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4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – बाइसवीं किस्त
पिछली क़िस्त का लिंक: दुनिया में पोर्नोग्राफी पूरी तरह खत्म होनी चाहिए
किताबों और फाइलों का हम लड़कियों/स्त्रियों की जिंदगी में सिर्फ पढ़ी जाने वाली, ज्ञान देने वाली, चीजों को संभाल कर रखने वाली और काम को आगे बढ़ाने वाली चीजों के रूप में ही महत्व नहीं है मेरी बच्ची!…ये हम ‘मस्त फिगर’ (?) वालियों के लिए और भी बड़े काम की चीज है. ये किताबें और फाइलें पुरुषों की ‘एक्स-रेज (कुदृष्टि) वाली नजरों से अपनी छातियों को बचाने में भी बेहद काम आती हैं!
अधिकतर अस्पतालों में तुम्हें ज्यादा एक्स‘रे करवाने से बचने की हिदायत देने वाले पोस्टर दिख जाएंगे. क्योंकि एक्स-रे से निकलने वाली किरणें हमारी हड्डियों के लिए खतरनाक होती हैं. कामी और लम्पट (सभी नहीं) पुरुषों की आंखों से निकलने वाली किरणों की यदि जांच की जाए, तो मैं यकीनन कह सकती हूं कि उस नजर में और एक्स-रेज में जरूर कहीं न कहीं कोई समानता मिलेगी. क्योंकि दोनों ही भेद के निकल जाती है कपड़ों को, चमड़ी को, मांस को और ये ‘मेल आई रेज’ हमारी हड्डियों के लिए तो नहीं, पर हमारे पूरे अस्तित्व के लिए खतरनाक जरूर हैं.
लेकिन फिर भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ता मेरी बच्ची. औरत अदभुत किस्म की प्राणी है, जीवटता कूट-कूट के भरी है हममें. ऐसी जीवटता है इस लड़की जात में, जैसी राजस्थान की घोर रेतीली जमीन में पानी ढोती औरतों में होती है. जैसी पहाड़ों पर लकड़ियों के गठ्ठर ढोती औरतों में होती है. अदुभुत, निराली जीवटता देखी है मैंने राजस्थान और पहाड़ की आम औरतों में. इन ‘आम’ औरतों में वो है, जो ‘खास’ औरतों में भी शायद न होता हो. तुम जब इस दुनिया में आओगी तो देखोगी, तुम्हें देखना चाहिये असीम ऊर्जा मिलेगी तुम्हे उन्हें देखकर मेरी गुड़िया. इतनी ऊर्जा तो ‘एनर्जी पिल्स’ में भी नहीं होती होगी और उससे भी बड़ी बात, एनर्जी पिल्स की तरह इन महिलाओं से मिलने वाली ऊर्जा का कोई साइड अफेक्ट भी नहीं! दिल में तकलीफ, चेहरे पर हंसी और जबान में ठिठोली ऐसे कवच की तरह हमसे चिपकी रहती है, जैसे कर्ण के कवच्छ और कुंडल. बच्चे को जन्म देने वाली बात पर मैंने कितनी ही औरतों के मुह से सुना है ‘‘पहली बार की मुश्किल है, फिर तो कितने ही निकलवा लो. (बच्चे)!” और ये कहकर वे सब जोर का ठहाका मारती हैं. इस बात में हंसी, ठिठोली, दर्द, तकलीफ और व्यंग्य के कितने-कितने अणु-परमाणु हैं, वैज्ञानिक भी इस बात का सही-सही पता नहीं लगा सकेंगे!
आज जे.एन.यू. लाइब्रेरी के न्यूजपेपर सेक्शन में एक किताब और पर्स भी मेरे कितने काम आए, सामने उर्दू का अखबार पढ़ने वाली ‘आई रेज‘ से मुझे बचाने में. चूम ही न लूं मैं इन्हें. ओह मेरी बच्ची! तुम कैसी दुनिया में आ रही हो. बहुत विषैली है ये दुनिया, पर जीवन का जादू, इसका नशा, इस विषैलेपन पर हर बार भारी पड़ता है. ये इनायत तुम पर भी करेगा जीवन. जिंदगी सच में कोई भेद नहीं करती अपने बच्चों में. वर्ग, वर्ण, नस्ल, जात, धर्म, और लिंगभेद से परे; वो सबके प्यालों में जीवन का बराबर नशा और जादू उड़ेलती है.
