संस्कृति

7वीं तक पढ़े ढोल वादक सोहन लाल को डी.लिट की उपाधि

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय ने उत्तराखंड के प्रसिद्ध ढोल वादक सोहन लाल को डॉक्टर ऑफ लेटर्स (डी.लिट) की उपाधि से नवाजा. ढोल वादक सोहन लाल के संगीत की थाप देश ही नहीं विदेशों तक में गूंजी है. उन्होंने ढोल न केवल देश और दुनिया में बजाया बल्कि विदेशियों को ढोल वादन की कला भी सिखाई. (Dhol player Sohan Lal D.Litt)

ढोल वादन और उत्तराखंड की इस संस्कृति को विदेशों तक पहुंचाने वाले सोहन लाल सिर्फ सातवीं तक पढ़े हैं. कला के प्रति उनके लगाव और उनकी कड़ी मेहनत का नतीजा है कि आज शिक्षा के क्षेत्र की सबसे बड़ी डिग्री उन्होंने प्राप्त की. सोहन लाल को जब उनकी पत्नी कौंसी देवी के सामने यह सम्मान दिया गया तो उनकी आँखें भर आई.  

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 मूल रूप से टिहरी जिले के पुजारगांव (चंद्रबदनी) निवासी सोहन लाल का जन्म 1 जनवरी 1966 को हुआ. सोहन लाल ने ढोल की प्रारंभिक शिक्षा पिता स्व. ग्रंथी दास से प्राप्त की. सोहन लाल के जीवन में संगीत के सुर उनकी माता स्व. लौंगा देवी ने बोए. घर की खराब आर्थिक की वजह से सोहन लाल की शिक्षा सातवीं से आगे नहीं बढ़ पायी.

पहाड़ के कई मंदिरों में सुबह-शाम या किसी ने शुभ अवसर पर ढोल बजाने का रिवाज है जिसे नौबत कहा जाता है. नौबत बजाने वाले वादक बाजगी या दास कहलाते हैं. सोहन लाल का जन्म एक ऐसे ही परिवार में हुआ. आस-पास के गांवों और अपने गांव के मंदिर में सुबह और शाम नौबत में ढोल वादन के कारण ही 13 साल की उम्र में उनकी सातवीं से आगे की पढ़ाई छूट गई.

अपनी कला में समृद्ध सोहन लाल नौबत के 18 ताल, शादी के 12 ताल जानते हैं. पांडव, गोरिल, बगडवाल, दिशा धनकुड़ी, नागराजा और आंचारी नृत्य में प्रयोग होने वाले सभी ताल में उन्हें महारत हासिल है. सभी रूपों के गथा गायन के अलावा उन्होंने नरसिंह, भैरव, निरंकार, चैतवाली, सैंदवली, रणभूत, घरभूत, घंडियाल और कई अन्य आनुष्ठानिक नृत्य परंपराओं में प्रयुक्त वादन में भी धाक जमाई है.

सोहन लाल ने ढोल वाद्य कला की थाप को अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देशों तक पहुंचाने में अपना योगदान दिया है. उन्होंने मैक्वरी विवि, आस्ट्रेलिया के प्रोफेसर एंड्रयू अल्टर और सिनसिनाटी विवि संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रोफेसर स्टीफन ऑल्टर को ढोल कला सिखाई. उन्हें सिनसिनाटी विवि संयुक्त राज्य अमेरिका में विजिटिंग फैकल्टी के रूप में भी नामांकित किया गया. उन्होंने यहां के प्रोफेसर स्टीफन को अपने गांव पुजारगांव में तीन महीने तक ढोल वाद्य कला भी सिखाई. (Dhol player Sohan Lal D.Litt)

इनपुट : दैनिक हिन्दुस्तान से साभार

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Sudhir Kumar

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  • बहुत ही सुन्दर और सही निर्णय। श्री सोहन लाल जी को ढेरों बधाई । अन्य सांस्कृतिक कर्मियों जे किया ये प्रेरणा दायक होगा ।

    वी के डोभाल
    उत्तराखंड

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