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यहां मैंने कुत्तों को लोमड़ियों की तरह गहरी मांद बना कर बच्चे देते देखा

गिलहरी का घोंसला
-चन्द्रभूषण

घर के सामने एक शहतूत और एक बकाइन का पेड़ है. दोनों मेरे ही लगाए हुए हैं. शकरपुर में लंबे समय तक रहते चिड़ियों की आवाजें भूल गया था. वैशाली, गाजियाबाद में अपना फ्लैट हुआ तो सबसे पहली चिंता यही हुई कि यहां चिड़ियां कैसे लाई जाएं. ये दोनों ऐसे पेड़ हैं जो बढ़ने में ज्यादा वक्त नहीं लेते. जो लोग पहली बार मेरे यहां आते हैं वे यह जान कर चकित रह जाते हैं कि ये पेड़ मेरे ही लगाए हुए हैं. चिड़ियां तो यहां जल्द ही आने लगी थीं लेकिन गिलहरियों ने आने में वक्त लिया. यह और बात है कि पिछले तीन-चार सालों में ही उन्होंने संख्या और सक्रियता, दोनों ही मोर्चों पर चिड़ियों को काफी पीछे छोड़ दिया है. गर्मियों में तो वे पेड़ों से उतर कर आराम फरमाने के लिए बालकनी में रखे गमलों में चली आती हैं और उनकी नर्म मिट्टी में बाकायदा अपने शरीर का आकार बना जाती हैं.

दो-तीन महीने पहले अचानक शहतूत पर बिल्कुल बालकनी से हाथ बढ़ाने की दूरी पर एक सुबह अचानक एक घोसला नजर आने लगा. हम लोगों ने सोचा कोई चिड़िया तो यह बेवकूफी करने से रही. पता चला कि गिलहरियों का एक जोड़ा इस गतिविधि में जुटा है. मुझे पता नहीं कि छोटे स्तनधारियों में स्थायी रूप से जोड़े बना कर रहने की प्रवृत्ति होती है या नहीं. मैंने मां से पूछा कि क्या चूहे जोड़े में रहते हैं तो उसने कहा, जोड़े तो सबके होते हैं. फिर मैंने टोका कि स्थायी जोड़ा तो कुछ चिड़ियों को छोड़ कर और किसी चीज का नहीं होता, तो उसमें कुछ दुविधा नजर आने लगी. जिसे पता हो वह बताए कि गिलहरियों के अलावा क्या वह किसी और स्तनधारी को जानता है जिसमें अपने स्वभाव में ही जोड़ा बना कर रहने की प्रवृत्ति हो. इस बिरादरी में इन्सानों को शामिल मानना शायद ठीक न हो क्योंकि अपनी जाति के पूरे इतिहास में इन्हें जोड़ा बना कर रहते अभी दस फीसदी समय भी नहीं गुजरा है, और आज भी, सारे दिखावे के बावजूद ये इसमें घपले करने से नहीं चूकते.

बहरहाल, गिलहरियों के जोड़े ने पूरे उत्साह के साथ एक सुरक्षित जगह पर मजबूत और सुंदर सा घोसला बनाया और जब घोसला बन गया तो उन्हें लगा कि सामने बालकनी पर बानरों की अलग सी जाति वाले ये बड़े-बड़े जानवर रहते हैं वे कभी न कभी उनके बच्चे उठा ले जाएंगे. लिहाजा घोसला बनते ही उसे उजाड़ने की कवायद शुरू हो गई. इस बार इसे शहतूत से बिल्कुल सटे, बल्कि उसी में उलझे बकाइन के पेड़ की काफी ऊपरी शाख पर घोसला बनाने का फैसला किया गया. एक काफी जटिल प्रक्रिया में पुराने घोसले की उजाड़न से नए घोसले की नींव पड़नी शुरू हुई. इसमें समस्या यह थी कि गिलहरियों के रास्ते में हमेशा कुछ कबूतर बैठे ऊंघते रहते थे जो जोरों की किटकिट के बाद भी रास्ते से हट कर नहीं देते थे. करीब दस दिन की कोशिश के बाद नया घोसला तैयार हुआ तो उसके बनते ही जोरों की आंधी आ गई. आंधी से घोसला गिरा नहीं लेकिन काफी छिन्न-भिन्न हो गया. नतीजा यह निकला कि उसे वहां से भी हटा देना जरूरी समझा गया.

