प्रो. मृगेश पाण्डे

छिपलाकोट अन्तर्यात्रा: आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम

पिछली कड़ी यहां पढ़ें: छिपलाकोट अंतर्यात्रा : यूँ शाख पे उगतीं हैं कोमल कोंपलें

सुबह जब भी आँखें खुलती खिड़की से आती धूप सीधे आँखों पर पड़ती. सामने दिखता वह पहाड़. अब बिस्तर पर पड़े रहने, लधरने या आराम फरमाने का कोई सवाल ही नहीं होता. हमारे बप्पा खुद सुबह बड़ी जल्दी उठ जाते. दो तीन बार चाय पी नहा धो, सफेद धोती पहन वह ठ्या में विराजमान हो जाते. फिर गुग्गुल की धूप की खुसबू आती. घंटी बजती. घंटी भी तो कित्ती भारी थी वो. मैं तो थोड़ी देर में उसे उठा बजा थक जाता. फिर लम्बीss पूजा. दुर्गा दुर्गति शमनी. ओं ऐं ह्रीं क्लीं. फिर आरती. उसके बाद शांख बजती. आखिर में अपराध सहस्तरामि. कई शब्द वाक्य तो मुझे सुनते सुनते याद हो गये. अब इनका मतलब क्या? कौन जाने. सच्ची कहूं जानने की कोशिश ही न हुई. घंटा भर तो लगाते ही बप्पा पूजा में. नौ बजे ठीक रसोई में सफेद घोती पहिने चौके में बैठ खाना खाते. खाना खाते चुप्प रहते. न बर्बाद करते. फिर अपने कॉलेज जाने की तैयारी में. हमेशा सूट पहिनते बंद गले का. हमेशा क्लीन शेव रहते. खुशबूदार क्रीम भी लगाते. जाड़ों में टोपी मफलर, ओवरकोट भी पहिनते. बरफ पड़े तो गम बूट और दिनों काला जूता जिसमें रोज पोलिश होती. ब्रुश रगड़ने के बाद कपड़े से चमकाते. मल्ली ताल में मॉडर्न बुक डिपो के बगल में लू शुन से उनके जूते बनते. जो चीनी था और उसकी बीबी भी जूते बनाती थी. हमारे जूते तो तल्ली ताल वाले फकीरा के यहाँ बनाए जाते. जिसकी दुकान पुरानी बाजार में कल्लू चूड़ीवाले के अगल बगल थी.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

सुबे का टाइम तो हम सब भाई बहनों की मौज का होता. बस हाथ मुं में पानी लगा बाहर. वहाँ हमारे स्वागत में कई दुम हिलती. उनमें सबसे जबरजण्ड था शेरुआ.दलीप सच्ची कहता, जने गप्प हाँकता कि शेरुआ के आगे तो बाघ भी रास्ता बदल दे. कुकुरी बाघों को तो छेरुआ लग जाये. कक्का के लिए पतरोल खीमबू उसे धारचूला से भी उप्पर के गों से लाये थे. वो दिन भर सोता. उनींदा रहता. मैं तो उसकी पीठ पे बैठ भी जाता. जैसे-जैसे रात पड़ती वो ख़तरनाक हो जाता. भोंक-भोंक सबकी नीन तोड़ देता. उसका दगडुवा भेरू था जिसकी जात दनपुरिया थी. अब आस पड़ोस में भी जितने क्वाटर थे उन सबके घर पल रहे कुत्ते अगर मिला कर गिनो तो वो ग्यारा होते. दलीप बताता बाकी सब भी ढटुवे होते पर इनकी जात औकाद नहीं शेरुआ और भेरू ने सुधार दी थी.. थोड़े-थोड़े महीनों में उनके पिल्ले भी जन्म लेते. फिर सारे घरों में नाचने वाली तीन बिल्लियाँ थीं. उनमें से एक काणी थी जिसकी आँख में भेरू ने गुस्से में आ अपने पंजे का वार कर दिया था. वो तो उसे भबोड़ ही देता पर अच्छा हुआ कि दलीप और धनसिंह ने देख लिया और बचा लिया. तब से इसका नाम ही काणी पड़ गया. मुझे तो वो बिल्कुल पसंद न थी. ऐसे चिंगारे मारती कि खून की रेखा खिंच जाती. उनमें एक और सबसे बड़ा था ढडुआ. दलीप ने मुझे समझाया था कि कभी कभी जब वो घर आता है तो बिल्लियाँ अजीब सी आवाज क्यों निकालती हैं. उसको सब डोली कहते थे.

