गायत्री आर्य

लड़कियां चाहे बच्चे जनती मर जाएं, खानदान का झंडा लड़के ही उठाएंगे

4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – चौदहवीं क़िस्त

पिछली क़िस्त का लिंक: बच्चा पैदा करने का अंतिम निर्णय सिर्फ और सिर्फ मां का होना चाहिए

क्या मुझे तुमसे छिपाना चाहिए मेरे बच्चे, कि हम फिर से तुम्हारा आबार्शन कराने गए थे? लेकिन न तो मैं तुमसे कुछ छिपा सकती हूं और न ही छिपाना चाहती….24 दिसम्बर यानी क्रिस्मस से एक दिन पहले तुम्हारे पिता ने मुझसे बात की और समझाया कि ‘एक बार फिर से अबार्शन करा लेते हैं और फिर अप्रैल में हम बच्चा प्लान करेंगे. तब तक हम खुद को दिमागी रूप से भी तैयार कर लेंगे’. शुरू में बेमन से ही लेकिन मैंने इस बात पर असहमति जताई, क्योंकि फिर से वही 20-25 दिन की ब्लीडिंग का झंझट!

मुझे फिर से पहली बार वाली स्थिति ध्यान आई, कैसे नैपकिन के पैकेट के पैकेट खत्म होते-होते, अंत में मैं ऐसी जगह पहुंची थी, जहां न तो मेरे पास नैपकिन बचे थे और न ही मैं उस जगह पर थी, जहां नैपकिन मिल सकते हैं! अंत में मैंने अपनी सूती काली चुन्नी को पैड्स की तरह यूज किया था और गंदे कपड़ों को अपने ही बैग में ठूंसती रही थी, क्योंकि वहां (बाड़मेर के उस गांव में) ‘उस तरह’ की गंदगी फैंकने जैसी जगह नहीं थी कोई, क्योंकि वहां ‘उस तरह’ का कचरा होता ही नहीं है! ऐसा इसलिए, क्योंकि वहां लड़कियां/औरतें, एक/दो कपड़ों को ही बार-बार धोकर सालों तक इस्तेमाल करते रहने को मजबूर हैं! हां, मेरी बच्ची सालों तक! पता नहीं मैंने अपना कितना खून बहाना होगा उस पहले गर्भपात के दौरान!

ओह, कहां से कहां पहुंच गई मैं. मैं बता रही थी कि असहमति के बावजूद थोड़ी देर की बातचीत के बाद, मैं भी तैयार हो गई थी अबार्शन के लिए. और इस दूसरे अर्बाशन के लिए मैंने कई तर्क भी जुटा लिये थे. पी.एच.डी. के कम से कम दो चैप्टर लिख लूंगी, सारा स्टडी मैटीरियल इकट्ठा कर लूंगी, कुछ लोगों के इंटरव्यू कर लूंगी तब तक और एक बार हम फिर से कहीं घूम भी आएंगे बिल्कुल आजाद होकर. ये तय होने के बाद हम दोनों ने क्रिसमस सेलिब्रेट करने के लिए वोदका पी और खूब नाचे. नाचने के बाद जाकर मेरा दिमाग शांत हुआ, जैसा कि अक्सर होता है. तुम्हारी मां को ढंग से नाचना नहीं आता, लेकिन उसे नाचना पसंद बहुत है. मैं जब भी बहुत परेशान होती हूं तो नाचना चाहती हूं, या गाने सुनना चाहती हूं या फिर लंबी वॉक पर जाना चाहती हूं. नृत्य और संगीत मिलकर मेरे दिमाग को सबसे अच्छी तरह शांत करते हैं. हमेशा सिर्फ परेशानी में ही नहीं, मुझे खुशी में नाचना भी बहुत पसंद है और भंगडे की धुन पर खुद को रोक पाना तो सबसे मुश्किल है मेरे लिए.

