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पिछली क़िस्त का लिंक: बच्चियां अपनी जिंदगी की पहली यौन हिंसा का अनुभव अपने घरों में ही करती हैं (Column By Gayatree Arya-31)
रंग, मेरे बच्चे! तुम्हारी मां कई दुविधाओं में फंसी है तुम्हारे चलते. मैं तुम्हें दोष नहीं दे रही मेरी जान. बस वे चीजें तुम्हीं से जुड़ी हैं और विकल्पहीनता की सी स्थिति बनाए हुए हैं मेरे लिये. तुम इस वक्त मेरी इस परेशानी से दूर बहुत तेज हलचल मचाए हुए हो मेरे पेट में. इतनी ज्यादा उठापटक कि कुछ पल के लिए अनचाहे ही कलम रुक गई, मैंने जल्दी से पेट के ऊपर से अपना फ्रॉक हटाया और पेट के भीतर उछल-कूद कर रहे तुम चूहे को देखकर मुस्कुराने लगी. ऐसे वक्त कुछ नहीं रहता मेरे दिमाग में सिवाय मुस्कुराहट और आश्चर्य के. देख रही हूं तुम्हारी कसमसाहट को. बड़े हो रहे हो न तुम. जगह कम पड़ने लगी है अब तुम्हें पेट में. बस कुछ दिन (लगभग डेढ़ महीना) और मेरे बच्चे, उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. अब बस भी करो. कुछ लिखने दोगे की नहीं? ऐसे ही उछलते रहोगे फुटबाल की तरह, तो कहां लिख पाऊंगी मैं. लिखते वक्त मुझे एकांत चाहिए, लेकिन साथ ही तुम्हारा कोई मूवमेंट, एक भी हरकत बिना देखे मिस भी तो नहीं करना चाहती मैं.
दो-तीन दिन बाद मुझे दिल्ली जाना है पीएच.डी में अपनी री-रजिस्ट्रेशन के लिए. तब तक मेरे गर्भ का आठवां महीना शुरू हो चुका होगा. आठवें और नौवें महीने में मुझे ज्यादा ट्रेवल नहीं करना चाहिए. क्यों नहीं करना चाहिए? मुझे एक नई-नई बनी मां ने बताया था कि इस वक्त शरीर को लगा एक भी झटका बहुत खतरनाक हो सकता है. बच्चा झटके लगने से ज्यादा नीचे की तरफ आ सकता है या प्लासेंटा की थैली फट सकती है या फिर बच्चेदानी का मुह समय से पहले खुल जाने के कारण प्रीमैच्योर डिलीवरी हो सकती है!
दिल्ली, सिर्फ सपनों का ही शहर नहीं है मेरे बच्चे, यह हादसों का भी शहर है! मुझे वहीं जाना है. काम सिर्फ पीएच.डी. का रिजिस्ट्रेशन ही नहीं है. असल में 15 से 26 जुलाई तक ‘ओसियान सिने फैन फिल्म महोत्सव’ भी शुरू हो रहा है. पिछले लगभग पांच सालों से मैं ये महोत्सव देखती आ रही हूं. एशिया और यूरोप की कई दुर्लभ फिल्में वहां बहुत सस्ते में देखने को मिलती हैं. दिल्ली में होने वाले इवेट्स में मेरा सबसे ज्यादा पसंदीदा इवेंट है ये फिल्म फेस्टिवल. तुम्हारे आने से पहले मैं एक और बार संभवतः आखिरी बार बिल्कुल आजादी से ये फिल्म फेस्टिवल देखना चाहती हूं. मुझे न सिर्फ फिल्में देखने का, बल्कि इस फिल्म फेस्टिवल में फिल्में देखने का पैशन है. (वैसे तो किसी भी फिल्म फेस्टिवल का, पर हर जाना अबूते से बाहर है)
मैं सच में वहां फिल्में देखने की दीवानी हूं मेरे बच्चे. क्योंकि जिन फिल्मों की आपको जिंदगी में कभी खबर भी नहीं लगती, वे वहां देखने का मिल जाती हैं. कई साल पहले वहां मैंने शायद 4 या 5 फिल्में लगातार देखी थीं अकेले ही! क्या सुखद था वो अहसास. लेकिन ये बात (कि मैं फिल्म फेस्टिवल जाऊंगी) मैं अपने घर पर नहीं बता सकती. अपनी मां को भी नहीं क्योंकि वे बेहद गुस्सा होंगी और उन्हें मेरी बुद्धि पर तरस भी आएगा. ससुराल में बताना तो कितना असंभव है तुम सोच ही लो. जो बात मैं मायके बताने में सहज नहीं, वह भला ससुराल वालों को क्या ही बताई जा सकती है!
