फोटो: राज शेखर पन्त
शायद 69-70 के दशक की बात होगी, मैं तब भीमताल के एल. पी. इंटर कॉलेज में आठवीं या नवीं का छात्र रहा होउंगा. जून के आख़िरी सप्ताह या फिर जुलाई की शुरुवात थी. शाम के वक्त अचानक एक खबर सुनी, बाज़ार से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित हमारे घर पर शायद कोई आया होगा, उसने बताया था कि आर्मी की एक गाड़ी तालाब में गिर गयी थी. किसी मेजर या कर्नल का परिवार था उस गाड़ी में. घूमने आया था वह भीमताल, अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ- एक पांच-छह साल का लड़का और शायद दस-ग्यारह साल की लडकी. पति-पत्नी दोनों तालाब में गहरी डूब चुकी गाड़ी से किसी तरह बाहर निकल आये थे, पर बच्चे गहरे पानी में डूब गए थे. शवों को निकालने की नाकाम कोशिश शायद देर रात तक जारी रही थी. (Bhimtal Lake Kumaon Uttarakhand)
दूसरे दिन सुबह ठीक उसी समय जब मैं दुर्घटना स्थल से गुजरने वाली भीमताल की इकलौती सड़क से होता हुआ स्कूल जा रहा था, लोहे के हुक में फंसे दोनों बच्चों के शवों को रस्सी से ऊपर खींचा जा रहा था. लोहे की किसी स्ट्रेचरनुमा चीज़ में लिटा कर जब कुछ स्थानीय लोग बच्चों के शवों को ले जा रहे थे तब अब तक शांत खड़े उनके पिता को मैंने स्ट्रेचर पकड़ कर बिलख-बिलख कर रोते हुए देखा था. उनके रोने की आवाज़ बहुत दिनों तक मेरे कानों में गूंजती रही थी.
दिन बीतते चले गए. स्कूल आते-जाते हम बच्चे उस दुर्घटना स्थल से गुजरते हुए अक्सर खामोश हो जाया करते थे. उस हृदयविदारक घटना को भुला देना शायद तब इतना आसान नहीं रहा होगा. कुछ महीनो बाद मृत बच्चों के माता-पिता ने एक पत्थर ठीक उसी स्थान पर लगा दिया था जहाँ पर से वह गाडी तालाब में गिरी थी. ‘शिप्रा और शरद’ दोनों बच्चों के नाम अंकित थे उस पर, दुर्घटना की तिथि के साथ. अंत में लिखा था ‘जिन्हें चाह कर भी नहीं भुला पाए –हम दोनों.’ (Bhimtal Lake Kumaon Uttarakhand)
फोटो: राज शेखर पन्त
दो-तीन वर्ष और निकल गए, पर आते-जाते जब भी उस पत्थर और उस पर लिखी इबारत पर निगाह पड़ती मन कुछ विचलित सा हो जाया करता था. मैं प्रायः सोचा करता था, दो बच्चों को एक हादसे में अचानक खो देने के बाद कैसे कोई व्यक्ति इतना संतुलित रह सकता है कि भगवान् को कोसने, उस पर निर्दयी होने का इल्ज़ाम लगाने के बजाय, यह सोच कर स्वयं को सांत्वना दे कि उसके दो नन्हे बच्चे ‘श्री चरणों में समर्पित हुए?’ अपने नामों के स्थान पर ‘हम दोनों’ लिखा जाना मुझे कुछ ऐसा आभास कराता था जैसे वो गुमनाम रह कर, अपने दर्द को दुनिया के हंगामें में डुबा कर भुला देना चाहते थे. कुछ वैसे ही जैसे भीड़ का हिस्सा बन कर आदमी अपनी शख्सियत भूल जाता है.