हम लोगों ने क्रिस्मस सेलिब्रेशन के लिए वोदका नहीं पी थी. मैं बस एक बार टल्ली होकर देखना चाहती थी, कि क्या होता है टल्ली होने के बाद. मैंने तीन पैग पिए, शरीर और दिमाग दोनों झूम रहे थे, पर न तो मेरी सेंस खत्म हुई थी न ही मैं कुछ भूली और न ही इमोश्नल हुई. तुम्हारे पिता पीकर अक्सर ही बहुत इमोशनल हो जाते हैं. लेकिन अगले पूरे दिन मुझे बिल्कुल भूख नहीं लगी. कुल मिलाकर मैंने इसे एन्जॉय नहीं किया बिल्कुल भी.

तय प्रोग्राम के हिसाब से शनिवार की सुबह यानी 27दिस. को हम एक लेडी डॉक्टर के पास गए और बताया कि अभी 14 दिन की प्रेगनेंसी है और मैं अबार्शन कराना चाहती हूं, कुछ पर्सनल प्राब्लम है. लेकिन जैसे ही मैंने बताया कि ये मेरा पहला बच्चा होगा और मैं 31 की हो चुकी हूं. तो उन्होंने एक सिरे से अबार्शन कराने के लिए मना कर दिया क्योंकि मेरी उम्र ज्यादा हो चुकी थी. साथ ही इसलिए भी की अबार्शन से इन्फेक्शन का चांस बढ़ जाता है.

डॉक्टर ने बड़े प्यार से कहा, ‘चाहे घर में कैसी भी प्राब्लम क्यों न हो, चाहे बाढ़ ही क्यों न आई हो, लेकिन आपको ये अबार्शन नहीं कराना चाहिए. आप देखना बच्चे के आते ही सारी प्रॉब्लम्स अपने आप ठीक हो जाएंगी.’ और कहकर उन्होंने बी कॉम्पलेक्स का एक टॉनिक पर्चे पर लिखकर दे दिया. मैंने मन ही मन खीजकर सोचा, ‘कैसे अपने आप ठीक हो जाएगा सब कुछ तुम्हारे आने से? क्या मेरे पीएच.डी. के पांच चैप्टर अपने आप लिखे जाएंगे? क्या वे सारे इंटरव्यू जो मैं करना चाहती हूं अपने आप हो जाएंगे? फिल्म डायरेक्श्न जो मैं सीखना चाहती हूं…कहां और कैसे उसके लिए मैं निकल पाऊंगी?

अस्पताल से निकलकर हम पास के एक सूर्य मंदिर में गए. मुझे पहली बार किसी मंदिर में जाकर अच्छा लगा, क्योंकि वहां देवी-देवताओं की मूर्तियां नहीं थी, सिर्फ सूर्य की काल्पनिक मूर्ति थी. ये सब सूरज, हवा, पानी, पेड़-पौधे तो पूजनीय हैं भी, ये सब ही तो साक्षात रूप से हमें जीवन दे रहे हैं. मैं प्रकृति को ही ईश्वर का स्वरूप मानती हूं मेरी गुड़िया! सारी दुनिया में इसी की इनायत है; जो बिना जात, धर्म, नस्ल, लिंग, वर्ण और वर्गभेद के सब लोगों को सबकुछ बराबर देती है. कुछ देर तक हम दोनों ने बातें की और फिर उस सूर्य मंदिर में, सूरज को साक्षी मानकर हम लोगों ने तुम्हें जन्म देने का निर्णय लिया. ये ग्वालियर का सूर्य मंदिर था.

घर आकर हम लोगों ने तुम्हारी नानी, दादी, बुआ, चाचा, ताऊ सबको बताया. सब बहुत खुश थे. तुम्हारी नानी बार-बार भगवान को शुक्राना भेज रही थी. तुम्हारी दादी ने खुशी के मारे कहा, कि ‘वे मेरे चरण धोकर पीना चाहती हैं.’ जब मैंने देखा कि ये लोग कितने खुश हो रहे हैं, तो फिर एक अजीब सी खीज मेरे अंदर भर गई. मैं सोच रही थी बच्चा मैं पैदा कर रही हूं, तकलीफ मैं उठाऊंगी, समय और सबसे ज्यादा प्यार मैं दूंगी तुम्हें  लेकिन खुशी मुझसे ज्यादा इन्हें क्यों हो रही है? क्या है इनकी खुशी का कारण? क्या सच में ये लोग इसलिए खुश हैं, कि मैं एक बच्चे का जन्म देने जा रही हूं?

