प्रो. मृगेश पाण्डे

छिपलाकोट अंतर्यात्रा : यूँ शाख पे उगतीं हैं कोमल कोंपलें

पिथौरागढ़ घूमते हुए चंडाक से मोष्टा मानू और आगे छेड़ा गाँव की ओर निकल जाइये. पंचचूली की नयनाभिराम पर्वत श्रृंखला के दाहिनी ओर दूर तक पसरी हुई छिपला कोट की मनमोहिनी पट्टी आपको दिखाई देगी. वहीं अगर आप पिथौरागढ़ से पचास किलोमीटर दूर नारायण नगर हैं तो स्वामी नारायण के आश्रम और इसके नीचे डिग्री कॉलेज के खेल मैदान से आगे निकल चलिये. डीडीहाट की तरफ जाते या अस्कोट सिंघाली की ओर आपके कदम बढ़ रहे हैं तो एक से दूसरे सिरे तक जो दुग्ध धवल पट्टी पसरी है ठीक सामने, वह छिपला है. वहीं मुनस्यारी से दक्षिण पूर्व की ओर आपको अप्रतिम फ़्लोरा फोना और जैव विविधता से भरी हरीतिमा के साथ बारह से पंद्रह हजार फ़ीट की ऊंचाई का जो जादुई सम्मोहन अपने आकर्षण पाश में बाँध लेगा वह ही है विस्तृत छिपलाकोट.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

ऐसा ही दूर फैला पहाड़ ऊँची चोटियां और उनमें जाड़ों में पड़ती बर्फ मैंने रांची से देखी थी जिसे चीना रेंज कहा जाता था. कुछ यादें हैं बहुत धुंधलाई सी और बड़ी पुरानी महेश दा की खींची तस्वीरें जिनमें वो पहाड़ पीछे है और मैं कैमरे की खच्च की प्रतीक्षा में जिस पर कभी कभार ददा फ़्लैश भी चमकाता. छोटा गोल बल्ब चम्म करता, झप्प से आँखे चुँधियाती. वो मेरी झिलमिल यादों को सजीव करती तस्वीरें मुझे हर बार पैदल चल कर पहाड़ी रास्तों पर चलते चले जाने का फितूर हर कदम बढ़ाते जातीं और खूब थकने के बाद अपने हल्के पड़ते जाने वाले बदन में फिर कुछ दूर तक चलते जाने का विश्वास पैदा करतीं.

मेरे चचा जिन्हें हम कक्का जी कहते चीना रेंज में फारेस्ट रेंजर रहे. चीना रेंज में वन विभाग के क्वाटर थे, आउट हाउस थे. वहां दौड़-भाग को खूब जगह थी. बड़ी सी डिग्गी थी जिसमें भेकाने दिखते, बड़े मैंढक भी कूदते फाँदते. कभी-कभी अचानक ही न जाने कहाँ से छोटी मुर्गी जैसी बतख जो भूरी सफेद काली चितकबरी होती जिसे जलमुर्गी कहते भी दिखाई देती. घुप्प से पानी के भीतर अपनी कलगी डाल देती फिर अपने पंखों को फड़फड़ा देती. दिनेश दा कहते ये विदेश से आती हैं उड़ कर अपने समूह बना कर. फिर यहीं अंडे देतीं हैं, इनके बच्चे होते हैं. फिर ये अपने बच्चों को ले कर उड़ जातीं हैं.कई किस्म की चिड़िया भी थीं. सुबह शाम वो घर से सटे पेड़ों पर कित्ती देर तक चू -चां करती रहतीं.