समय बीतता चला गया, भीमताल से बारहवीं पास करने के बाद मैं पढने बाहर चला गया. इस बीच सड़क के किनारे बने पैरापिट्स को हटा कर रेलिंग लगा दी गयी थीं. स्थानीय ठेकेदार ने बहुत जतन से उस पत्थर को निकाल कर उसे दो रैलिंग्स के बीच एक चबूतरा सा बना बहुत ख़ूबसूरती से दोबारा लगा दिया था. पढ़ाई, नौकरी और दुनियादारी के चक्कर में किशोरावस्था की रूमानियत धीरे-धीरे पता नहीं कब और कहाँ खो गयी. पर हाँ, छुट्टियों में जब घर आता होता तब इस पत्थर को देख कर समय, कुछ देर के लिए ही सही, थम सा जाता था. शैले की एडोनीज़ या प्रसाद की आँसू की छात्र जीवन में पढी हुई पंक्तियाँ हाँट करने लगती थीं … खैर …
वर्षों बाद अब फिर लौट आया हूँ अपने घर. बीस-पच्चीस दिनों तक सैटल होने की प्रक्रिया से गुजरने के बाद ख़याल आया कि मार्निंग वाक का पुराना सिलसिला फिर से शुरू किया जाये. पहले ही दिन अपने बचपन के मित्र जगमोहन के साथ उस सड़क से गुजरते हुए अचानक उस पत्थर पर निगाह पड़ी. पत्थर आधा टूट चुका था, मजबूत सीमेंट से बना हुआ उसका बेस भी टूटा हुआ था. जगमोहन ने बताया कि किसी ने कार बैक करते समय उस पर टक्कर मार दी थी. हमने आस-पास उन टूटे हुए टुकड़े को ढूँढने का निरर्थक प्रयास भी किया. मन कुछ उदास सा हो गया. सड़क पर आगे बढ़ते हुए मैं महसूस कर रहा था कि वक्त के गलियारे में मैं कहीं पीछे की ओर धकेला जा रहा हूँ, न चाहते हुए भी.
कितना बदल गया है समय, सिर्फ चंद दशकों में. किसी की भावनाएँ, वेदना, सेंटीमेंट्स इत्यादि आज कुछ मायने ही नहीं रखते. न जाने कितने लोगों ने उस पत्थर को टूटते-बिखरते हुए देखा होगा, अलावा उस ड्राईवर के जिसने इसे तोड़ा था. निश्चय ही बहुत से ऐसे लोग वहां ऐसे भी रहे होंगे जो वर्षों पूर्व घटी इस दुर्घटना के साक्षी रहे थे. पर किसी को कुछ भी ‘महसूस’ नहीं हुआ. मुझे तब तक इस बात का बिलकुल भी अनुभव नहीं था कि समय कभी मानवीय भावनाओं पर हावी हो सकता है. मृत्यु के एक विचलित कर देने वाले हादसे को क्या सिर्फ इसलिए भुलाया जा सकता है कि उसे घटे कुछ दशक बीत चुके हैं? मानव मन कैसे हो सकता है इतना निरपेक्ष …?
भीमताल. फोटो: अमित साह
मेरे बगल से पैराग्लाइडिंग क्लब में गाइड का काम करने वाले किसी किशोरे की धडधडाती हुई मोटरसाइकल कुत्ते के एक पिल्ले को कुचलती हुई आगे बढ़ जाती है. मोटरसाइकिल सवार इससे पूरी तरह बेखबर है. उसे पर्यटकों को अपने क्लब में लाने की जल्दी है, क्योकि प्रति पर्यटक उसे पांच सौ रुपये मिलते हैं. हमारे पुराने स्कूल के नीचे उग आये वर्षों पुराने पेपरमलबरी के पेड़ को राजनैतिक रसूख रखने वाले एक व्यक्ति ने अपनी निजी सड़क बनाने के लिए जड़ से उखाड़ फेंका है. तालाब के दूसरी ओर की पहाड़ी, जिस पर कभी इक्का-दुक्का काटेजनुमा मकान हुआ करते थे, लगातार बन रहे होटल्स और मल्टीस्ट्रक्चर कोम्प्लेक्सेज के लिए किये जा रहे खुदान और कटान के कारण लगभग नग्न हो चुकी है. चीड और बाँज के वो पेड़ जो कभी दूर से देखने पर अनजान गंतव्य की और बढ़ते किसी लम्बे कारवां का आभास दिया करते थे, आज गायब हो चुके हैं. चारों और बड़ी-बड़ी इमारतें हैं जो शाम ढलने के साथ रंगीन रोशनी में सराबोर हो जाती हैं. लाउड म्यूजिक है, गिटार के साथ गाने वाले युवा चेहरे हैं, शराब की दुकानें हैं, डी.जे. है, युवाओं के बीच हर तरह के नशे का फलता फूलता कारोबार है. कोई क्योँ याद रखना चाहेगा शिप्रा और शरद को जब कि खुद को भुला देने का इतना सामान सहज ही उपलब्ध है.
