गरुड़ बटी छुटि मोटरा, रुकि मोटरा कोशि
अघिला सीटा चान-चकोरा, पछिला सीटा जोशि
(Chakor Bird in Almora Uttarakhand)
कुमाऊं क्षेत्र में यह चांचरी बड़ी लोकप्रिय है. ऐसे ही लाल बंगला फिल्म में मुकेश का गाया एक गीत है – चाँद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर…
कुमाऊं में गोपाल बाबू गोस्वामी और चन्द्रा विष्ट का गाया एक पुराना गीत भी है ओ चना चकोर मेर पटेगे आखिं…
अब कहाँ रहा बालीवुड, कहां रहा कुमाऊनी का पुराना गीत और कहां रही कुमाऊनी की चांचरी. फिर भी तीनों में समानता है और यह समानता है एक पक्षी के कारण है जिसका नाम है चकोर.
लोकगीत और साहित्य में चकोर की पहचान एकतरफा प्रेम करने वाले वियोगी प्रेमी की तो है ही लेकिन उसकी सुन्दरता के चलते सदियों से न जाने कितने नायकों ने अपनी नायिका को चकोर की उपमा दी है.
चकोर जो कि पाकिस्तान का राष्ट्रीय पक्षी है, पश्चिमी हिमालय में खूब देखने को मिलता है. इसे पहाड़ों में तीन-चार से लेकर बीस तक के समूहों में देखा जा सकता है.
पहाड़ी ढालों और घाटियों में अपना घर बनाना पसंद करने वाला यह पक्षी बड़ी तेजी से जमीन पर दौड़ भी सकता है. इसके बच्चे अंडे से निकलने के तीन हफ्तों बाद ही उड़ने लगते हैं.
पहाड़ों से अथाह प्रेम करने वाले इस पक्षी की संख्या पिछले कुछ सालों में अल्मोड़ा, चम्पावत और पिथौरागढ़ जिलों में बड़ी है. पिछले दिनों काफल ट्री के अनन्य सहयोगी जयमित्र सिंह बिष्ट को चकोर का एक जोड़ा अल्मोड़ा की पहाड़ियों पर देखने को मिला.
अल्मोड़ा के पुराने लोगों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में उन्होंने चकोर अल्मोड़ा की पहाड़ियों में नहीं देखा लेकिन पहले उन्होंने यहां खूब चकोर देखे थे. (Chakor Bird in Almora Uttarakhand)
जयमित्र सिंह बिष्ट के कैमरे में कैद सौन्दर्य और विरह प्रेमी के प्रतीक इस पक्षी की शानदार तस्वीरें देखिये :
काफल ट्री के फेसबुक पेज को लाइक करें : Kafal Tree Online
जयमित्र सिंह बिष्ट
अल्मोड़ा के जयमित्र बेहतरीन फोटोग्राफर होने के साथ साथ तमाम तरह की एडवेंचर गतिविधियों में मुब्तिला रहते हैं. उनका प्रतिष्ठान अल्मोड़ा किताबघर शहर के बुद्धिजीवियों का प्रिय अड्डा है. काफल ट्री के अन्तरंग सहयोगी.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…
भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…
उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…
‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…
कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…
बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…