बप्पा जी भी जब घर में आवाज लगा मुझे न पाते तो कहते कहाँ है वो कुनुआ डोली. घर के अंदर एक मिनट नहीं टिकता. जब मेरा जनम हुआ तो साल भर खूब बीमार रहा बल. फिर बिषाड़ पिथौरागढ़ वाले भट्ट जी घर बुलाये गये तो उन्होंने ज्वाला देवी की पूजा की. घर में सबको बताया कि आठवां मंगल है साथ में राहु और शुक्र भी.मंगली हुआ. पहले तो शादी करेगा ही नहीं हो पड़ी तो कटा-फटा ही रहेगा. पर तुला का शनि है. चंद्र भी बढ़िया. खूब घूमेगा. ऊँचाइयां चढ़ेगा. अभी तो कान छेद के बाली पहना देते हैं. अरिस्ट कटेगा. तब से मेरा नाम ही कुन्ना पड़ गया. आमा तो कुनुआ कहती. धनसिंह और दलीप कुन्नू बाबू.

उस दिन सुबे भी हम तीनों भाई बहिन गाय के गोठ के पीछे मस्ती मार रहे थे. गोठ में खिड़की भी थी. उस पे एक हन्तरे सा पर्दा भी लगा था. गोठ में दो गैया रम्भा और लछमी थी. उनकी बछिया भी. तभी दलीप एक हाथ में पीतल का लोटा और दूसरे में छोटी बाल्टी लिए गोठ में घुसा और दोनों बछिया खोल दीं. दिलीप को देखते ही बछियाऐं कूद -फांद करने लगीं थीं. फिर दोनों अपनी-अपनी इजाओं का थन चूसने लगीं . आमा बताती थी कि एक थन का दूध उसके बच्चे के वास्ते ही होता है.

ये दलीपुआ तो पूरा दूध भी नइं पीने देता. हमने देखा कि दलीप ने चार -पांच मिनट में ही बछियाओं का मुंह थन से अलग कर उन्हें बांध दिया.सरिता गुस्से से बोली आज ही शिकात करुँगी इसकी कक्का जी से. हम सब चाचा को कक्का कहते तो वह भी कक्का जी ही कहती. वह हम सबकी लाडली थी. सबका कहना मानती. हर काम खूब मन लगा कर करती. जंगल भी जब मेरे घूमने का मन होता तो वह मेरे साथ आती और पोल भी नहीं खोलती कि हमने क्या क्या किया. उस छुटंकी की सीरियसनस देख उसका नाम बुआ पड़ गया. कक्का जी से दलीप की शिकायत पर हम सब उससे सहमत थे.कुछ भी कहो तो अकड़ जाता है. अड़यॉट है पूरा.

उस खिड़की से हम ताक -झाँक कर ही रहे थे कि आगे हमने देखा कि जब पीतल के लोटे में दिलीप ने लबालब दूध निकाल कर थन से एक पिचकारी सी मार उसमें झाग ही झाग बना दिया. फिर लोटा जमीन पर रखने के बजाय सीधे अपने मुँह से लगाया और बैठे- बैठे ही धटाघट पी गया. ये नजारा देखने वाला सिरफ मैं ही था क्योंकि दोनों बहनें कुछ और खुड़-बुड़ में लगीं थीं. अब जो मेरे दिमाग में आया कि आमा और इजा दोनों कहतीं थीं कि आज कल दोनों गाएं दूध कम दे रहीं अभी पिछले महिने ही तो ब्याहीँ हैं. मैं अब खिड़की छोड़ सीधे गोठ के दरवाजे पर टेक लगा खड़ा हो गया. दिलीप मुझे देख सकपका गया और बाजू की कमीज से अपने थोल पोंछने लगा. बिचारा. अभी उसकी मुच्छी में दूध लगा ही रह गया था. किसी को बताना मत कुन्नू बाबू, साब तो मुझे नौकरी से ही निकाल देंगे. आपुँ जो कहोगे मैं कर दूंगा. जंगल से ला काफल खिलाऊंगा घिँगारु भी और कीमू भी. मोती घोड़े में बिठाऊंगा. कैलाखान ले जाऊंगा भुवाली वाली चुंगी के रास्ते.जो कहोगे वो कर दूंगा. आपूँ तो मेरे माई बाप हुए. उसकी बात सुन मुझे बड़ी कलकली लगी पर कुछ सोच अपनी भों मैंने टेढ़ी ही रक्खी.

मुझे उस पहाड़ पे ले जायेगा? खट से मैं अपने मन की बात बोल गया. हाँ हां ले जाऊंगा. अरे बाप कसम.चिना पीक भी ले जाऊंगा. जहां कहो वहाँ ले जाऊंगा कुन्नू बाबू. बस साब से चुगली मत करना. उनको पता चला तो पिछवाड़े खुसयाणी डलवा देंगे. नौकरी जाएगी अलग. फिर देखो दिनमान भर काम करता हूं. थोड़ी ताकत मीकों भी तो चहिये. अब्बी- अब्बी ब्या हुआ है. उसमें बड़ी ताकत चाईए कुन्नू बाबू. तुमको सब समझाऊंगा. जहां कहो वाँ ले जाऊंगा.