अपने उस घर के बाहर तो पूरा जंगल फैला था. वहां खूब जंगली मुर्गी मुर्गे फिरते दिखते. शाम को वह पेड़ों में भी बैठे दिखते. कौवे भी थे खूब और आकाश में डोलती चील. छोटी चाची उनके अचानक वहीँ आकाश में ठहर जाने और तेजी से नीचे जमीन पर लौटने को देख कहती, अब देखना हाँ, द्यो पड़ेगा यानी बारिश होगी और जब खूब बारिश के तहाड़े पड़ते तो किसी भी तरह भीग थुर-थुर होने का इंतज़ार होता. ये सब करने में ईजा के देख लेने से चटके भी पड़ते फिर सब भाई-बहिनों के लुकुड़े बदले जाते. जब खतड़ुआ हो जाता तो कहा जाता कि अब ठंड शुरू हो जाएगी यानी जाड़े की शुरुवात.घर के बाहर भी चूल्हा जलता उसमें सुबह से ही धन सिंह कन्टरों में पानी गरम करने रख देता. चूल्हे के कोयले बारी बारी से घर के भीतर रखे सग्गड़ों में भर देते. सूरज ढलने से बहुत पहले से ही खूब कुड़कुड़ाट हो जाती.

मौज तो तब आती जब बाहर सब ओर रुई के छोटे छोटे छितरे-बितरे कण गिरते, ऐसा लगता जैसे कॉपी के सफेद पन्ने को खूब छोटा छोटा कतरा कतरा कर ऊपर आसमान से बादल फेंक रहे हैं.सब गुम्म सा हो जाता.बड़ी शांति रहती.आमा कहती हयूं पड़ गो. अल्ले तो के नि चितेईं लाग रो, भोल बटी होल अरड़पट्ट. बरफ पड़ती जाती बाहर.

सुबह जब आँख खुलती तो बाहर सब सफेद ही सफेद चीना रेंज की सारी पहाड़ी सफेद, साफ दिखता लड़िया कांटा कहीं खो जाता. कित्ती बार तो कई दिन तक बरफ पड़ती तब बप्पाजी का भी ऑफिस जाने का भेद हो जाता. बड़े दद्दा यानी महेश दा और छोटे दा यानी दिनेश दा भी कॉलेज न जा पाते. बरफ जरा थमती तो बप्पाजी संदूक में से अपने गरम कपड़े निकाल एक-एक कर बरफ में चूटते और बताते कि इससे ऊनी कपड़े साफ हो जाते हैं. हैरत से हम देखते कि जहां की सफेद बर्फ पर बप्पाजी अपना ओवरकोट पटक रहे थे वहां भौत सारी बरफ काली-काली होती दिख रही है.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

अब जब बिलकुल सुबह आँख खुलते ही हिम की चादर की सलवटों के ऊपर सूरज की रौशनी पड़ रही हो तो वह दूध की जैसी सफेदी आँखों में एक चमक सी पैदा करती है. बहुत देर तक देखी भी नहीं जाती. सर्द हवा के थपेड़े यथावत रहते हैं और आँख के कोनों में चुभन सी पैदा करते हैं. बार-बार पलकें आंखों पर पड़ रहे जोर को संतुलित करने के लिए मिचमिचाती हैं और हिम नहाये जिस दृश्य को अभी आपने देखा पलक बंद करते ही वह बड़ी देर तक आँखों के भीतर ठहर सा गया लगता है. बस फिर वही कोशिश की. अपलक निहारो इस अद्भुत रहस्य मय हिम के विस्तार को जिसने अपने इस सौंदर्य में सफ़ेद के भीतर भी कई दूधिया आवरण छुपाये हैं.

अब अचानक ही हल्की पीली सी छाया आती दिखती है बस फिर कुछ पलों का इंतज़ार और ये पीत आवरण में गुलाबी रंग कहीं से छिटक घुल गया लगता है. ये छिपला कोट की हिम से नहाई चोटियां हैं. इनके बगल में सरक गई सी पंचचूली है. अभी आसमान साफ है. पूरा नीला आकाश. जैसे नीला सा वह पन्ना जिस पर कोई इबारत नहीं लिखी हुई है.

