अशोक पाण्डे

मुनस्यारी के जांबाज़ धरमसिंह मरतोलिया और उनका कुनबा

कोई बीस बरस पहले धरमसिंह लकड़ी काटने जंगल गए थे जब भालू ने उन पर हमला बोल दिया. उनका छोटा सा पोता उनके साथ था. उन्होंने एक हाथ से बच्चे को सम्हाला और दूसरे में थमी दरांती से भालू पर तब तक वार करते रहे जब तक वह भाग नहीं गया. इस बीच भालू उनके दाएं हाथ और बांह को बुरी तरह चोटिल कर चुका था. Dharam Singh Martolia

मुनस्यारी से कोई दो किलोमीटर दूर सरमोली गाँव के एक कोने में, मर्तोलीथौड़ की विराट चट्टान के साए में, एक क्षीण सी जलधारा की ऐन बगल में अकेले रहने वाले करीब सत्तर साल के धरमसिंह मरतोलिया का पैतृक गाँव सुदूर जोहार घाटी में है जहाँ के ज्यादातर घर पलायन के चलते वीरान हो चुके हैं. जंगल में मिलने वाले बनैले पशुओं के साथ मुठभेड़ के अनंत किस्से हैं उनके पास.

खेतों के थोड़े से टुकड़े, बीस-बाईस बकरियां और दो नए खरीदे गए घोड़े उनकी कुल पूंजी का निर्माण करते हैं, जिसकी देख-सम्हाल में वफादार, झबरैले कुत्तों का एक छोटा सा कुनबा उनका साथ देता है. शिव के भक्त हैं धरमसिंह और अपने आँगन में उन्होंने उनका थान भी स्थापित किया हुआ है.

मुनस्यारी और उसके आसपास का इलाका सिर्फ पंचचूली चोटियों के सौन्दर्य का ठाठ भर देखने की चीज नहीं है. इसकी बर्फीली आबोहवा और बेहद मुश्किल भूगोल में रहने-जीवन काटने वाले जांबाज़ बहादुरों की निर्मल-निश्छल मुस्कराहट से रू-ब-रू हो पाना उससे भी बड़ी नेमत है. Dharam Singh Martolia

तस्वीरें देखिये :

झबरैले कुत्तों का एक छोटा सा कुनबा
दो नए खरीदे गए घोड़े

-अशोक पांडे

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