गिलहरियों के प्रेग्नेंसी पीरियड के बारे में भी मुझे कुछ नहीं मालूम, लिहाजा मुझे डर हुआ कि बच्चे होने तक पता नहीं इनका नया घोसला तैयार भी हो पाएगा या नहीं. इस बार घोसले की दूरी और बढ़ा दी गई. इसे हमारे पड़ोसी के नीम के पेड़ पर बनाने का फैसला हो चुका था. पश्चिम की तरफ, ताकि बारिश का मौसम नजदीक आने के साथ दिनोंदिन पुरवा होती जा रही हवा के सीधे रपेटे में न आए. भयानक बात यह हुई कि घोसला आधा ही बन पाया था और फिर आंधी आ गई. इस बार सारे तिनके और धागे बिल्कुल तितर-बितर करती हुई. इस श्रेणी का चौथा और अंतिम घोसला आज भी नीम के पेड़ पर ही दिखाई देता है. पता नहीं यह उसी जोड़े का है या किसी और का. बच्चे अगर इस बीच हो चुके हों तो भी उनके कभी दर्शन नहीं हुए, अलबत्ता गिलहरियों की तादाद कुछ बढ़ी हुई जरूर मालूम पड़ने लगी है. दरअसल, मां-बाप और बच्चों के आकार में फर्क इतना कम होता है कि ठीक से अंदाजा नहीं लगाते बनता.

गिलहरियों का साथ मुझे बचपन से बहुत अच्छा लगता रहा है लेकिन गांव में मैंने कभी किसी गिलहरी को घोंसला बनाते नहीं देखा. गिलहरियों और तोतों के रहने की स्थायी जगह पेड़ों के कोतड़ ही हुआ करते थे. समस्या यह है कि हमारा इलाका अभी महज आठ-नौ साल पुराना है और यहां कोई भी पेड़ अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि उसमें घोसला बनाने भर को गहरा कोतड़ निकल आए. एक दिन मैं सोचता रहा कि ऐसे में गिलहरियों की जात ही यहां कैसे आई होगी. शायद पास के प्रह्लादगढ़ी गांव से कोई जोखिम लेने को आतुर जोड़ा इधर निकल पड़ा हो. लेकिन या तो इस जोड़े की स्कूलिंग ठीक से नहीं हुई थी या यह सचमुच नई राहों का अन्वेषी हो. वरना चिड़ियों की तरह पेड़ों पर घोसला बनाकर बच्चे देने की बात उसने भला कैसे सोची होगी. शाखा पर लगाए घोसले अंडे देने के लिए भले ही काम के हों लेकिन पहले दिन से ही चहलकदमी करने वाले गिलहरी के बच्चों के लिए वे पता नहीं काम के होते भी होंगे या नहीं. जरूर होते होंगे, वरना इनकी आबादी यहां कैसे बढ़ रही है.

नए इलाकों का भी अपना अलग व्याकरण होता है. यहां मैंने कुत्तों को लोमड़ियों की तरह गहरी मांद बना कर बच्चे देते देखा, हालांकि इतनी कोशिश के बाद भी उस पीढ़ी का एक भी बच्चा बचाया नहीं जा सका. और अब गिलहरियों को घोंसला बनाकर बच्चे देते देख रहा हूं. शायद यह एक ही प्लॉट पर ऊपर-नीचे कई सारे फ्लैट बनाकर बेचने की नई इन्सानी युक्ति जैसा ही है. इवोल्यूशन की हजारों साल लंबी प्रक्रिया अनगढ़ और अक्सर नाकाम ढंग से इन्सानों और जानवरों, सभी में सक्रिय है. पता नहीं सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के लिहाज से इसमें किसके लिए कौन सा नतीजा कितना सफल साबित होगा.

चन्द्र भूषण

चन्द्र भूषण नवभारत टाइम्स में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. विज्ञान एवं खेलों पर शानदार लिखते हैं. समसामायिक मुद्दों पर उनकी चिंता उनके लेखों में झलकती है. चन्द्र भूषण की कविताओ के दो संग्रह प्रकाशित हैं.

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