नैनीताल में कुत्ते. फोटो: अजय सिंह बिष्ट
आज जब नैनीताल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अनेक स्तरों पर जूझ रहा है यह देखना दिलचस्प होगा कि जिस नगर को बने अभी दो दौ साल भी नहीं बीते हैं उसकी ऐसी हालत कैसे हुई होगी. सी. डब्लू. मरफी की किताब ‘अ गाइड टू नैनीताल एंड कुमाऊँ’ (1906) के अंत में दी गयी अनेक सूचियों में कुछ ऐसे दस्तावेज हैं जो बताते हैं कि इस छोटे से नगर के रखरखाव के लिए अंग्रेजों ने कुछ ऐसे क़ानून बनाए थे ताकि यहाँ आने वाले लोगों की संख्या पर नियंत्रण बना रहे. (Dog Tax Nainital Municipality)
आपको नैनीताल की झील में बढ़ रहे मलबे और सीजन में लगने वाले ट्रैफिक जाम की ख़बरें मिलती रहती होंगी. एक नई तरह की खबर नैनीताल नगर के कुत्तों के लेकर छपना शुरू हुई है जिसमें कुत्तों के काटने से होने वाली दुर्घटनाओं की सूचना होती है. कई बार तो कुत्तों के काटने से निरपराध लोगों की जानें भी गयी हैं. (Dog Tax Nainital Municipality)
आज से करीब एक सौ बीस साल पहले नैनीताल नगर में कुत्ता मालिकों द्वारा नगरपालिका को हर साल दो रुपये प्रति कुत्ता हर साल का कुत्ता टैक्स देना होता था. जो भी पालतू कुत्ता नगरपालिका की सीमा में एक महीने से अधिक की अवधि के लिए रहता था उसके लिए यह टैक्स भरा जाना होता था.
चम्पावत और टेहरी के राजाओं द्वारा भी कुत्ता टैक्स वसूले जाने के उद्धरण मिलते हैं अलबत्ता वहां राजाओं द्वारा पाले जाने वाले कुत्तों की परवरिश का भार आम जनता को उठाना होता था.
कुत्तों के यह टैक्स घोड़ों, खच्चरों और टट्टुओं के लिए भी देना होता था. यदि इनमें से कोई भी पशु नैनीताल नगरपालिका की सरहद में न्यूनतम दस दिन से अधिकतम दो महीने तक रहता था तो उसके लिए 2 रुपये देने होते थे. दो महीने से आठ महीने के लिए यह टैक्स बढ़कर 6 रूपये हो जाया करता था. आठ महीने से एक साल तक की अवधि के लिए इसमें दो रुपए और यानी कुल आठ रुपये का टैक्स भरना होता था.
सामान्य व्यक्तियों द्वारा झील से निकाली गयी बजरी पर प्रति 100 क्यूबिक फीट पर आठ आने की रॉयल्टी ली जाती थी.
नगरपालिका के दायरे में आने वाली किसी भी खदान से पत्थर निकालने पर प्रति100 क्यूबिक फीट पर एक रुपए की रॉयल्टी ली जाती थी.
नगरपालिका के जंगल से एक कुली द्वारा उठाये जा सकने वाले भार के समतुल्य रिंगाल और ब्रशवुड पर चार आने की रॉयल्टी देनी होती थी.
विभिन्न आकार-प्रकार की नावों पर दो रुपये से पांच रुपये प्रति नाव टैक्स लगता था.
इसके अलावा नैनीताल की माल रोड पर ट्रैफिक संबंधी अनेक नियम भी हैं जिन्हें पढ़कर हैरत होती है कि ये नियम कितने दूरदर्शी थे. ध्यान रहे उस समय गाड़ियां नहीं होती थीं लेकिन ऐसे पर्वतीय नगर की शान्ति के लिए यहाँ आने वाले वाहनों की संख्या पर प्रतिबन्ध लगाने के बारे में अंग्रेज एक शताब्दी पहले ही सोच चुके थे. जल्द ही इस बारे में एक पोस्ट आपको अलग से पढ़ने को मिलेगी.
नगरपालिकाएं आजकल कुत्तों पर टैक्स लगाती हैं या नहीं यह हमें नहीं पता. हमें यह भी नहीं पता कि आगामी वर्षों में नैनीताल के ट्रैफिक को काबू में लाने के लिए किसी ब्लूप्रिंट पर काम हो रहा है या नहीं लेकिन इतना तय है कि बिना इन पुराने नियमों का पुनर्पाठ और संशोधन किये नैनीताल का बचना असंभव है.
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