पिछली कड़ी दूसरे दिन प्रातः चाय के पश्चात् शाह जी थ्रीश कपूर और मैं पुनः खाती गांव गये. कुलियों के…
पिछली कड़ी पहली जून 1994 को जब अस्कोट-आराकोट अभियान दल मुनस्यारी पहुंचा, दल के अधिकांश सदस्य मेरे पूर्व परिचित मित्र…
पिछली क़िस्त का लिंक – जोहार घाटी का सफ़र -4 'मामा अब नहीं आएंगे हम ट्रैकिंग में... ! मिलम गांव से…
उत्तराखण्ड की पावन भूमि आदिकाल से ही मानव सभ्यता का गढ रही है. मनीषीयों, विद्वानों, साधु-सन्तों, विचारकों और तपस्वियों की…
मैं चित्रकूट से तब से वाकिफ हूं जब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ती थी. जानते हैं कैसे? दरअसल मेरे पापा…
(पिछली क़िस्त का लिंक - जोहार घाटी का सफ़र -3) हमने नर बहादुर को ढूंढने में खुद के खो जाने…
(पिछली क़िस्त का लिंक - जोहार घाटी का सफ़र - 2) काफी देर बाद यह सहमति बनी कि कैमरे दे…
बहुत दिनों से जिस यात्रा को मैं करना चाह रहा था उसका मुहूर्त सितम्बर 18 के तीसरे सप्ताह में निकल…
(पिछली क़िस्त का लिंक - जोहार घाटी का सफ़र - 1) मुनस्यारी में हमें परमिट को ध्यान से पढ़ने पर…
जोहर घाटी में मिलम गांव भूले नहीं भूलता है. दो बार हो आया जोहार की इन घाटियों में. फिर भी…