कला साहित्य

दरियागंज का ऐतिहासिक किताब बाजार बंद

दिल्ली में किताबों के क़रीब जाने का सबसे अच्छा तरीक़ा होता था दरियागंज के फुटपाथ में रविवार को लगने वाला पुस्तक बाज़ार. थोड़ी सी मसक्कत और छानबीन के बाद आपको वो किताब नजर आ ही जाती थी जिसकी आपको तलाश होती थी. किताबें तो आपको किसी भी बाज़ार में मिल जाएंगी लेकिन दरियागंज के बाज़ार की खास बात यह थी कि यहाँ मिलने वाली किताबें आपके मोल भाव की काबीलियत को ऐसा निखारती थी कि 1000 रुपये के बजट में आप इतनी सारी किताबें ले आते थे जितने में आम बाज़ार से सिर्फ एक या दो किताबें ख़रीदी जा सकती थी. कम ही लोगों को ख़बर है लेकिन दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि 55 साल से दरियागंज में लगने वाले इस बाज़ार को अब बंद कर दिया गया है.

1974 में शुरू हुए इस बाज़ार को दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली ट्रैफिक पुलिस द्वारा जमा एक रिपोर्ट के आधार पर बंद करने का आदेश जारी किया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि नेताजी सुभाष मार्ग व आसिफ़ अली रोड पर लगने वाले पुस्तक बाज़ार की वजह से ट्रैफिक कंट्रोल में दिक़्क़तें पेश आती हैं और पैदल यात्रियों को चलने की जगह नहीं मिलती. लेकिन अगर रविवार को छोड़ किसी और दिन की भी बात करें तो दरियागंज के उस बाज़ार में रविवार के मुक़ाबले कई ज़्यादा भीड़ नजर आती है. पुस्तक बाज़ार के लिए रविवार का दिन चुनने का एक कारण यह भी रहा होगा कि उस दिन दरियागंज का बाज़ार बंद रहता है और पुस्तक विक्रेता उन दुकानों के बाहर आधे फुटपाथ में अपनी दुकानें लगा सकते हैं. रविवार के दिन दिल्ली का कामकाजी आदमी घर से बाहर कम ही निकलने की कोशिश करता है और अगर निकलता भी है तो शाम को. इसलिए दिल्ली पुलिस की यह दलील गले नही उतरती की पुस्तक बाज़ार वाले दिन यानि रविवार को दरियागंज में ज़्यादा भीड़ रहती है. यह भीड़ सामान्य दिनों की भीड़ जितनी ही होती है और सामान्यतया कम ही नजर आती है.

लगभग 200-250 पुस्तक विक्रेताओं वाला यह पुस्तक बाज़ार दिल्ली में पढ़ने वाले उन लाखों ग़रीब छात्रों के लिए पुस्तकालयी जन्नत का काम करता था जो बाज़ार से मंहगी किताबें नहीं ख़रीद सकते. बच्चों की सामान्य किताबों से लेकर, महँगे-महँगे उपन्यास, मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ, आईएएस व दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ायी जाने वाली तमाम किताबें छात्रों को यहाँ मिल जाया करती थी.

दरियागंज रविवार को पुस्तकालय में तब्दील हो जाया करता था जहॉं छात्र जाकर अपने मतलब की किताबों की घंटों छानबीन किया करते थे. लेकिन जब से इस बाज़ार के बंद होने का ऐलान हुआ है उन लाखों छात्रों में निराशा घर कर गई है. कुछ छात्रों में इसको लेकर ज़बरदस्त ग़ुस्सा भी है. दिल्ली में रहने वाले छात्रों के लिए यह बाज़ार उनके जेब पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को कम करने का एक साधन भी था जो अब छीन लिया गया है.

दिल्ली के अपने कॉलेज के दिनों को जब भी याद करता हूँ तो उसमें दरियागंज के पुस्तक बाज़ार जाना सबसे ज़्यादा यादगार क्षण होता है. आज भी जब कोई मुझसे किसी किताब की उपलब्धता के बारे में पूछता है तो मेरे मुँह से पहला नाम दरियागंज ही निकलता है. मुझे खुद अगर कुछ नई किताबें लेनी होती हैं तो उनकी लिस्ट बना लेता हूँ ताकि जब भी दिल्ली जाने का मौक़ा मिले तो एक बार दरियागंज घूम कर वो तमाम पुस्तकें औने-पौने दाम में ख़रीद लाऊँ. लेकिन अब यह शायद ही मुमकिन हो पाएगा.

उत्तरी दिल्ली म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ने रामलीला मैदान पर या डिलाइट सिनेमा के पास पुस्तक बाज़ार को शिफ़्ट करने का आश्वासन दिया है लेकिन डिलाइट सिनेमा के आस-पास इतनी जगह नही है कि वह 200 से ज़्यादा पुस्तक विक्रेताओं के लिए जगह उपलब्ध करा सके और रामलीला मैदान में आए दिन कोई न कोई कार्यक्रम होता ही है जिस वजह से वहां भी बाज़ार के यथावत चलने पर पुस्तक विक्रेताओं को संदेह है.

दरियागंज का पुस्तक बाज़ार सिर्फ एक बाज़ार नही है वह दिल्ली और दिल्ली में पढ़े तमाम छात्रों के लिए विरासत है. दिल्ली की रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. इस तरह के बाज़ार का अचानक बिना किसी बड़े कारण के यूं बंद किया जाना एक जीती जागती विरासत को तबाह करने जैसा है. छात्रों और दिल्ली सरकार को इस निर्णय के ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिये और किसी भी तरह इस बाज़ार को बचाने या किसी नई जगह यथावत पुनर्स्थापित करने का प्रयास करना चाहिये.

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

धरती की 26 सेकंड वाली धड़कन: लोककथा और विज्ञान का अद्भुत संगम

दुनिया के अनेक लोक कथाओं में ऐसा जिक्र तो आता है कि धरती जीवित है,…

5 months ago

कथा दो नंदों की

उपकोशा की चतुराई, धैर्य और विवेक से भरी कथा के बाद अब कथा एक नए…

5 months ago

इस बदलते मौसम में दो पहाड़ी रेसिपी

पहाड़ों में मौसम का बदलना जीवन की गति को भी बदल देता है. सर्दियों की…

5 months ago

अल्मोड़े की लखौरी मिर्च

उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक संपदा, पारंपरिक खेती और लोक संस्कृति के लिए जाना जाता है. पहाड़…

5 months ago

एक गुरु की मूर्खता

केरल की मिट्टी में कुछ तो है, या शायद वहाँ की हवा में, जो मलयालियों…

5 months ago

अगर आपके घर में बढ़ते बच्चे हैं तो जरूर पढ़ें एकलव्य प्रकाशन की किताबें

अगर आपके घर में बढ़ते बच्चे हैं, तो उनके भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी केवल…

5 months ago