(पोस्ट को रुचिता तिवारी की आवाज़ में सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें)
मेलोडेलिशियस-9
ये ऑल इंडिया रेडियो नहीं है. ये ज़ेहन की आवाज़ है. काउंट डाउन नहीं है ये कोई. हारमोनियम की ‘कीज़’ की तरह कुछ गाने काले-सफेद से मेरे अंदर बैठ गए हैं. यूं लगता है कि साँसों की आवाजाही पर ये तरंगित हो उठते हैं. कभी काली पट्टी दब जाती है कभी सफेद. इन गानों को याद करना नहीं पड़ता बस उन पट्टियों को छेड़ना भर पड़ता है.
जब गर्मी अपने शीर्ष पर होती है, बहुत तकलीफ़ देती है, उस वक्त, बारिश की कुछ बूँदें ही किसी को अपार खुशियों से भर देती हैं क्योंकि ये अपने साथ आने वाली बरखा, ठंडी हवाओं और खुशनुमा मौसम का सन्देश लेकर आती हैं. उसी तरह से आज जिस गाने ने मुझे छुआ है, उसे सुनकर आप न केवल आह्लादित हो उठते हैं, बल्कि आशान्वित भी, खुशियों के उस श्रोत तक पहुँचने के लिए जो इस सोज़ भरी आवाज़ में वाबस्ता हैं. बहुस्तरीय भावनाओं को मधुरता से अभिव्यक्त करने में सक्षम एक प्रतिभावान गायक और संगीतकार की ये आवाज़ सुनने वाले के दिलो-दिमाग़ पर हमेशा के लिए अपनी छाप छोड़ जाती है:
ये नयन डरे डरे,
ये जाम भरे भरे.
ज़रा पीने दो.
अपने होम प्रोडक्शन गीतांजलि फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म ‘कोहरा’ (1964) के लिए गाया और संगीतबद्ध किया गया ये गाना हेमंत कुमार का है. कोहरा मेरी पसंदीदा लेखिका डैफ्ने डी मॉरियर के क्लासिक नॉवेल रिबेका पर बनी फिल्म है. लेकिन जाने क्यों मुझे इसी मादक आवाज़ में एक और धुन इस धुन की आभा को भेदती हुई अपने गर्म आगोश में बाँध रही है.
तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है
ख्वाब चुन रही है, रात बेक़रार है
तुम्हारा इंतज़ार है
ये गाना फिल्म ‘ख़ामोशी’ (1969) से है जिसे लिखा गुलज़ार ने है और गाया एवं संगीत से सजाया है एक लम्बे, संकोची, धोती और लम्बी बुशर्ट पहनने वाले ऐनकधारी गायक ने जिन्हें हम जिन्हें हेमंत कुमार के नाम से जानते हैं. लेकिन ये दो गाने एकसाथ? क्यों?
एक समृद्ध अनुनाद से भरी आवाज़ से नवाज़े गए हेमंत की गायकी आपके अंदर बहुत गहरी छाप छोड़ जाती है. आप इस आवाज़ का कम्पन और गहरा रेज़ोनेंस महसूस करते हैं. जब ऐसी अनुनाद भरी आवाज़ प्रेम, प्रेम की तड़प, प्रेम की उदासी के गाने गाती है तो ये गाने आपका पीछा करते हैं, ये तड़प, ये उदासी हांट करती है. ये सदा आपतक बार-बार लौट कर आती है. हान्टिंग का मतलब यहाँ भूतिया या रात के अँधेरे में शोक प्रकट करती डरावनी आवाजों से नहीं है. यहाँ तात्पर्य ऐसे गानों से है जो आपके ज़ेहन में लिख से जाते हैं और आप कभी इन्हें बेइरादा गुनगुनाते हैं या बेख्याली में भी इनकी कल्पना करने लग जाते हैं, क्योंकि ये गाने आपसे भावना के उस स्तर पर जुड़ जाते हैं जहां इनकी धुन कहीं आपके भीतर हमेशा गूंजती रहती है चाहे आप इन गानों को सुन रहे हों या नहीं. ऐसे बहुत से गाने हैं जिनमें हेमंत कुमार ने हमिंग और बहुत चुनिन्दा नोट्स पर ज़ोर देते हुए खूबसूरत प्रयोग किये हैं जैसे `तुम पुकार लो.’ या ऐसे गाने भी बनाए जिनमें बहुत नीचे के सुर यानि लो नोट्स लिए गए हैं, जो हेमंत की गहरी अनुनाद से भरी आवाज़ को और भी उभार देते हैं, जैसे `ये नयन डरे डरे.’ `तुम पुकार लो गाने’ में गाने के बोल, म्यूजिक, हमिंग और उसके साथ सीटी की आवाज़ आह! सब मिलकर आपको अभिमंत्रित सा कर देते हैं.