तो ठीक है. मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा भैरु कुत्ते से भी नहीं. बस मुझे वाँ जंगल से उप्पर पहाड़ ले जा. हाँ हाँ, ले गया समझो कुन्नू बाबू. अचानक ही वो पलटा.बोला कौन वो लड़ियाकांटा वाले. उसमें तो पूरा दिन लगेगा और फिर आप चल कहाँ पाओगे? क्यों नहीं चलूँगा. मैं चड़ूंगा और जब थकूंगा तो तू अपने काने पे चढ़ा लेना.सोच ले. अगर नहीं ले जायेगा तो समझ ले अभी जा के सबसे पहले कहता हूं कक्का जी से. अरे नहीं कुन्ना बाबू, मैंने ना कब कही.अब वाँ वाले पहाड़ में तो बाघ भी है. भूत प्रेत मसान भी. भेसुणा भी. अब जब आपुँ ही नहीं झसकोगे तो मुझे क्या? ले जाऊंगा मैं.

लो कित्ता लोगों से कहा मुझे वो उस लड़ियाकांटे की चोटी पे ले जाओ तो सबने टरकाया.बप्पा जी से कहने का तो सवाल ही नहीं हुआ. उनका तो खौफ हुआ. महेशदा उनको हिटलर कहते. दिनेश दा उनको दुर्वासा का अवतार बताते. अब ये दुर्वासा जो होगा,इत्ता में समझ गया था कि वो खूब चूट -चाट देता होगा. इत्ते लप्पड़ लगाता होगा कि गलड़े लाल हो जाते होंगे. क्या मालूम भेल में शॉट भी लगाता हो. पर सच्ची में बप्पा जी ने मुझे या बेणीयों को कभी हाथ भी नहीं लगाया. कभी कभी वो कहानियाँ सुनाते कभी भगत सींग की कब्बी सुबास चंद्र बोस की. कभी हम सबको अगल बगल बैठा हारमोनियम पे गाने गाते. उनकी भारी आवाज थी. कोई सहगल और पंकज मलिक के गाने गाते. बुआ तो उनके गम भरे गाने सुन आंसू भी निकाल देती.

जब इतवार की उनकी छुट्टी होती और मौसम खुला होता तो बहुत दूर तल्ली ताल,मल्ली ताल तक ले जाते.ईजा को तो सिरफ तब जब कहीं मंदिर या न्यूत में जाना होता. हम बच्चों की फौज के मजे रहते. वो हमें तल्ली ताल आड़त के पास जगरिया हलवाई के यहाँ दही-जलेबी खिलाते. उसके यहाँ मालपुए भी बनते. खूब सारी मिठाई ली जाती. बालूशाही भी. जगरिये की दुकान से लौटते हुए हम सब बच्चे बड़े चटपटे स्वाद के मिलने की आस से भर जाते क्योंकि वहाँ किसम किसम के चूरन होते अनारदाने वाला, जीरे वाला और हींग वाला. ये हींग वाला मुझे तो अच्छा नहीं लगता. इसको तो खाते ही खाप से अजीब सी बास आती और खूब पाद आती. सबसे बढ़िया अनारदाने का चूरन होता. यह खूब लम्बे तगड़े वैद जी की दवा वाली दुकान थी जिनका नाम सीतावर पंत जी होता. वो सबके हालचाल पूछते. बप्पाजी यहाँ खूब देर गप लगाते और आमा से ले कर ईजा चाची माया दी सबके लिए दवाई सवाई ली जाती. ये बोतल में भरी होतीं. कभी कभी पुड़िया भी बंधती. वहाँ दुकान में हम चुपचाप बैठे रहते. हर बार बप्पाजी उनको बताते कि मेरा पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता बस दिन भर डोलीकूकरी करता है. तब मेरे लिए कुछ गोली मिलती जो ब्राह्मी बूटी कहलाती. वहाँ बड़े वैद जी के साथ दूसरे वैद जी भी होते जिनको सब सिविल सर्जन कहते. उनका नाम श्री पीताम्बर पंत होता और वो हम बच्चों से खूब बात करते और चटपटे चूरन खिलाते जाते. बप्पाजी से कहते हरदा बच्चे जितने धीँगामस्ती करें उतने फिट.लुत्तबैठ जाएं तभी बीमार होते. सो इनको निगरगंड फिरने दो. फिर देखना कैसी कैसी ऊंचाई चढ़ते हैं.

ऊंचाई के नाम पर में फिर उदास हो जाता. जहां जाने की मेरी असली मन होती वहाँ ले जाने को तो सब टरकाते हैं.जब वो हमको चूरन दे रहे थे और बप्पा जी सीतावर पंत जी से बातों पर लगे थे तो मैंने सिविल सर्जन वैद जी से पूछ ही लिया कि कोई ऐसी गोली होती है जिससे ऊँचे पहाड़ में चढ़ने में पटे न लगे. अचानक उन्होंने मुझे गौर से देखा और मेरे गलड़े अपनी ऊँगली से दबा के बोले हाँ!हाँ! तू बड़ा तो हो. ऐसे ही दुबला पतला फिट रौ, तो चढ़ेगा पहाड़. वो पहाड़ ही होता है बेटा, जहां सब जड़ी बूटी उगती है. फिर सबको सुना के बोले ये तो बड़ी होसियारी की बात कर रहा हरदा. अभी से पहाड़ चढ़ने की बात.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

