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दानपुर परगना: जहाँ के मूल निवासी दाणौ या दाणू कहे जाते हैं

नंदाकोट पर्वत की तलहटी कुमाऊँ की प्रसिद्ध नदियों, सरयू व गोमती के तट पर बसा है दानपुर परगना. 1997 में बागेश्वर जिले में शामिल किये जाने से पहले तक दानपुर अल्मोड़ा जिले का हिस्सा हुआ करता था. इस समय तक कपकोट भी दानपुर परगना का ही हिस्सा था.

दानपुर परगना की तीन पट्टियां हैं— तल्ला दानपुर, मल्ला दानपुर और बिचला दानपुर.

ईस्ट इण्डिया कंपनी के शासन यानि 1861 से पहले पिंडर पार की पट्टियों व बधाण के सीमान्त गाँव से जुड़ा यह क्षेत्र गढ़वाल मंडल का हिस्सा हुआ करता था. कमिश्नर ट्रेल ने इसे कुमाऊँ मंडल में शामिल कर दिया. राजा सुदर्शन शाह ने कमिश्नर ट्रेल से ऐसा न किये जाने का अनुरोध किया, जिसकी परवाह नहीं की गयी.

पिंडर, सरयू और पूर्वी रामगंगा इसकी पूर्वी घाटियों का निर्माण करती हैं. दानपुर की पश्चिमी घाटी को सींचने का काम गोमती का है. यही गोमती बागेश्वर पहुंचकर सरयू में विलीन हो जाती है.

दानपुर की सीमाएँ जोहार, गढ़वाल, पाली, बारामंडल और गंगोली से मिलती हैं. उत्तर में यह सीमा पूर्वी रामगंगा तथा पिंडर के उद्गम क्षेत्रों तक और दक्षिण में शिखर पर्वत की छोटी तथा हड़वाड़ व सरयू के संगम तक मानी जाती है. कभी नाकुरी क्षेत्र भी दानपुर का हिस्सा हुआ करता था.

दानपुर के उत्तर में नंदाकोट, नंदादेवी, नंदाखाट, सुन्दरढुंगा की हिमालयी चोटियाँ हैं. मध्य में नामिक, जमतारा, धाकुड़ी आदि बुग्याल और जंगल हैं.

दानपुर के मूल निवासी दाणौ या दाणू कहे जाते हैं. यहाँ के एक गाँव शुभगढ़ के बारे में मान्यता है कि यह मूलतः शुम्भगढ़ है. पौराणिक कथाओं में देवी चंडी के द्वारा युद्ध में शुम्भ-निशुम्भ नामक दानवों का वध किये जाने का जो वर्णन पाया जाता है उसका सम्बन्ध इसी गाँव से है. इन लोगों के पूज्य देवता भी दाणौ ही हैं. जैसे—लालदाणौ, धामदाणौ, वीरदाणौ आदि.

कभी दानपुर में दानपुर कोट नाम का किला भी हुआ करता था, इस किले के अब अवशेष ही बचे हैं. दानपुर पट्टी के प्रमुख स्थान हैं— हड़सिल, कपकोट, बड़ियाकोट, सलिंग, लोहारखेत व श्यामधूरा. बड़ियाकोट में नंदादेवी का मंदिर भी है, जहाँ विशाल मेला लगा करता है. इसका अंतिम गाँव है झूनी.

उत्तराखंड ज्ञानकोष, प्रो. डी.डी. शर्मा के आधार पर

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Sudhir Kumar

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