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शौरसेनी से उपजी है कुमाऊनी भाषा

उत्तराखण्ड राज्य के दो मण्डल – कुमाऊँ तथा गढ़वाल में से कुमाऊं मंडल में कुमाऊनी भाषा बोली जाती है. वर्तमान में कुमाऊं के अंतर्गत नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, ऊधमसिंह नगर, बागेश्वर तथा चम्पावत – ये छः जिले आते हैं. इनमें से पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील के अंतर्गत दारमा, व्यांस तथा चौंदास में रं बोली क्षेत्र, मुनस्यारी तहसील का जोहार क्षेत्र तथा चम्पावत व पिथौरागढ़ जिलों के राजी बोली क्षेत्र और ऊधमसिंह नगर जिले के थारू-बोक्सा भाषी क्षेत्र को छोड़कर शेष कुमाऊं में कुमाऊनी भाषा बोली जाती है.

जीविकोपार्जन के लिए देश-देशान्तरों में गए हुए कुमाऊनी लोग भी अपनी भाषा में व्यवहार करते हैं. विदेशों में बसे हुए कुमाऊनियों में भी अपनी भाषा के प्रति ललक बनी हुई है. कुमाऊनी भाषा के उत्तर में जोहारी तथा रं ल्वू, पूर्व में नेपाली, पश्चिम में गढ़वाली तथा दक्षिण में हिन्दी बोली जाती है. प्राचीन साहित्य में इसके लिए पर्वतीय भाषा का कूर्मांचली भाषा का प्रयोग हुआ है.

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार कुमाऊनी भाषा भाषियों की संख्या 20,07,383 थी.

कुमाऊनी भाषा का प्रारम्भिक रूप तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से कुमाऊं के चंदवंशीय शासकों के ताम्रपत्रों में उपलब्ध है. ताम्रपत्रों में उपलब्ध कुमाऊनी के प्राचीन नमूनों में अंत में हृस्व स्वर की प्रवृत्ति, संस्कृत भाषा के शब्दों का प्रयोग तथा नेपाली भाषा का प्रभाव दिखाई देता है.

अठारहवीं शताब्दी तक आते-आते कुमाऊनी का अपना स्वरूप स्पष्ट होता गया. सन 1728 में पंडित रामभद्र त्रिपाठी द्वारा ‘वृद्ध चाणक्य’ नामक पुस्तक की कुमाऊनी में लिखी गयी टीका इसका प्रमाण है. प्रागैतिहासिक काल में आग्नेय परिवार की भाषा व्यवहार करने वाली कोल-किरात जातियां यहाँ निवास करती थीं. बाद में यहाँ पश्चिमोत्तर से खस जाति का प्रवेश हुआ जो पिशाच या दरद जाति से सम्बंधित थीं.

आदिम जाति की बोली को खस जाति की भाषा ने इतना प्रभावित किया कि यहां की प्राचीन बोली दबती चली गयी और उसके स्थान पर खस भाषा उभरती चली गयी.

दरद-खस भाषाओं की बहुत सी विशेषताएं आज भी कुमाऊनी में प्रचलित हैं. शौरसेनी अपभ्रंश और कुमाऊनी में प्राप्त ध्वनि, शब्द समूह तथा रूपात्मक संरचना की समानता के आधार पर कुमाऊनी को शौरसेनी से उत्पन्न माना जाता है. मध्यकाल में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश से अनेक जातियां कुमाऊं में आकर बस गईं, जिसके कारण इन स्थानों की भाषाओं का प्रभाव कुमाऊनी पर पड़ा है.

(भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण द्वारा प्रकाशित ‘उत्तराखंड की भाषाएँ’ के पहले अध्याय से. इस अध्याय का लेखन कैलाश चन्द्र लोहनी, उमा भट्ट तथा चंद्रकला रावत ने संयुक्त रूप से किया है.)

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