और काम ही क्या है इस डोली का दिनभर घूमते रहेगा. जंगल की तरफ भी जाने लगा है अब. देखो कैसा लुस्तुरिया जैसा हो गया है. अरे नहीं हरदा, ऐसी काया सबसे भली. पहाड़ी बच्चे इसीलिए तो फिट होते हैं. इसे खूब खेलने दो. चढ़ने दो. मैंने देखा सब मेरी ओर ही देख रहे थे और वो गंगा सिंह मुझे देख मुस्का रहा था. दुष्ट कहीं का गंगुआ. हर बखत मेरी खिसाई लगाता है. मैंने दीनामणि जी का हाथ पकड़ा और सब दुकान से बाहर आ गये.

आपुँ को पहाड़ पे जाना अच्छा लगता है कुन्नू बाबशेप. मुझको भी. हमारे लुआघाट में तो और खुले खुले पहाड़ दिखने वाले हुए. बरफ वाले. एक धार से पल्ली धार तक. पूरा हिमाला हुआ वाँ. शिबज्यू का घर हुआ वहाँ. तुमीकें मालूम वहीँ से जाते जाते कैलाष परवत आता है. हमारे बॉर्डर पे कुटी गों के पार. ‘कुति गों ये कैसा गों हुआ?’ मैंने पूछा तो दीनामणि जी बोल, ‘कुति नइं भाऊ कुटी गों. वो हमारे देस का आखिरी गों हुआ. वो जो व्यांस घाटी हुई वहाँ, वहाँ तलक तो में गया हूं. वहाँ के लोग देबता को “सै ” कहते हैं. वहाँ शिबजू का नाम पाड़ा “गंगरी ” जो महादेब हुए. शिब जू के लिंग को ‘लिंगू’ कहने वाले हुए. वहाँ के हर गोठ में सुफ़ेद डांसी पाथर पर दो दो हाथ तक बड़े लिंगू थापे दिखते हैं. बोल बचन भी एकदम सोला आने सच्ची करते हैं वहाँ गों के सयाने. कुन्नू बाबशेप जब पुजा पाती होती है तो उन बड़े बुजुर्गों के आंग में द्यापता आता है. जिसके आंग में आता है उसे धामी कहते हैं. जैसा हमरे याँ जगरिया डंगरिया हुआ वहाँ कम्प आने वाले को “लमां” कहने वाले हुए’.

अचानक ही वो रुके और मुझसे कहने लगे ये देखो दुर्गादत्तजू की दुकान. लोटे से बनाते हैं ये जलेबी पूरी पहाड़ी घी की. ना हो. मुझे नि देखनी जुलेबी. वो बताओ जो कम्प आता कै रए थे. ‘अरे! उसको देख कर तो हाड़ कांप जाते हैं. जब वाँ पुजा होती है तो बड़े से बाकरे के सीने में खुकरी डाल उसका कलेजा निकाल देता है वो धामी जिसको वहाँ ‘लमां’ कहते हैं. लमां के हाथ में फड़कता- धड़कता कलेजा होता है बाबशेप. अब वो जिसके बारे में जो भी बोल बचन देगा वो एकदम सच्ची होता है. जिस मेंस के बारे में बताएगा तो एकदम सच्ची. मेंस नाते बिरादरी क्या पूरे गों के बारे में जो कह देगा एकदम सच्ची. पहाड़ हुआ बाबशेप वो भी शिबजू का घर. जब आपु ठुलशेब हो जाओगे तब जा के देखोगे उत्ते ऊँचे पहाड़. वहाँ तो सच्ची में ठाकुरजी का वास हुआ’.

‘हाँ, मैं जाऊंगा, अभी तो पहले वो लड़ियाकांटा के पहाड़ जाऊंगा दलीप के साथ. वो मुझे ले जायेगा’. ‘दलीप वो रंकरा तो गपोड़ी है. खाल्ली मूली टरका देगा’.दीनामणि जी बोले.

‘ना – ना जब पेड़ों की छपाई होगी तब ले जायेगा. कैसे नहीं ले जायेगा. उसकी तो फटी पड़ी है.’ मैंने भी ताव दिखा दिया.

‘क्या? ऐसे नहीं बोलते बाबशेप. जुबान खराब हो जाती है. आपूँ तो बड़े हो के ठुल्सेब बनोगे. ऐसे बोलोगे तो?’

‘अच्छा अच्छा नइं बोलूंगा. लो! ये तो भूर्रन की दुकान आ गई मोमफली वाली’.

‘हाँ, हमारे लुआघाट की तो मोमफली बेचते हैं सौ ज्यू’.चमड़ी अंग्रेजों जैसी है इसी वास्ते नाम भूर्रन पड़ गया ‘.