लेकिन अगले ही पल मुझे समझ आया कि ये असल में तुम्हारे जन्म लेने के कारण या मेरे मां बन पाने के कारण खुश नहीं हैं, क्योंकि यदि मैं बिना शादी के मां बनने की खबर इन सबको देती तो कहर टूट पड़ता! कितने ताने, लानते, गालियां, गुस्सा, उपेक्षा, घृणा…पता नहीं क्या-क्या! दरअसल न तो मैं और न तुम उस स्थिति की कल्पना ही कर सकते हैं रंग. मेरे मायके वाले बदनाम हो जाते बल्कि मुझे मरा ही समझ लेते. मेरे भावी ससुराल वाले मायके वालों को और मुझे गाली देते नहीं थकते और संबंध खत्म कर लेते. लेकिन क्यों? जन्म तो तुम तब भी लेते. मां बनने का गौरवमयी (?) काम तो मैं तब भी करती न. बाप तो तुम्हारे पिता तब भी बनते न. फिर, फिर तुम्हारे आने की खुशी का परिणाम इतना क्यों उलट जाता बेटू?

किसी ने मुझसे तो एक बार भी नहीं पूछा कि मैं खुश हूं या नहीं? और नहीं हूं तो क्यों? मैं, जिसे जन्म देने से तुम्हारे बड़े होने तक तुम्हारा ध्यान रखना है, मैं मां बनने को मानसिक रूप से तैयार भी हूं या नहीं. बस सबने अपनी-अपनी खुशियों की बोरी मेरे ऊपर उलट दी. लेकिन दरअसल ये लोग तुम्हारे जन्म लेने और मेरे मां बनने से खुश नहीं हैं, ये लोग परंपरा और रिवाज के अगले कदम बढ़ाने की खुशी मना रहे हैं. शादी हुई तो अब बच्चा होना चाहिए, एक बच्चा हुआ तो दूसरा भी होना चाहिए. लड़की हो जाए तो ठीक ही है, लेकिन लड़का जरूर होना चाहिए, वर्ना खानदान और वंश कैसे बढ़ेगा आगे? जन्म देने में बेशक हम लड़कियां मर-खप क्यों न जाएं, पर वंश और खानदान का झंडा तो सिर्फ लड़के ही आगे लेकर जाएंगे न!

ये सब बातें सोचकर और उन लोगों की बच्चे की खुशी देखकर मेरा, मेरा जी जल रहा था. मैं शायद इसलिए कुछ खीज महसूस कर रही थी हर बार, अब जबकि मैं बच्चा नहीं चाहती, तो ये सब मेरे मां बनने का जश्न मनाने को तैयार हैं. यदि कभी बिना शादी के मैं मां बनना चाहती कभी खुशी से, तो ये लोग मेरी खुशी में खुशी मनाना तो दूर, मेरे मरने की कामना करते! तो कैसे मान लूं, कि ये लोग सच में तुम्हारे इस दुनिया में आने से इतना खुश हैं? दुनिया में तो तुम तब भी आ सकते थे न बेटू  जबकि मैंने शादी न की होती. क्या तब तुम्हारे आने की खुशी में खुश होते ये सब? क्या तब एक नई जिंदगी का जश्न मनाते ये सब? नहीं न? फिर कैसे इन सबकी खुशी मुझे अच्छी लगे मेरे बच्चे?

