्वास के साथ पुरातन उत्तराखण्डी लोग अकेले घने जंगलों में जाने से डरते थे. मान्यता थी कि खबीश किसी व्यक्ति को अकेला पाकर चरवाहों की बोली बोलता हुआ उसका पीछा करता है तथा मनुष्य उसकी भयानक रूपाकृति को देखकर ही मूर्छित हो जाता है.
उपरोक्त वर्णित भूत-प्रेतादि को स्थानीय बोलचाल की भाषा में ‘छ्यौ’ अथवा ‘छल’ कहा जाता था. सामान्य छल लगने पर देवता के डंगरियों द्वारा बभूति लगाने से ठीक हो जाता था, परन्तु ‘मशाण’ जैसे शक्तिशाली छल को खिचड़ी (चवल, मास/उड़द की दाल व मिर्च-मसाले) अथवा पशु-पक्षी (बकरा/मुर्गा) की बलि देकर पूजा जाता था. परिवार के ही किसी अगतिक अतृप्त पूर्वज प्रेतात्मा को तृप्त करने के लिए कांस (कुशा) को प्रेतात्मा का प्रतिरूप मानकर विधिपूर्वक उसका दाह- संस्कार किया जाता था, अन्तिम चरण में प्रेतात्मा की इच्छानुसार उसे तीर्थस्नान कराया जाता था अथवा गाँव में ही थानबासी (मंदिर बनाकर स्थापित) किया जाता था.
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मृतात्मापरक ये लोकविश्वास वर्तमान में शिक्षा और आधुनिकता के प्रभाव में धूमिल अवश्य हो गये हैं, परन्तु समाप्त नहीं हुए हैं. ग्रामीण अंचलों के निवासी अभी भी उपरोक्त तथ्यों पर पूर्ण विश्वास रखते हैं. (Folk Belief Dead Souls)
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मूल रूप से मासी, चौखुटिया की रहने वाली भावना जुयाल हाल-फिलहाल राजकीय इंटर कॉलेज, पटलगाँव में राजनीति विज्ञान की प्रवक्ता हैं और कुमाऊँ विश्वविद्यालय से इतिहास की शोध छात्रा भी.
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