समाज

पहाड़ियों की अंग्रेजी टैट है

दिन भर की थकी हारी आमा जैसे ही सूरज डूबने के बाद घर में घुसी तो देखा किशन अंदर चारपाई पर पसरा हुआ है. आमा किशन पर झल्लाते हुए बोली: “किशन्या! कि डी-टोप दिरा त्वेलि ये बे टैम में?” (किशन! क्या डी-टोप दे रखी है तूने ये बे-टाइम में?). “उठ! हाथ-मुख ध्वे बेरे बत्ती जगौ” (उठ! हाथ-मुँह धो के बत्ती जला). किशन ने आज आमा के मुँह से “डी-टोप” नाम का नया शब्द सुना था. अमूमन आमा बच्चों के आलस में जहाँ-तहाँ पड़े रहने के लिए “टोप” शब्द का इस्तेमाल किया करती थी और यदा-कदा किशन से कहती भी रहती थी “खालि कि टोप दिरा त्वेलि, किताब पढ़ लिने थ्वाड़ देर” (खाली क्या टोप दे रखी है तूने, किताब पढ़ लेता थोड़ी देर). पहाड़ी शब्द टोप का हिंदी मतलब हुआ बिना वजह जहाँ-तहाँ आलस में पड़े रहना या सो जाना. लेकिन “टोप” के साथ आज आमा ने “डी” लगाया था जिसका मतलब जानने के लिए किशन अकुलाहट से भरा पड़ा था.
(English Word in Kumaoni)

पहाड़ के अधिकतर मर्द उन दिनों काम की तलाश में दिल्ली ज़ाया करते थे. फ़ौज के बाद पहाड़ी मर्दों का दूसरा सबसे प्रिय शग़ल होता था दिल्ली जाकर ड्राइवरी करना. दिल्ली में इन मर्दों का जीवन चाहे नरक जैसा बीत रहा हो लेकिन छह महीने-साल भर बाद जब कभी ये गाँव घरों को छुट्टी आते तो अपने साथ शहरी तमीज़ नाम की पोटली बाँध लाते जिसमें चार-छह अंग्रेज़ी के टूटे-फूटे शब्द होते और दो-चार जोड़ी पालिका और सरोजिनी नगर से ख़रीदे हुए कपड़े. गाँव के बच्चों के साथ ही महिलाएँ इनके चाल-ढाल और बोल-चाल को बड़े गौर से देखती व सुनती थी. ऐसे ही किसी एक विलेज कम विलायती बाबू से आमा ने “डी-टोप” शब्द सुन लिया था जिसमें डी का मतलब डॉग यानी कुत्ता और टोप का मतलब आलस में पड़े रहना था. दिल्ली से आए इन ड्राइवर साहब ने “टोप” शब्द तो दिल्ली जाने से पहले गाँव में कई बार इस्तेमाल किया था लेकिन दिल्ली में पैदा हुए अंग्रेज़ी से इनके प्रेम ने पहाड़ी डिक्शनरी को एक नया शब्द दिया “डी-टोप” यानी कुत्ते की तरह कहीं भी पड़े रहना या सो जाना.

गाँव में इस शब्द की आमद के साथ ही सब आलसी बच्चों के लिए “डी-टोप” शब्द इस्तेमाल किया जाने लगा. कई बुजुर्गों को तो इसका असल मतलब पता भी नहीं था फिर भी फ़ैंसी सा लगने वाला यह शब्द आलसी बच्चों को हड़काने के लिए उनकी ज़ुबान का हिस्सा सा बन गया. जिस घर में भी बच्चे बेटाइम सो रहे होते या आलस में ऊँघ रहे होते तो कोई न कोई बोल ही देता “कि डी-टोप दिरा ल? के काम-धाम नाहान त्वेथैं?” (क्या डी-टोप दे रखी है? कोई काम-धाम नहीं है तेरे पास?). गाँव में पले-बड़े किशन को भी कई साल बाद शहर में नौकरी करते हुए “डी-टोप” शब्द का असली मतलब समझ आया.