तुम्हें ये बात शायद बुरी और अजीब सी लगे मेरे बच्चे, पर सच यही है कि सब लोग अपनी खुशी, निर्णय और परंपराओं को ही अहमियत देते हैं. मैं यहां खाने-पीने, चॉकलेट, पिज्जा और मनपसंद कपड़ों जैसी छोटी पसंदें पूरी करने की बात नहीं कर रही. पढ़ाई, नौकरी, शादी और बच्चा जैसे बड़े निर्णय बच्चे अपनी पसंद और खुशी से नहीं ले सकते. यदि सच में मां-बाप को बच्चों की खुशी की इतनी ही चिंता रहती तो क्या पढ़ो, क्या नहीं, इस पर अपना निर्णय थोपते? लव मैरिज कर देंगे, पर लव अपनी जात और धर्म के लड़के/लड़की से ही होना चाहिए! शादी नहीं करना चाहते, अकेले ही खुश हों तो ये बात भी मां-बाप को बर्दाश्त नहीं होती. उनका समाज में उठना-बैठना मुश्किल हो जाएगा. शादी न करने का विकल्प भी बच्चों के पास नहीं होता अक्सर. चाहे वे बिना शादी किए ही खुशी-खुशी रहना चाहते हो. शादी के बाद बिना बच्चे के यदि आप खुश हैं, तो वो भी मां-बाप को बर्दाश्त नहीं, क्योंकि समाज में मुह दिखाना मुश्किल होने लगता है उन लोगों का.

वैसे तो आजकल बच्चों को स्कूल जाने का क्रेज होता ही है, लेकिन यदि बच्चा स्कूल न जाना चाहे और बस घर में ही पढ़कर खुश रहे, तो ये बात मां-बाप की चिंता का कारण बन जाएगी. वे लोग बच्चे में कुछ और हुनर नहीं ढूंढ़ेगे, न ही उसकी पसंद जानना चाहेंगे. वे सिर्फ इस बात पर सारा जोर लगाएंगे, कि बच्चा स्कूल कैसे जाए और क्लास में फर्स्ट कैसे आए? क्योंकि परंपरा यही है कि बच्चों को स्कूल जाना ही चाहिए. बड़े होकर शादी करनी ही चाहिए, शादी के बाद बच्चे पैदा करने ही चाहिए. यही परंपरा है, परंपरा का निर्वाह करते जाओगे तो मां-बाप और दुनिया तुमसे खुश रहेगीजहां तुमने परंपरा से जरा सा इधर-उधर हटने की कोशिश की, वहीं तुम सबके दुश्मन बन जाओगे!

मैंने तय किया है कि मैं तुम पर कभी भी अपने निर्णय नहीं थोपूंगी मेरे बच्चे! मैं तुम्हें उन चीजों के बारे में सिर्फ बताऊंगी जो सही नहीं हैं या जिनसे तुम्हें दुख पहुंच सकता है, यदि उसके बावजूद भी तुम वे चीजें करना चाहो, तो ये तुम्हारा निर्णय होगा. मैं सिर्फ तुम्हारा साथ दूंगी बुरे वक्त में, बिना किसी ताने और शर्त के, ये तुम्हारी मां का वादा है तुमसे मेरी जान. मैं हमेशा तुम्हारी दोस्त बनकर रहना चाहती हूं बेटू. तुम पारिवारिक दवाब के चलते जन्म ले रही हो मेरी बच्ची. मुझे दुख है. पर ये सच है कि तुम परंपरा निर्वाह के चलते जन्मोगी और भविष्य में परंपरा निर्वाह के लिए अपने निर्णयों और खुशियों की आहुतियों देने के लिए तुम्हें भी तैयार किया जाएगा. मैं तुम्हें परंपरा निबाहने के इस ‘क्रूर महयज्ञ’ की आहुति बनने से बचाने की पूरी कोशिश करूंगी मेरी बच्ची!

सिवाय तुम्हारे मुझे किसी से भी तुम्हारे आने के बारे में बात करने का मन नहीं है. हां, थोड़ा-बहुत अपनी मां से इस बारे में बात करने का मन जरूर होता है. लेकिन करनी तो सबसे पड़ेगी न? मैं अपनी गर्भावस्था को लेकर अभी जरा भी नार्मल नहीं हूं, खुश होना तो बहुत दूर की बात है. बल्कि सच कहूँ तो मैं तनाव में हूं!

उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.

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Sudhir Kumar

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