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4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – उनतीसवीं क़िस्त
पिछली क़िस्त का लिंक: छोटी-छोटी चीजों के स्वाद से बना जीने का ज़ायका
कल हमने तुम्हारे लिए, तुम्हारी जिंदगी की सबसे पहली खरीदारी की. मैंने तुम्हारे लिए दो बेबी सोप और एक पाउडर का डब्बा लिया. कुछ ज्यादा ही जल्दी नहीं ले लिया मैंने ये सब तुम्हारे लिए, बोलो? (Column by Gayatree Arya)
इस घर में मैंने एक बिल्कुल ही नई बात महसूस की बेटू. डर, नफरत, घृणा और नापसंदगी ये सब मिलकर हमारे व्यवहार को बहुत ज्यादा हिंसक, क्रूर और अमानवीय बना देते हैं. बिना किसी तर्क के. मैंने शायद तुम्हें पहले भी बताया था मेरी बच्ची कि तुम्हारी मां को छिपकलियों से बेहद डर लगता है, नफरत सी है. बल्कि यह कहना सही होगा कि घिन सी आती है उनसे. बिना किसी ठोस कारण के वे मुझे नापसंद हैं. इसी कारण अबसे पहले जिन घरों में हम रहे मैं अक्सर तुम्हारे पिता से कहके एक-दो छिपकलियां जरूर ही मरवा देती थी. लेकिन चूंकि इस घर में छिपकलियां बहुत ज्यादा हैं, सिर्फ इसलिए मैंने तुम्हारे पिता से कहकर उन्हें मारने से मना कर दिया, कि खामखां बहुत ज्यादा जीव हत्या हो जाएगी. मतलब कि यदि यहां भी छिपकलियों की संख्या कम होती, तो अपने बेवजह के डर और घृणा के चलते मैं उन्हें मरवा चुकी होती!
दूसरी तरफ गिलहरियां हैं. जो मुझे बेहद पसंद हैं, अच्छी लगती हैं. बिना बात के ही बड़ा प्यार आता है मुझे उन पर, कुछ सम्मोहन सा है उनमें. आंगन वाले जामुन के पेड़ पर गिलहरियों का जो बड़ा परिवार रहता है, उसकी कुछ गिलहरियां बहुत बदमाश हैं. एक दोपहर मैंने देखा कि डायनिंग टेबल पर रखे दो किलो के शक्कर के डिब्बे के ढक्कन को कुतरकर उन्होंने ढक्कन खोला और शक्कर खाई डायनिंग टेबल पर बैठकर. पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि ये काम गिलहरी ने किया है. नए डब्बे के नुकसान पर मेरी प्रतिक्रिया सिर्फ इतनी ही थी, कि अब मैं डायनिंग टेबल पर कोई सामान नहीं छोड़ती थी.
गिलहरियों द्वारा मेरे इस नुकसान के बाद भी मुझे उन पर गुस्सा नहीं आया और न ही खीज हुई. दूसरा नुकसान ये कि जामुन के पेड़ की एक भी पकी हुई जामुन तुम्हारी मां को खाने को नहीं मिल रही थी. ये भी सिर्फ इन गिलहरियों के कारण ही, क्योंकि इनका नाश्ता और दिन भर का खाना इस पेड़ की जामुनों से ही होता था. तीसरा नुकसान ये कि मैंने गार्डन में चने बोए थे साग के लिए, लेकिन इन कमबख्त गिलहरियों ने एक भी चना जमीन में नहीं छोड़ा. सारे चने खोद-खोदकर मेरी आँखों के आगे खा गई. लेकिन गिलहरियों द्वारा मेरे इतने सारे नुकसारे के बावजूद भी न तो मुझे इन पर गुस्सा आया न ही घृणा हुई इनसे. (Column by Gayatree Arya)
कुल मिलाकर बात है ये मेरी बच्ची, कि इन गिलहरियों ने मेरा कितनी तरह से नुकसान किया, चीजें खराब की. लेकिन उसके बावजूद भी इन गिलहरियों पर न तो मुझे कभी स्थाई गुस्सा आया न ही इनसे नफरत हुई. न ही इनके प्रति मेरी चाहत कम हुई और न ही मैंने इन्हें मारने का सोचा, बावजूद इसके कि इन्होंने कदम-कदम पर मेरा नुकसान किया है.
दूसरी तरफ ये छिपकलियां, जिन्होंने कभी मेरा किसी तरह का कोई नुकसान नहीं किया, न ही मुझे कभी चोट पहुंचाई, लेकिन फिर भी ये हमेशा मेरे निशाने पर रही हैं और रहती हैं, क्यों भला? ऐसा सिर्फ इसलिए है मेरी बच्ची क्योंकि मुझे इनसे जन्मजात बेवजह नफरत है, घृणा है, बेवजह का डर है, नापसंदगी है. इनके प्रति मेरा व्यवहार, मेरी उनके प्रति सोच से तय हो रहा है, न कि उनके मेरे प्रति व्यवहार से! यदि सामने वाले के व्यवहार से मेरी उसके प्रति सोच और व्यवहार तय हुआ होता, तो मुझे गिलहरी से नफरत और छिपकती से प्यार होना चाहिए था. प्यार न सही, पर नफरत तो नहीं ही होनी चाहिए थी छिपकली से कम से कम. लेकिन व्यवहार में होता ये है कि हम किसी के भी प्रति कोई धारणा पहले से बना के रखते हैं और फिर उसके हिसाब से ही व्यवहार करने लगते हैं.
किसी के प्रति डर, नफरत, घृणा, नापसंदगी; हमेशा ही हिंसा, हमले और असहनशीलता को जन्म देती है मेरी बच्ची और प्यार व पसंदगी, सहनशीलता को जन्म देती है. काश की किसी भी इंसान या जीवित चीजों के प्रति बेवजह कि नफरत, डर, घृणा, नापसंदगी तुम्हे छुए भी न मेरे बच्चे! किसी के भी प्रति डर और घृणा तुम्हारे मन में न आए, नहीं तो तुम भी बेवजह कि निमर्मता और हिंसा के भागीदार बनोगे. लेकिन जिस दुनिया में आने की तैयारी में तुम दिन-रात जुटे हो; उसमें आकर डर, नफरत, घृणा, नापसंदगी से बच पाना मुश्किल क्या, लगभग असंभव ही है मेरे बच्चे! (Column by Gayatree Arya)
ये सुनने में अजीब लगेगा लेकिन सच है कि तुम्हें डरना, नफरत करना, घृणा करना भी सिखाया जाएगा मेरी जान! जीवन में असंख्य पाठशालाएं और असंख्य गुरु होते हैं बेटू, जो हमें बहुत कुछ सिखाते जाते हैं. यहां कि तो हवा में भी ये सब चीजें घुल चुकी हैं. इस वायुमंडल में घृणा, नफरत, डर और नापसंदगी का कितना-कितना प्रतिशत है, ये तो मैं तुम्हें नहीं बता सकती; लेकिन इतना जरूर पता है कि वो प्रतिशत है बहुत ज्यादा है. कैसे बचा पाएगी तुम्हारी मां तुम्हें इन जहरीली चीजों से मेरे बच्चे? खुद को इस जहर से बचा पाने की पूरी जंग भी कहां जीत पाई हूं मैं अभी तक. लेकिन काफी हद तक मैंने खुद को इनके असर से मुक्त किया है, कहूं कि खुद की शुद्धि की है मैंने. जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, रंग, गरीबी, अमीरी मेरी घृणा का, नफरत का या डर का कारण जरा भी नहीं बनते.(12.50 ए.एम/5.7.09)
उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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