जब भी घूमने आते तल्ली ताल,तो यहां बप्पाजी जरूर रुकते. दुकान से मोमफली खरीदी जाती और चने भी. भूर्रन की दुकान में खूब भीड़ होती. वो बड़े से लोहे के कढ़ाए में बड़ी बड़ी मोमफली भूनता और किसी की ओर न देखता . सामने पहले से सिकी मोमफली होती. लोगअपनी बारी का इंतज़ार करते मोमफली उठा उठा खाते जाते. भूर्रन कुछ न कहता. मुझे लगता वो बड़ा बढ़िया आदमी होगा. दिखता भी अंग्रेज जैसा.जब तक हमारी बारी आती मूम्फ़ली मिलने की तब तक बप्पाजी पंजाबी की दुकान से कुछ कपड़ा सपड़ा, कटपीस, धोती, ब्लौज का कपड़ा खरीदते. पूरा मलेसिया का थान ले देते जिससे मेरी पैजामा भी बनती और बहनों के फ्रॉक भी. उसी से पेटीकोट भी बन जाते. जूट और पोपलिन भी लेते तो बढ़िया माल कह पंजाबी कई कट पीस भी थमाता. घर में सारी औरतें ये सोच विचार करती रहतीं कि किस कपडे से क्या बने. आखिर में सब माया दिदी के जिम्मे होता. उनको खटाखट मशीन चलाना आता.

फिर आगे के डी कर्नाटक की दुकान पे बप्पाजी हमें ले जाते. सबके लिए कुछ न कुछ लिया जाता. इस दुकान में अखबार भी मिलते जिसमें हर जगह की खबर छपी होती. बप्पाजी कहते अखबार रोज देखो. रोज इसके दस शब्द याद करो. ये तो बड़ा कभाड़ी काम होता. मुझसे न होता. मुझसे पहले ही छोटी बेेणी खटाखट याद कर लेती और सबकी नज़र में होशियार बन जाती. जो बात हो या शब्द जिसे सुन लेता मैं,वो अपने आप ही याद हो जाता. रट्टू तोता क्या बनना? दुकान से खरीदता जरूर, पिंसिल, कॉपी, रबड़ जिसे मुझे लबड़ कहना ज्यादा अच्छा लगता . नई-नई कॉपी के पन्ने चरका उनके एक एक रुपे के बराबर कैंची से काट नोट बनाता. फिर उनकी गड्डी बनती. कॉपी के कागज से नाव बी बनती और जहाज भी. फिर डिग्गी में नाव तैराते. जहाज उड़ाते.दुकान से चंदामामा भी लेते. मैं तो रंग का डब्बा जरूर लेता और बुरुश भी. चंदामामा के चित्रों पे फिर से रंग भर देते. बुरुश से जिन चित्रों में दाढ़ी मुच्छी नइं होती उनकी नई -नई किसम की मुच्छी बना देता.बप्पा जी के ऑफिस के सफेद कागज भी सटका के उनमें खूब चित्र बना रंग भरते. दीवारों पे भी बना देते. डांठ तो पड़ती पर कक्काजी कुछ न कहते.मेरे चित्रों में तरह तरह के पेड और पहाड़ होते इसलिए भी वो खुश रहते.

जब हम घूमते तो हमारे साथ गंगा सिंह और दीना मणि जी होते जो बप्पा के कॉलेज में काम करते. जो भी खरीदा जाता उसके थैले-झोले, लुंतुरे पूंतुरे वोई पकड़ते. जब हमको पटे लग जाती तो गोदी में भी उठा लेते. मुझे तो दीनामणी जी की गोदी में सज आती. जो मुझे खट्ट से अपने काने में भिटा लेते. वो गंगा सिंह तो कस्स के पकड़ता और बीच बीच में कुतकुताई भी लगाता. जरा कुछ मस्ती लो तो साब से शिकायत की धमकी देता. मुझे वो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता. मैंने तो उसका नाम गँगुआ रख दिया था. दीनामणी जी तो भौत बढ़िया थे. वो कॉलेज में माली थे. सब लोगबाग कहते उनके हाथ में जस है. उनके हाथ का लगा पौँधा खूब फलता फूलता. रांची हमारे घर आते तो हमारे लिए लमलकड़ी लाते गट्टा लाते. बस आते ही क्यारी की ओर चल देते और वहाँ खोद-खाद में लग जाते. कक्का जी तो उनसे खूब खुश रहते और जेब में हाथ डाल इनाम का नोट देते.