ऐसे और भी तमाम अंग्रेज़ी के शब्द थे जिन्हें गाँव वालों ने अपनी सुविधानुसार अपने दैनिक जीवन की डिक्शनरी का हिस्सा बना लिया था. जंगलायत बहुल क्षेत्र होने के कारण उत्तराखंड के तमाम गाँवों में जंगलायत के अधिकारी व कर्मचारी रहा करते थे. इन कर्मचारियों में से एक गाँव के ही ताऊ जी थे जिन्हें जंगलायत में डीएलएम (डिवीजनल लॉजिंग मैनेजर) के पद पर नौकरी मिल गई थी. पूरे गाँव में हो-हल्ला हो गया कि ताऊ जी “डेलम साहब” बन गए. अब आलम यह था कि ताऊजी गाँव में कहीं भी निकलते तो सब लोग उनके पद का मान रखते हुए उनका सत्कार करते और आवभगत में कहतेः “जंगलायत में डेलम बन्नू मज़ाक़ झोक भै” (जंगलायत में डेलम बनना कोई मज़ाक़ थोड़ी है).
(English Word in Kumaoni)

गाँव का बच्चा-बच्चा ताऊ जी को सिर्फ डेलम साहब के नाम से जानता था. ताऊ जी ताउम्र डेलम साहब के नाम से जिये और मरने के बाद भी डेलम साहब के नाम से ही याद किये गए. गलती से जंगलायत का कोई अधिकारी ताऊ जी को खोजता हुआ गाँव आ जाता और पूछता कि “डीएलएम साहब कहाँ मिलेंगे?” तो गाँव के लोग अधिकारी की जानकारी दुरुस्त करते हुए कहतेः “अच्छा डेलम साहब! वो तो साहब घर पर ही मिलेंगे”. जंगलायत में डीएलएम क्या होता है यह गाँव में किसी को नहीं पता था लेकिन डेलम साहब को बच्चा-बच्चा जानता था.

ऐसा ही कुछ हाल गाँव वालों ने डीएफओ (डिविज़नल फ़ॉरेस्ट ऑफिसर) साहब की रैंक के साथ किया. गाँव में खबर फैली की जंगलायत में एक नए अफ़सर साहब आए हैं जिन्हें “डेफू साहब” के नाम से जाना जाता है. डीएफ़ओ साहब की रौबदारी, रहन-सहन और पहनावा देख पूरा गाँव उनकी अफ़सरी का मुरीद हो गया. पूरे गाँव के लिए अब अफ़सर होने का मतलब था “डेफू साहब” होना. बच्चों द्वारा किसी बात को न मानने या ज़्यादा टशन में रहने पर उन्हें उलाहना के तौर पर गाँव के लोगों की तरफ़ से कई बार कहा जाताः “होश में रौ होश में! अत्ति डेफू साहब बन्ने ज़रूरत नाहान” (होश में रह होश में! ज्यादा डेफू साहब बनने की ज़रूरत नहीं है). कई माँ-बाप अपने बच्चों का हौसला बढ़ाने के लिए डेफू शब्द का इस्तेमाल करते और कहतेः “च्याला! पढ़ले-लेखले तबै त डेफू साहब बनले” (बेटा! पढ़ेगा-लिखेगा तभी तो डेफू साहब बनेगा). डेफू शब्द गाँव में इस हद तक प्रचलित हो गया कि जंगलायत के कर्मचारी तक डीएफ़ओ को डेफू साहब कहने लगे. कई बार तो ऐसा लगता था मानो खुद डीएफ़ओ साहब सोच रहे हों कि मैं डीएफ़ओ ही हूँ या डेफू हूँ!

अंग्रेज़ी के शब्दों की समझ न होने के बावजूद उन्हें अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करना उस समय के कम पढ़े लिखे पहाड़ियों की कला का एक नमूना भर था. पहाड़ियों की सबसे बड़ी ख़ासियत यही थी कि वह खुद के नए गढ़े गए शब्दों का अपनी सुविधानुसार अलग-अलग परिस्थितियों में भरपूर इस्तेमाल कर लिया करते थे. इन गढ़े गए शब्दों का इस्तेमाल कई बार अटपटा भी नहीं लगता था बशर्ते आप उन शब्दों को बहुत अच्छे से जानते न हों. कई बार कोई जानकार व्यक्ति इन गढ़े गए शब्दों का असल उच्चारण बताता भी तो गाँव के लोग उसे हिक़ारत की नज़र से ऐसे देखते जैसे उसने सही उच्चारण बताकर कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो. गाँव वालों को आज भी डेलम साहब और डेफू साहब बोलने में जो आनंद की अनुभूति मिलती है वो उनके सही उच्चारण से कभी मिल ही नहीं सकती.
(English Word in Kumaoni)

कमलेश जोशी

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

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Sudhir Kumar

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