इसी तरह से `ये नयन डरे डरे’ में हेमंत दा की हमिंग आपको एक अनकहे से रोमांच से भर देती है. इन दोनों ही गानों में हेमंत दा की आवाज़ का कम्पन और हमिंग अलग से नोट किये जा सकते हैं और दोनों गाना खत्म होने के बाद देर तक आपके साथ बने रहते हैं.
अपनी आत्मकथा `अमार गानेर स्वर लिपि’ में हेमंत दा गलत नहीं लिखते कि मेरे गानों के कॉर्ड्स उड़ते हुए शब्दों की धुनों में संरक्षित रह जाएंगे.’ सच ही तो है. आज भी मंत्रमुग्ध कर देने वाली उन रचनाओं में हेमंत दा वो स्वर लिपियाँ फिर-फिर छेड़ देते हैं. क्या यही कारण है कि उन दो गानों के रूप में दो `कीज़’ मुझे आज भी एक साथ सदाएं देती हैं?
जब ये गाने बने और लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंचे हेमंत कुमार म्यूज़िक की दुनिया का एक लोकप्रिय नाम हो चुके थे. अपने गृह क्षेत्र बंगाल में हेमंत कुमार मुकोपाध्याय के नाम से संगीत की दुनिया पर राज़ कर रहे हेमंत की रबिन्द्र संगीत से नॉन फ़िल्मी गीतों तक या आधुनिक गानों से आम आदमी के संघर्ष को आवाज़ देते गानों तक हर विधा के संगीत पर दक्षता थी. उनके अंदर टैगोर के कठिन गीतों को भी गुनगुना सकने लायक बनाने की और रैडिकल कविताओं को भी अत्यधिक लोकप्रिय बना सकने की अलौकिक क्षमता थी.
नज़ाकत से भरा, कोमल, मधुर, सरल और मीठा संगीत हेमंत की विशेष पहचान, एक तरह से ट्रेड मार्क बन गया था, जो उन्हें उनकी मातृभाषा के संगीत से मिला था और वहां के अनुभव का जितना बेहतर, प्रयोगात्मक एवं अभिनव इस्तेमाल हेमंत दा ने किया उतना शायद ही कोई कर सकता है. उनकी अपनी आवाज़ में गाए बंगाली फिल्म ‘सुरजोमुखी’ (1956) के गाने `ओ बंशी ते डाके शे’ की प्रतिलिपि, फिल्म ‘चम्पाकली’ (1957) में लता की सुरीली आवाज़ में `छुप गया कोई रे’ या बंगाली फिल्म ‘पलातक’ (1963) के गाने `जीबोन पुरेर पथिक रे भाई’ का हिन्दी में फिल्म ‘राहगीर’ (1968) में `जनम से बंजारा हूँ बंधू’ के रूप में इस्तेमाल देखिये. हमारा आज का गाना `ये नयन डरे डरे’ उनकी खुद की दिव्य आवाज़ में बंगाली फिल्म ‘दीप जले जाए’ (1959) के एक हान्टिंग गाने `एई रात तोमार अमार’ पर आधारित है. लेकिन एक और अद्भुत बात जो शायद कम लोगों को ही पता है, वो ये कि `तुम पुकार लो’ भी इसी बंगाली गाने का इम्प्रोवाईज़ेशन है, जिसमें मूलभूत अवयवों को बिना छेड़े ऐसी शानदार धुन बना दी गयी है. तो हमें मिलते हैं एक ही धुन से तीन-तीन नगीने `एई रात तोमार अमार’, `ये नयन डरे डरे’ और `तुम पुकार लो’! और खुलती है गुत्थी कि आखिर क्यों दो धुनें एक साथ मुझे आबद्ध कर लेती हैं. एक जैसी ही रागात्मकता, एक सी ही लयात्मकता लेकिन दो बिलकुल अलहदा मधुर गाने. वाह! जैसे एक ही `की’ ने दो गानों को जन्म दिया हो. ऐसा चामत्कारिक था हेमंत दा का संगीत.