दीनामणि जी की लम्बी चुटिया थीं. हमेशा उनके कपाल में पिठ्या लगा रहता और टोपी में फूल ठूंसे रहते. कित्ती बार तो वो हमारे घर पूजा भी कराते.दीनामणि जी लोहाघाट के पास के गाँव के थे और उनकी इष्ट वाराही देवी थी. बप्पाजी का मानना था कि दीनामणि सगटा जो पूजा कराता है वो तुरंत फल देती है. वो दिनमान भर पाठ करते.एका बखत खाते. एक बार दलीप की नई नई ब्वारी ने भी खूब बौल्याट मचाया. यां वां डोलने लगी. ऑंखें नचा नचा अपनी झाकरी खोल कभी दौड़ लगाती कभी टप्प पड़ जाती. फिर दीनामणि जी को बुलाया. उन्होंने आग जला,उसमें क्या क्या सरसौं खुस्याणी डाल दलीप वाली ब्वारी अंदर घुसा मसाण निकाल वहीँ भसम कर दिया.कहीं गाड़ पार करते चिपट गया था. अब राख भी नइं छोड़ी पंडित दीनामणि ने. सब ताँबे के लोटे में डाल गधेरे में बहा दी.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

एक और पंडित पड़ोस से ही धाल लगा कर बुला लिए जाते छोटी- मोटी पूजा में जिनका नाम पतरोल लोहनजू था. दलीप बताता कि जंगल में घा काटने वाली औरतें तो पतरोल लोहुन जू की फाम पाते ही यहाँ- वहाँ भाग जातीं छुप जाती. ये पतरोल तो सैणियों में चिपट जाता, अंगवाल डाल देता कस्स के. तुमको क्या मालूम कुन्नू बाबू! अबी तो तुम छोटे हो. हाँ हो!उमर ही क्या है तुम्हारी? तुम क्या जानो सैणियों की लीला. रंगोल देतीं हैं. बड़े होगे तब जानोगे.

छोटा हूं! छोटा हूं. तभी सब कहते रहते हैं, ये नहीं कर सकता, वो नइं कर सकता. महेश दा अपना तो, खूब घूमते, कहाँ-कहाँ जाते दिल्ली -विल्ली भी, मैंने कहा मुझे वाँ पहाड़ ले जाओ,तो बोले अभी तू छोटा है. बड़ा हो ले फिर चलेंगे. फोटो भी खींचेगे. दिनेश दा से कहा तो वो बोले वाँ अंग्रेजी भूत रहता है. कैसी जगह जाने की बात कह रहा तू जिसके ठीक नीचे मुर्दाधाट है- कैलाखान वाला. अंग्रेजों की कबरें भी हैं.सर कटा अंग्रेज अपने धोड़े में टक -टक घूमता है वहाँ. वो धनसिंह जिसका नाम ही धनिया पड़ गया वो बताता कि वाँ परी-चरी भी रहती. वो जो पेड़ में सफेद वस्त्र के चीर लटके होते वहाँ उनकी पूज होती. उनमें दुध परी भी होती है.बस उसके बारे में अच्छी अच्छी बात सोचो तो वरदानी होती है. जो चाहो देती है पर उनके बारे में अंड बंड सोचना भी नी हुआ.गन्दी नज़रसे सराप दे देतीं हैं खट्ट. मर्दों के आँडू गायब कर देती हैं.उस पहाड़ में जाते लाल चट्ट लुकूड़े भी ना पैरने हुए. लड़कियों को तो बोल्याट चढ़ जाता है.

अब कोई दुध परी ही मिल जाती वोई वरदान दे देती पहाड़ में चढ़ने का. यहाँ तो मेरी सुनने वाला कोई नहीं. डराने झस्काने को सबके पास कोई न कोई काथ कहानी है. वो धन सिंह तो और डराता है कि शाम होते ही पहाड़ में टोले घूमते हैं. अभी इस गधेरे में झप्प से लाइट दिखेगी तो मिनट भर बाद उस धार में. सब भूत मिल कर डांस करते हैं. मुझसे भी कहता शाम होते कि वो देखो टोला. पर मैं होशियारी दिखा सामने देखता और आँखे मून लेता. फिर जोर से कहता हाँ हाँ देख लिया दो तीन थे. रात को जब कोई रांची की तरफ आता तो लालटेन साथ होती. मुझे तो कई बार लगा कि यही होगा टोला. अब जो करता है. ऐसा डरा देते हैं यहाँ कि अच्छा भला डरपुक्कू हो जाये.

पर दिन में जरा अकेले घूमने जंगल की ओर निकल जाऊँ तो बहनें ही चुगली कर दें.फिर कोई न कोई धाल लगाए. मैं भी खूब छकाता. ऐसे ही थोड़ी चल देता हूं जंगल की ओर. अपना भोटिया शेरुआ चलता है दगड़ -दगड़. पर कोई आये तो वोई खबर भी दे देता कि में कां पर लुका बैठा हूं. एक बार तो अंगरियाल भी पीछे पड़ गये. पीछे बड़ी गलत जगह में काट दिया. सोने का भी भेद कर दिया. बुखार भी चढ़ा. आमा ने पैजामा खोल सबके सामने चूक घिस दिया.शाम बप्पाजी से शिकायत हुई.. अच्छा हुआ कि उन्हें आता देख मैं पेट के बल ऐसे पड़ गया कि जैसे गहरी नीन आई हो. बप्पा जी ने भी पैजामा सरका के देखा. अरे बहुत सूजन है ये तो. बुखार भी है.देख नहीं सकते?दिन भर करते क्या हो?अब मेरी इजा और माया दिदी पर गुस्सा बरस रहा था. मेरी पेजामा ऊपर कर वह मेरे सर को थपका रहे थे. अरे कब सरक जाता है ये पता ही नहीं चलता कका. अब दिनमान भर गोठियाने से तो दब्बू हो जायेगा. अब खेलने कूदने की उमर ही हुई. हाँ!हाँ!ठीक है. अब महेश से कहता हूं वो पढ़ायेगा इसे. दिन भर के लिए काम देगा तो एक जगह बैठेगा और वो हर समय दलीप धन सिंह के साथ मत रहने दो इसे. भाषा कैसी हो गई है गँवारों जैसी. पूरा डोली हो गया है एक जगह पाँव नहीं टिकते.

