फोटो: इंदिरा बिष्ट
देवीधूरा में होने वाले बग्वाल के अगले दिन अपरान्ह धूमधाम के साथ देवी माँ का डोला उठता है.
इस अवसर पर ग्रामीण प्रातः काल से ही बड़ी संख्या में मंदिर परिसर पहुंचना शुरू कर देते हैं. नियत अनुष्ठानों और पूजा-पाठ के उपरान्त देवी की मूर्ति को एक लाल बक्से में धरे जाने के उपरान्त डोले का जुलूस निकलता है.
डोले में मंदिर के मुख्य पुजारी को बैठने का सम्मान मिलता है और समारोहपूर्वक यह जुलूस नज़दीक ही एक पहाड़ी की चोटी पर पहुँचता है. पहाड़ी की इस चोटी से हिमालय का विहंगम दृश्य दिखाई देता है. कुमाऊनी जनमानस में हिमालय का स्थान अनेक धार्मिक और मिथकीय परम्पराओं के चलते बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. यही कारण इस डोला परम्परा के मूल में है.
कुछ समय उक्त पहाड़ी पर रहने के उपरान्त देवी की मूर्ति को मंदिर में वापस लाकर उसकी प्रतिष्ठा की जाती है.
(यह रपट हमारे लिए राजकीय महाविद्यालय देवीधूरा में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत श्रीमती इंदिरा बिष्ट ने तैयार कर के भेजी है.)
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
पिछली कड़ी : उत्तराखंड विकास नीतियों का असमंजस उत्तराखंड में पलायन मात्र रोजगार का ही संकट…
पुराने समय की बात है. हिमालय की तराइयों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाने वाले…
तिब्बत और उससे जुड़े पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों का समाज लंबे समय तक भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक…
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों और कस्बों में जब कोई आगंतुक किसी…
नाम को तोड़-मरोड़ कर बोलना प्रत्येक लोकसंस्कृति की खूबी रही है. राम या रमेश को रमुवा, हरीश…
उत्तराखंड सरकार ने कृषि भूमि पर निर्माण व भूमि उपयोग संबंधित पूर्ववर्ती नीति में फेरबदल…