ये बात सबसे पहले तुम्हारे पिता को, मेरे कुछ दोस्तों को पता है और अब मैं तुम्हें बता रही हूं मेरे बच्चे. तुम्हारे आने के बाद भला तुम्हें कहां, किसके पास छोड़कर जा पाऊंगी मैं फिल्में देखने. वो भी पूरे दिन के लिए, कोई मां अपने छोटे से बच्चे को छोड़कर क्या दिनभर के लिए फिल्में देखने जा सकती है भला? किसी को पता चलेगा तो मुझे शर्म से डूब मरने जैसा महसूस करवाया जाएगा! यदि मैं किसी तरह मैनेज करके कुछ देर के लिए चली भी गई, तो दिल-दिमाग में तुम्हारी ही चिंता रहेगी और तुम्हें ले के वहां जा नहीं पाऊंगी! कुल मिला के तुम्हारे आने के बाद मैं इस फिल्म फेस्टिवल में बहुत सालों तक नहीं ही आ सकूंगी. ( Column By Gayatree Arya-31)
मैं फिलहाल आटो से सफर नहीं कर सकती क्योंकि उसमें बेहद झटके लगते हैं, इस वक्त एक-एक झटका मेरी और तुम्हारी जिंदगी पर भारी है मेरे बच्चे! और टैक्सी से हर रोज आने-जाने की मेरी औकात नहीं है. बस देर रात में मिलती नहीं या फिर बेहद ठुंसी हुई मिलेगी. टू व्हीलर या फोर व्हीलर वाला कोई दोस्त नहीं जो रोज मुझे रात में फिल्म देखने के बाद सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम से हॉस्टल छोड़ दे. तुम मेरे पेट में नहीं होते तो मैं जैसे मर्जी हास्टल पहुंच ही जाती. इससे भी ज्यादा दुविधा ये है बेटू, यदि मुझे सड़क या सफर में कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगी? क्योंकि तुम्हारे पिता मेरे साथ नहीं होंगे, बल्कि कोई भी मेरे साथ नहीं होगा. यदि तुम्हें कुछ हो गया, तो मेरी पिछले आठ महीनों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा और मैं दोबारा इस प्रक्रिया से नहीं गुजरना चहती, जिसमें शुरू के चार महीने तो बेहद भयानक, खौफनाक थे! कुछ गड़बड़ हो गई तो मां को और ससुराल में क्या बताऊंगी कि कहां थी मैं इतनी रात को? क्या कर रही थी वहां अकेले? ताने और कोसने दे-देकर सब मुझे अधमरा कर देंगे. फिल्म देखने गई थी? इतनी रात में! अकेले! वो भी ऐसी हालत में? ओह! मेरे पास कोई सफाई नहीं होगी उन्हें देने के लिए या अपने पक्ष में बोलने के लिए.
एक तरफ तुम्हें कुछ हो जाने का डर, दूसरी तरफ आजादी से भरा आखिरी फिल्म माहोत्सव! क्या करूं? किसे चुनूं? जाऊं या नहीं? कहीं बाद में पछताना न पड़े कि सिर्फ कुछ फिल्मों के लिए मैंने दो जिंदगियां दांव पर लगा दी! दूसरी तरफ लगता है कि एक और बार देख लो गायत्री, अपने मनचाहे समय और सुविधा के हिसाब से फिल्म फैस्टिवल की फिल्में. अगली बार का क्या पता, तुम्हारी तबीयत कैसी हो? किसके पास तुम्हें बेखौफ छोड़ के जा पाऊंगी? तुम मेरे बिना किसी के पास रह भी कहां पाओगे? और भला किसे बता पाऊंगी कि बच्चे को छोड़कर सारा दिन फिल्म देखने का प्रोग्राम बना रही हूं. बेशर्म और निर्मोही मां कहलाऊंगी मैं, गालियां खाऊंगी. ( Column By Gayatree Arya-31 )
बच्चे से बढ़कर और उससे पहले भला किसी मां के लिए क्या हो सकता है? क्या होना चाहिए? ऐसे सवालों, ऐसी चिंताओं और ऐसी विकट परिस्थितियों से एक पुरुष हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त है. कितनी फालतू कि चिताएं और सवाल मेरे हिस्से में आए हैं मेरे बच्चे, सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं मां हूं, बाप नहीं! ( Column By Gayatree Arya-31 )
1ए.एम. / 11.07.09
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उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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