चुप्प सब सुन रहा था मैं.एक और सजा मिली वो भी बड़े दद्दा से पढ़ने की. बाप रे जरा लाइन टेढ़ी खींच दो तो ऐसा चनकट मारते हैं कि बरमांड हिल जाये. और पूरा काम होने तक कुर्सी टेबल में तन कर बैठना भी हुआ. जरा टेड़े मेड़े हो लधार लगायी कि फिर चट्ट. अच्छा हो बप्पाजी सुबह महेश दा से कहना भूल जाएं. वैसे महेश दा का भी एक भेद मुझे मालूम है वो जंगल की ओर जा पेड़ के नीचे बैठ सिगरेट पीने का. पर बाप रे उनकी शिकायत की हिम्मत किसमें. फिर वो अपने रेडियो में कैमरे में हाथ लगाने देते हैं.अच्छा तो ये रहेगा कि जब जंगल को जाऊं तो उनके कैमरे से फोटू खींचू.डोली तो में बना ही दिया गया.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

अब जाऊंगा फिर जंगल. वो साले अंगर्यालों के छत्ते पे शाम के बखत घासलेट डाल फिर मसाल बना आग पाड़ दूंगा. दलीप से कहूंगा कि ऐसा कर नहीं तो दूध के लोटे वाली बात कक्का जी को बत्ता दूंगा. अब तो मुझसे कुच्छ भी कहते रहो. मुझे क्या?डोली नाम भी पड़ गया. तो डोली बन कर दिखाऊंगा. जाऊंगा अब तो जहां लड़ियाकांटे के जंगल होते,वाँ की चोटी पे जाऊंगा मैं. ये दिलुआ ले जायेगा अब. नइं ले गया तो सीधे कक्का जी से शिकात. बुआ भी कहेगी कि बछिया को दूध नहीं पीने देता. मेरा तो काम बन गया. अब सबको बताऊंगा बाद मैं. कित्ता मुझे डराते झसकाते थे. और वो दिनेश दा. कहाँ मुझसे कहते कि उनके बाबू यानी हमारे ताऊ जी ने सिपाही धारा में गरम पानी की धारा में नहाते भूत की चुटिया पकड़ ली थी.वो तो सब तंतर मंतर जानते रहे. वइं महेश दा कहते कुछ नहीं होता न भूत और ना ही आत्मा परमात्मा. सब कमजोर दिमाग का खिलौना है. अब पूजा तो बप्पा जी भी करते रोज सुबे शाम. देबी की पूजा. इत्ते जोर जोर से कि एं ह्रीं क्लीं में मुझे तो झुरझुरी हो जाती. पर जब कोई भी चीज घर पे ठीक न लगती तो डांठ भी घर में अम्मा, ईजा चाची और माया दिद्दी को पड़ती. कहते औरतों को सउर नहीं होता. एक काम ढंग से नहीं . बच्चे ऐसे भिदड़ुए बने घूम रहे. नौकरों और ये जंगलात वालों की संगत में जंगली हो रहे. फिर हमको भी डांठ पड़ती और वो बुआ यानी हमारी गोलमटोल सबसे छोटी बैणी सरितायानी बुआ बप्पा जी की गोद में बैठ लेमनचूस चूस रही होती. उसे बप्पा जी कभी न डांठते.मैं ही तो था जो सबसे ज्यादा डांठ खाता.

छिपला कोट जाने का जब कार्यक्रम बन गया तो फटाफट तैयारी शुरू हुई. सब कुछ समेट जब तकिये पर सर रखा तो ऐसी नींद पड़ी जैसे कब से सोया न होऊं. कहाँ मैं सुब्बे पांच बजे उठ चौकन्ना हो जाता पर उस दिन तो मुझे भंभोड़ कर उठाया गया. क्या हो गया तुम्हें आज कह मेरा मुँह भी सूंघा गया. क्या हुआ था मुझे. बस जिद चढ़ी थी. तब भी और अब भी.