बनारस में जन्मे हेमंत अपने साथ मानो बनारस की धार्मिक दिव्यता और हार्दिकता लेकर चलते हैं. इस बात की पुष्टि हेमंत कुमार को श्रद्धांजली देते वक्त स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने ये कहकर की, कि `हेमन्त दा को सुनते हुए मुझे यूं लगता है कि जैसे मैं मन्दिर में बैठे किसी साधु को भजन गाते सुन रही हूँ.’
दूसरी तरफ ये दिव्यता उनकी सीमा भी बनती है. उनका गाया बीस साल बाद फिल्म का गाना `ज़रा नज़रों से कह दो जी’ बहुत मीठा है, लेकिन जिस किस्म की मादकता और नखरे गाने को बोल के हिसाब से चाहिए थे शायद वो नहीं मिलते. वहीं फिल्म ममता का गाना `छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा’ आवाज़ की दिव्यता की वजह से आत्म बलिदान से भरे प्रेम की चरम अभिव्यक्ति बन जाता है.
हेमंत कुमार के संगीत का जादू पचास और साठ के दशक में कलकत्ता और बॉम्बे दोनों ही फिल्म इंडस्ट्रीज में राज़ करता रहा. ‘नागिन’, ‘कोहरा’, ‘बीस साल बाद’, ‘खामोशी’, ‘अनुपमा’, ‘शर्त’, ‘साहिब बीबी और ग़ुलाम’ जैसी सुपर हिट फिल्मों की सफलता में इसके अमर संगीत का बहुत बड़ा योगदान है. उन्हें इच्छित आवाज़ पैदा करने के लिए उचित इंस्ट्रूमेंट का चुनाव और इन इंस्ट्रूमेंट्स के समुचित इस्तेमाल से राग के पक्के सुरों तक पहुंचने का रास्ता अच्छे से आता था. उनके फिल्मिस्तान के बैनर तले बनी फिल्म ‘नागिन’ के लिए उन्होंने कुल बारह सदा बहार गाने बनाए थे. विचित्र बात ये थी कि उनमें संपेरे की बीन का इस्तेमाल कहीं नहीं हुआ है. अपने सहायक कल्याणजी वीरजी शाह के साथ उन्होंने हारमोनियम और क्लेवॉयलिन के ऊपर बीन की आवाज़ निकाली और इस्तेमाल किया. आँखें बंद कर याद कीजिये. नागिन धुन के नाम पर आपके दिल में उठने वाली बीन की आवाज़. वही है न.