जगमोहन दार्शनिक अंदाज़ में मुझसे कहता है, “यार बन्दों को सिंथेटिक दूध जैसे चीज़ बनाने में, जिसे बच्चे और बूढ़े दोनों पीते हैं, कोई हिचक नहीं होती, बीमारों के लिए नकली दवाइयां धडल्ले से बन और बिक रही हैं, सरकारी नुमाइंदे बूढों और विधवाओं की पेंशन से लेकर बच्चों का वजीफा तक चट कर जा रहे हैं और तुम्हें लगता है कि एक तीस-चालीस साल पुराने पत्थर को तोड़ कर किसी गाड़ी वाले ने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है…. बी प्रेक्टिकल यार, द वर्ल्ड इज चेंजिंग.” जगमोहन गलत नहीं कह रह रहा है शायद, द वर्ल्ड इज रिअली चेंजिंग. पर एक प्रश्न चाहे-अनचाहे उत्तर तलाशने का प्रयास करता है- वेयर दिस चेन्ज विल अल्टीमेटली लीड अस टू? मैं जगमोहन से कहता हूँ – तालाब का पानी थोड़ा कम होने दो, हम उस पत्थर के टूटे हुए टुकड़े को शोर-लाइन के आस-पास ढूँढने का प्रयास करेंगे. उसे सीमेंट से जोड़ कर, कोशिश करेंगे कि पुरानी शक्ल फिर से मिल जाये.
तालाब के दूसरे छोर पर कुछ बच्चे हाथों में छोटी-छोटी बाल्टियाँ पकड़े पर्यटकों द्वारा फेंकी गयी पेट-बोटल्स और रेपर्स इकठ्ठा कर रहे हैं. बुजुर्ग से दीखने वाले एक संभ्रांत सज्जन दोनों हाथों में ग्लव्स पहने सड़क पर बिखरा कूड़ा उठा कर नगरपालिका के डस्टबिन में डाल रहे हैं. एक लडकी सुबह-सुबह बत्तखों और मछलियों को ब्रेड के छोटे छोटे टुकड़े खिला रही है … मुझे लगता है अगले महिने जब तालाब का पानी थोड़ा कम हो जाएगा तो मुझे पत्थर के वो टूटे हुए टुकड़े जरूर मिल जायेंगे.
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हृदयस्पर्शी शब्दचित्र। मैंने भी 1962 में उसी एल पी इंटर कालेज से बारहवीं की परीक्षा दी थी। वह भी राजशेखर पंत जी के घर में रह कर। वहां उनके बाबूजी आदरणीय चंद्रदत्त पंत जी की स्नेहिल छांव में। मेरे ददा दीवान सिंह मेवाड़ी जी को उनका स्नेह प्राप्त था। उनके घर के खिलखिलाते फूलों की वह बहार, पेड़ों की वह हरियाली, कल-कल बहता पानी, जल- कुंडों में अठखेलियां करतीं वे मछलियां, पंतजी के हाथों बनी वे मूर्तियां और हवा में तैरती उनके संगीत की वे धुनें मेरी स्मृति में बसी मेरी अमूल्य यादें हैं।
हम सात ताल जाते थे और वहां इलाहाबाद के किसी प्रोफेसर के कभी डूब जाने का किस्सा सुनते थे। तब लगता था, क्या-क्या स्प्न देख कर वे इलाहाबाद से आए होंगे और वहां आकर पहाड़ों की गोद में समा गए।
अगर मैं भीमताल आया तो मैं भी आपके साथ टूटे पत्थर के वे टुकड़े खोजने में आपका हाथ बंटाऊंगा प्रिय पंत जी।
देवेन्द्र मेवाड़ी
आदरणीय देवेंद्र जी, आपका बहुत बहुत आभार।