 जिद तो पकड़ ही ली थी मैंने दलीप से कि ले जा. कब ले जा रहा. वह मुझे बोत्याता. कुन्नू बाबू जब उस जंगल में पेड़ों की छपाई होगी तब मेरी ड्यूटी लगेगी. और लोग भी होंगे साथ. तब चलेंगे. बिना किसी काम के कौन जायेगा वहाँ और कैसे आपुँ को ले जायेगा मी. एक दो खच्चर भी ले चलेंगे. जब थक जाओगे तो उनमें सवारी गांठ लेना. चल हट मैं खच्चर वच्चर में नहीं बैठूंगा. वो अपने मोती घोड़े को क्यों नहीं ले चलें. नहीं कुन्नू बाबू उसपर तो साब बैठते हैं अब आपु पूछ लेना साब से. उनने हाँ कर दी तो फिर मोती पर ही भैटना, सर पर टोप पहिन कर साब की तरह. पर घोड़े में भैटने पर भेल बहुत फचकते हैं. अरे कुछ भी फचके बस तू चल और हाँ वो बेणीयों को मत ले चलना. मुझे फालतू की च्याँ -म्याँ नी चहिये. अरे आप को ही ले जाना कलेजे तक प्राण ला रा,अब औरों को ले जाने में तो राम नाम सत् हो जाएगी.

यहां रांची से दस कोस दूर चढ़ाई पे है वो लड़ियाकांटा की चोटी. बीच में सब जंगल, खूब काकड़ दिखते हैं रास्ते में. कभी कभी घूरड़ भी दिखते हैं. बाघ भी है वहाँ और जंगली सुवर भी. वहाँ टॉप से नीचे देखने पर भवाली हल्द्वानी का रास्ता, गेठिया ज्योलिकोट सब दिखेगा. दूसरी तरफ नैनीताल के मकान बलिया गधेरा देखोगे. और उससे आगे पहाड़ नहीं हैं क्या? मैंने पूछा. पहाड़ ही पहाड़. अरे मौसम साफ हो तो हिमालय वाले झक्कपहाड़ दिखते हैं. नेपाल वाले पहाड़. नेपाल वाले पहाड़ वोई नेपाल जहां से डोटियाल आते हैं.इत्ती दूर से आते हैं ये दाई? मैं आश्चर्य से भर गया.हाँ कुन्ना बाबू जहां बेतड़ी पार से हमारा भीम बहादुर और उसके बच्चे आये हैं. बच्चे कहाँ?उसकी तो सैणी आई है.जो नाक के बीच में वो क्या पैने रखती है, नथुली फतुली. ना ना, उसको बुलाक कहते हैं. और घरवाली को भी बच्चे ही कहने की रीत हुई.गज्जब अब सैणी बच्चे हो गई तो बच्चे को क्या कहेँगे? मैं जरा उखड़ गया. लो हो, अब ज्यादा कुकाट नि करो . बुद्धि तो चकरघिन्नी है आपु की. अब देखोगे,सब देखोगे नैनीताल के पहाड़, कुमु के पहाड़,नेपाल के पहाड़.

सब जैसे एल्बम में लगी फोटो के पन्ने पलटना जैसा है जिसे छूने महसूस करने में मेरे सपनों के चार दशक गुजर गये.पर लड़ियाकांटा आज भी उतना ही ताजा है चाहे वहाँ चट्ट धूप हो, चौमास हो या फिर ह्युन वाले दिन जब पड़ती बरफ से पूरा आंग कुड़कुड़ा जाता था.वहाँ तक जाने पहुँचने की घटनाएं कुछ गड्ड मड्ड सी हुईं हैं ,पर याद हैं . सपनों में भी नजर आता है वो पहाड़. वो रास्ता.बस जाना तो उस चोटी पर था. वह चोटी जो अब छिपला का रास्ता दिखा रही थी.बस पिथौरागढ़ से चल निकलने की देर थी. अब ये महीना तो घूम घाम में ही निकल जायेगा.

 छिपलाकोट का फैलाव मुंशियारी से नीचे मदकोट-रीगू गाँव के आगे सेराघाट से हो कर शांत सहज इठलाती सी गोरी नदी के किनारे बसे बरम गाँव की ओर है.वहीँ अपने सुसाट-भुभाट से संकरे ऊँचे पहाड़ों को गुंजाती तवाघाट, जौलजीबी, बलुआकोट का रस्ता ले रही काली नदी के साथ लम्बा सफर तय करती धौली गंगा के किनारे दारमा घाटी में आसमान को छू जाती पंचचूली तक पसरा है .पिथौरागढ़ से ओगला होते अस्कोट से नीचे जाते घाटी में फैला है बलुआकोट.बलुआकोट बिनियागांव से धारचूला होते तवाघाट करीब तीस कि. मी. दूर पड़ता है. तवाघाट से चीन की सीमा पर स्थित लिपुलेख की सड़क सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही है जिसमें सीमांत के अनेक गाँव जैसे छारछुम, धारचूला देहात, ढूंगातोली, जुम्मा, कालिका, खेत, रांथी, स्याँकुरी आदि पड़ते हैं.वहीँ से गुजरते निकलते आएगा छिपला केदार.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

जारी…

अगली कड़ी : छिपलाकोट अन्तर्यात्रा :उसके इशारे मुझको यहाँ ले आए

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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