हेमंत कुमार के संगीत का मुक्त प्रवाह शास्त्रीयता के बंधन में नहीं बंधता, बल्कि धुन के माध्यम से सरल और सच्ची भावनाओं की अभिव्यक्ति इतने सहज तरीके से करता है, कि सुनने वाले को लगता है, कि रोमांटिक गानों के लिए इससे बेहतर संगीत हो ही नहीं सकता. यही कारण है कि हिन्दी फिल्मों के इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब `ये रात ये चांदनी फिर कहाँ’ गाने को `अब तक के सबसे रोमांटिक गाने’ की संज्ञा दी गयी. ऑनस्क्रीन यानि पर्दे पर दिखने एवं ऑफ़स्क्रीन यानि सिर्फ सुनने, दोनों ही तरीकों से. हवा के झोंकों से भरा समन्दर का रेतीला किनारा. काले बादलों से लुका-छिपी सा खेलता चाँद. चाँद निकलता है बादलों की ओट से या खूबसूरत गीता बाली बॉलकनी में आती हैं. आकर्षक देव आनंद समन्दर की लहरों पर बज रहा कोई धीमा-धीमा राग गिटार की झंकार से अपने इस चाँद को, अपनी प्रेमिका को पहुंचा रहे हैं. प्रेमिका समन्दर से आती प्रेम की भीगी हवाओं में रची ठंडी आग में जल रही है. उसके लिए धडकनों की जुबां को नज़र अंदाज़ करना नामुमकिन हो जाता है. किसके लिए मुमकिन होता भला? जिस अंदाज़ से हेमंत `दास्ताँ’ कहते हैं, ऐसा लगता है जैसे सदियों पुरानी कोई कहानी है, जो कोई किसी को सुनाना चाहता. ये उन दोनों की ही नहीं बल्कि प्रेम की ही सार्वकालिक दास्ताँ बन जाती है.
ये वो गाना है जो चाँद की रूमानियत का पर्याय है. ये वो गाना है जिसने युवाओं में प्रेम के ख्वाब बुने थे. आज भी बुन रहा है. ‘जाल’ (1952) एक ऐसी फिल्म साबित हुई जिसने जताया कि इंडस्ट्री के सबसे क़ाबिल लोगों के एक साथ होने पर किस किस्म का जादू हो सकता है. सचिन देव बर्मन का संगीत जो सुनने वालों की नस-नस से वाकिफ़ थे, चांदनी रात के सबसे खूबसूरत बिम्बों से रंगे-सजे गीत के बोल लिख सकने वाले साहिर के बोल, प्रतिभाशाली निर्देशक गुरु दत्त की असीमित कल्पनाशीलता, हर दिल अजीज़ देव आनंद का अनोखा अंदाज़, चुलबुली गीता बाली की चंचल अदाएं और अपनी अनोखी हमिंग के लिए विख्यात सरस आवाज़ के साथ हेमंत कुमार.
हर गाने के साथ, गाने के मूड एवं स्वभाव के लिहाज़ से सही निभ जाने वाली आवाज़ को जानने की बर्मन दा की अलौकिक प्रतिभा का ही नतीजा था कि हेमंत कुमार को उनके कैरियर के सबसे हसीन रोमांटिक गानों में से एक ये गाना गाने को मिला. साथ ही साथ उनकी आवाज़ सदाबहार देव साहब की प्लेबैक आवाज़ के रूप में स्थापित हो गयी. खुद हेमंत दा ने पियूष शर्मा को 1989 में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि `उनकी (देव आनंद की) पर्दे की छवि और मेरी आवाज़ की रोमांटिक जोड़ी बनाने का काम सचिन बाबू ने किया. लोगों ने इसे बहुत पसंद किया. वो गाने वाकई बहुत लोकप्रिय रहे.’
एक संगीतकार के रूप में बर्मन दा ने इस गाने में एक तुरुप की चाल चली है, एक ऐसा प्रयोग किया है जिसे आप तब ही कर सकते हैं जब आपको अपनी कला पर विशेषज्ञता हासिल हो. हेमंत कुमार अंतरा गाते हुए, पिच को ऊपर ले जाते हुए अंतरे की पहली लाइन दुबारा बोलते हैं लेकिन आधा.
लहरों के होठों पे धीमा धीमा राग है
लहरों के होठों पे
इस गाने का कभी न खत्म होने वाला असर इसे यूट्यूब पर देखने वालों की संख्या से भी पता चलता है, जो लाखों में हैं.