7पी.एम. /26/3/09
परसों रात तुम्हें लिखने का मन था पर लिख नहीं सकी थी, क्योंकि मेरा पेट बहुत ज्यादा खिंच रहा था, इतना तनाव था कि मैं बैठ भी नहीं पा रही थी मेरी बच्ची. जैसे एक सीमा के बाद भी फुलाने से गुब्बारा फूट जाता है न, समझो वैसा ही कुछ. पर आने वाले चार महीनों में तो मेरे पेट को और फूलना है और खिंचना है. तुम बड़ी हो रही हो. विस्तार पा रही हो मेरे भीतर. अभी तुम दुनिया की सबसे महफूज जगह में हो मेरी बच्ची. ठीक है कि वहां घुप्प अंधेरा है, सूरज की एक नन्ही सी किरण भी तुम तक नहीं पहुंचती. तुम्हें नहीं पता कि सूरज कैसा होता है? रौशनी क्या होती है? दिन कैसा होता है? बस इतना जान लो कि दुनिया भर कि रोशनियां, सारे बल्ब, एलईडी और टयूबलाइटें मिलकर भी दिन की रौशनी का मुकाबला नहीं कर सकते, वैसी उजले नहीं हो सकते मेरी रूह! लेकिन इसके बावजूद भी तुम बहुत मजे में हो. तुम्हें जला देने वाली लू का अहसास नहीं है और न ही कड़कड़ाती ठंड से ठिठुरने का अभी तुम्हें पता है. बस चार महीने और. अभी तो तुम प्लासेंटा के पानी भरे छोटे से टब में पड़ी हो मजे से, उसके बाद तुम इस दुनिया में आ ही जाओगी धूप-छांव, सर्दी-गर्मी, रोशनी-अंधेरा देखने को.
तुम इस दुनिया में आने से पहले कितनी तैयारी कर रही हो मेरी बच्ची. तुम्हारी ही तरह करोड़ों बच्चे, तुम्हारे भाई-बहन ठीक इसी पल, ठीक इसी युद्ध स्तर की तैयारियां कर रहे हैं. लेकिन ये दुनिया, यहां के लोग, यहां की व्यवस्था इससे बेखबर, तुम लोगों के लिए कोई तैयारी नहीं कर रही. वही अव्यवस्था, वहीं अन्याय, वही लापरवाहियां, वही तंगी, वही अभाव, वही लूट-खसोट, वही असंख्य तरह के भेद-भाव, वही भयानक लिंगभेदी नसीहतें और रवैया! सब कुछ पहले जैसा ही अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. ये एकतरफा तैयारी, एकतरफा उत्साह अच्छा तो नहीं है पर सच यही है.
कल मेरा दूसरा अल्टासाउंड हुआ. मैंने तुम्हें कम्पयूटर के स्क्रीन पर देखा, पर उतनी तसल्ली नहीं हुई क्योंकि मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह नहीं देख पाई. तुम्हें पूरे को एक साथ नहीं देख पाई. हां लेकिन मैंने तुम्हारा दिल देखा धड़कते हुए. 162 बीट प्रति मिनट की रफ्तार से तुम्हारा दिल दौड़ रहा था. और तब भी तुम हांफ नहीं रही थी! लेकिन इस बार तुम्हारा दिल उतना साफ-साफ नहीं दिखा जितना की पहली बार में दिखा था. वो इसलिए मेरी बच्ची, क्योंकि अब तुम्हारे शरीर में नसें, हड्डियां, मांस-मज्जा, मांसपेशी, खाल सब बनने लगा है. तुम इस दुनिया में आने के लिए युद्धस्तर पर तैयारियां जो कर रही हो. तुम्हारे मेरे पेट में आने के बाद से मेरा वजन सात किलो बढ़कर 60 किलो हो गया है. मैं पहली बार इतने वजन की हुई हूं मेरी जान! मोटी-ताजी. डॉक्टर ने तुम्हारे आने की डेट भी बता दी है 25-30 अगस्त के बीच तुम कभी भी इस दुनिया में आ जाओगी. फिलहाल मैं खाने बनाने जाती हूं, तुम्हें भी तो कुछ खिलाना है न.
उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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