फोटो-सुधीर कुमार
4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – छब्बीसवीं किस्त
पिछली क़िस्त का लिंक: प्रकृति भी हम स्त्रियों के प्रति उतनी दयालु और सहयोगी नहीं
मेरे बच्चे, छः महीने पूरा करके तुम सातवें महीने में लग गए हो. आज मेरी तबीयत ठीक नहीं. गले में इन्फेक्शन के कारण काफी दर्द है और नाक बुरी तरह बह रही है. लेकिन तुम्हारे चलते मैं इतनी तकलीफ में भी दवाई नहीं ले सकती, क्योंकि वो दवा तुम्हारे भीतर भी जाएगी और तुम्हें नुकसान पहुंचाएगी. ऊपर से मैं आज दुखी भी हूं बहुत, अपनी अभी तक की प्रेगनेंसी में मैं आज दूसरी बार रोई हूं बहुत देर तक… सिर भी भारी है, सोचा था तुमसे बात करके खुद को थोड़ा हल्का करूंगी., पर मैं तुम्हें लिख भी नहीं पा रही. बाद में लिखूंगी मेरे बच्चे. तुम बस स्वस्थ रहो.
11पीएम /12.6.09
पिछले लगभग एक महीने से मैंने तसल्ली से बैठकर तुम्हें नहीं लिखा. लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं की इस बीच मैंने तुमसे बातें ही नहीं की. बातें तो मैं तुमसे लगभग हर रोज ही करती हूं मेरे बच्चे! बल्कि दिन में कई-कई बार करती हूं. लेकिन कभी आलस, कभी मूड, तो कभी परिस्थिति के चलते बस लिख नहीं पाती थी तुम्हें.
देखो फिर वही हुआ, मैं सिर्फ जरा सा लिखके फिर दो दिनों तक तुम्हें नहीं लिख पाई. आजकल तुम्हारे मूवमेंट बहुत बढ़ गए हैं मेरी जान! इतने ज्यादा कि कई बार तो तुम मुझे पढ़ने भी नहीं देते. जैसे ही मेरी नजर किताब पर जाती है, मेरे पेट के भीतर के चूहे की उछल-कूद बढ़ने लगती है. मैं मुस्कुराती हूं. मुस्कुराती ही जाती हूं. तुम और ज्यादा हाथ-पैर मारते हो, मैं और ज्यादा उस उथल-पुथल में डूब जाती हूं. हम दोनों चुपचाप अपना-अपना काम कर रहे होते हैं. बीच में कोई संवाद नहीं, कोई बात नहीं. लेकिन फिर भी हमारे बीच में संवाद होता ही है मेरी रूह! मां और बच्चे के बीच ज्यादातर संवाद खामोशी में ही होते हैं मेरे सोना! क्योंकि शब्द कम पड़ते हैं उस भाव को पूरा व्यक्त करने के लिए. कभी लेटे हुए, तो कभी बैठकर मैं चुपचाप मुस्कुराते हुए तुम्हें अपने पेट में कबड्डी खेलते देखती हूं.
मैं अभी तक कुदरत के इस करिश्मे से चमत्कृत हूं. कैसे तुम मेरे भीतर घुप्प अंधेरे और पानी में पड़े हुए हो और जिंदा हो! तुम्हारा भी दिल धड़क रहा है और मेरा भी. एक शरीर में दो दिल और दोनों ही अपनी रफ्तार से धड़क रहे हैं. शरीर के भीतर शरीर! फिर भी दोनों की नसें, नाडियां, आपस में उलझ नहीं रही हैं. अपना काम अलग-अलग कर रही हैं. कैसा है न ये? कभी-कभी तो मेरा पेट ऐसे हिलता है मानो तुम सिस्कियां ले रहे हो मेरे भीतर. लेकिन मैं जानती हूं मेरे बच्चे, अभी तुम्हारे पास रोने-सिसकने का कोई कारण ही नहीं है. जैसे किसी अंतरिक्ष यात्री को चांद पर जाकर तैरते हुए मैंने टीवी पर देखा है, तुम भी कुछ वैसे ही मेरे पेट में तैर रहे हो बच्चे.
देखते-देखते सातवां महीना भी पूरा होने को है. यदि डॉक्टर की दी गई तारीख से हिसाब लगाऊं, तो ठीक दो महीने और चार दिन बाद तुम जन्म ले चुके होओगे. तब तुम मेरे हाथों में या मेरी बगल में लेटे होओगे. मेरा बच्चा, मेरे भीतर से जन्मा बच्चा, मेरा हिस्सा मेरे सामने होगा. ओह! कैसा लगेगा मुझे? अभी तुम्हारा आकार बढ़ गया है, इसलिए तुम्हें अंदर तंग-तंग सा लगता होगा न? इस तंग माहौल में कभी बंद मुठ्ठियां, कभी पैर, तो कभी सिर, जोर से हिलाकर तुम्हें मजा आता होगा, थोड़ी राहत मिलती हो शायद.
3पी.एम / 28.6.09
उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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