अब जो किनारे से बादल आए तो पंचचूली की पहाड़ी के नीचे काले मैल की एक छाया और धब्बा सा लगा दिखा. बचपन में बर्फ में ऊनी कपड़े साफ करने के बाद भी ऐसे ही दाग़ उभरते थे. महेशदा की देखादेखी फोटोग्राफी का शौक लगा, खुद रील धोने व प्रिंट बनाने का भी तो काले सफेद का भेद बड़ी रंगत देने लगा. ब्लैक एंड वाइट फोटो बनाने में में रील डेवेलप कर जब हाइड्रोक्विनेन की ट्रे में प्रिंट छोड़ा जाता है तब यह सिलसिला समझ में आता है.

चांदी लिपटे कागज पर सफेदी का उभार पूरी तरह छा जाने के बाद वह दिखने लगता है जिसे खींचा गया था. समेट लेने कैद कर लेने की चाहत हर किसी के भीतर होती है. सभी इसे अपने भीतर कहीं छापते रहते हैं. हमेशा खचर बचर की आदत के चलते और महेश दा के कैमरे पर हाथ जमाते फोटोग्राफी का सुर लगा लगा तो अपनी चाहत कागज पर उतरने लगी. हाइपो की ट्रे में पड़े इस कागज पर बस वही फिक्स हो जाता है जो चाहा गया था. पर यह सब इतना आसान भी नहीं है. अक्सर प्रिंट अंडर या ओवर होते रहते हैं कुछ ही देर रहते हैं वह पल जिनमें तस्वीर अपने आप में पूर्ण होती है.बिलकुल जंगल में बने जंगलात के उस क्वाटर से चीना रेंज की खींची उस तस्वीर की तरह जो पता नहीं कैसे हमेशा मेरे भीतर बस गई और मैं उस पहाड़ी पर चढ़ने के लिए कोशिश करता रहा.

अक्सर ऐसा मेरे साथ हुआ कि जो थोड़ी बहुत चाहत मेरे मन में उभार लेती वह कभी न कभी असलियत के काफी करीब तक आती भी रही और घूमने फिरने और लटकने की ये खब्त मुझे अभी तो मैं जवान हूं गुनगुनाने का मौका भी देती रही. जैसे-जैसे मैं और आगे की चढ़ाई चढ़ने के काबिल हुआ ये पहाड़ी मुझे और कहीं आगे चलते रहने का न्योता देती रही. पहले तो मैंने सिर्फ वह खड़ा सा पहाड़ देखा था जो आसमान छूता था और उसे छूने का ख्याल ही मेरे भीतर बहुत सारे सपने भर देता था.

पहाड़ी पर जाते जो संकरा सा रास्ता है जिस पर ज्यादा लोग चले भी नहीं हैं और उसके अगल-बगल ऐसे ऐसे पेड़ होंगे जो पहले कभी देखे नहीं होंगे. उनकी जुदा-जुदा सी दिखती टहनियां जिन पर नई सी नवजात कोंपल हवा के हर झोंके से डोलती हिलती दिखाई देंगी. उस पर एक अलग ही संसार होगा. कहीं चिड़ियाओं के शोर के बीच उनके घोंसले दिख पड़ेंगे तो कहीं लंगूर और बंदर से हट कटफोड़वा अपनी तेज चोंच से कटोर बनाता नज़र आएगा. फिर तो जैसे जैसे और ऊँचाई मिली तो वहां मोनाल दिखा. बहुत सारे पंछियों की खूबसूरती अपने में छुपाये इंद्रधनुष से रंग सजाये. इसे देख पाने की चाहत में न जाने कितनी कितनी पहाड़ियां एक दूसरे के साथ जुड़ती रास्ता बनाती गईं जो उस शीर्ष शिखर के करीब आने का मुझे निमंत्रण दे रहा था. यह छिपला कोट था. छिपला केदार.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

जारी…

अगली कड़ी यहां पढ़ें: छिपलाकोट अन्तर्यात्रा: आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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