हेमंत दा के गानों की ख़ास बात ये भी है कि वो म्यूज़िक के अतिरेक से भरे नहीं होते, बहुत लाउड नहीं होते, न ही फिल्म देखते वक्त ये आपके ऊपर हावी होते हैं, न ही आपको कहानी से अलग खींचकर ले जाते हैं, बल्कि बहुत हौले से आप के दिलो-दिमाग़ में घुल जाते हैं, जिसे आप बाद में, तन्हाई में, कभी उदासी में गुनगुनाना चाहते हैं. हमारे आज के गाने को ही लीजिये `ये नयन डरे डरे’ जिस तरह के बोल हैं, सीन सीक्वेंस हैं उसी तरीके का म्यूज़िक. किसी इंस्ट्रूमेंट का कोई शार्प नोट आपको डराता या चौंकाता नहीं बल्कि इसका संगीत आपके साथ हो लेता है, हौसला देता सा लगता है.
ये गीत लिखा है मशहूर शायर सय्यद अख्तर हुसैन रिज़वी ने, जिन्हें हम कैफ़ी आजमी के नाम से जानते हैं, जिन्होंने उर्दू साहित्य को हिन्दी फिल्मों का एक बड़ा प्लेटफोर्म दिया. या यूं कहें कि फिल्मों को साहित्य की सौगात दी.
रात हसीं ये चाँद हसीं
पर सबसे हसीं मेरे दिलबर
गाने में एक प्रेयसी है, पत्नी है. वहीदा रहमान. खूबसूरत वहीदा रहमान. बला की खूबसूरत वहीदा रहमान. और ये ख़ूबसूरती उनकी आँखों में छिपे डर, संकोच और अविश्वास की वजह से और भी बढ़ जाती है. गाने और कहानी की मांग के हिसाब से ही हैं ये नयन. गाने में एक प्रेमी है, पति है. विश्वजीत. जो अपने खूबसूरत शायराना अलफ़ाज़ से उन्हें विश्वास दिलाना चाहते हैं. प्रेम पर विश्वास. प्रेयसी की अपनी ख़ूबसूरती पर विश्वास. प्रेयसी के कभी न हारने वाले विश्वास पर विश्वास. जीवन पर विश्वास.
मैं मान भी लूं कभी हार
तू माने ना
देखकर एक आश्वस्ति की सांस आती है कि कम से कम इस गाने के ख़त्म होने तक प्रेयसी को इस प्रेम नाम की शय पर विश्वास हो जाता है.
तो अगर कहीं वक्त के झंझावातों से आपका जीवन शुष्क होता महसूस हो रहा है, आपको इस प्रेम से भीगी आवाज़ को सुनना चाहिए. यूट्यूब के लिंक पर जाकर इस गाने को सुनना चाहिए. हेमंत दा की दुलराती हुई आवाज़ आपको फिर से जीवन रस से सराबोर कर देगी.
ये नयन डरे डरे, ये जाम भरे भरे
ज़रा पीने दो
कल की किसको खबर, इक रात होके निडर
मुझे जीने दो
ये नयन डरे डरे...
रात हसीं ये चाँद हसीं
पर सबसे हसीं मेरे दिलबर
और तुझसे हसीं,
और तुझसे हसीं तेरा प्यार
तू जाने ना
ये नयन डरे डरे...
प्यार में है जीवन की खुशी
देती है खुशी कई गम भी
मै मान भी लूँ,
मै मान भी लूँ कभी हार
तू माने ना
ये नयन डरे डरे...
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रुचिता तिवारी/ अमित श्रीवास्तव
यह कॉलम अमित श्रीवास्तव और रुचिता तिवारी की संगीतमय जुगलबंदी है. मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा यह लेख रुचिता तिवारी द्वारा लिखा गया है. इस लेख का अनुवाद अमित श्रीवास्तव द्वारा काफल ट्री के पाठकों के लिये विशेष रूप से किया गया है. संगीत और पेंटिंग में रुचि रखने वाली रुचिता तिवारी उत्तराखंड सरकार के वित्त सेवा विभाग में कार्यरत हैं.
उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता). काफल ट्री के अन्तरंग सहयोगी.
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शानदार जुगलबन्दी।जानकारी भरा वाचन और लेख ।इस गीत को मैंने भी गाने की कोशिश की है।
साधुवाद kaafaltree।
Loved it???