फोटो: hindi.indiawaterportal.org से साभार
‘नंदादेवी का सफल आरोहण’ के लेखक पर्वतारोही टी. जी. लांगस्टाफ उत्तराखंड हिमालय से सम्मोहित अभिभूत व रोमांचित रहे. इस सुरम्य अल्पाइन भू भाग के भ्रमण व कई यात्राओं से मुग्ध हो उन्होंने लिखा कि, “एशिया के तमाम पहाड़ी प्रदेशों में गढ़वाल सबसे मनोहारी व सुन्दर है. न तो कराकोरम की बीहड़ प्राकृतिक छटा, न एवरेस्ट पहाड़ की एकाकी विशालता, न हिंदुकुश की नाजुक काकेशियन सुषमा और न हिमालय का कोई दूसरा भू भाग इतना सुन्दर और रमणीक है जितना कि गढ़वाल”. और इस गढ़वाल में सर्वाधिक सम्मोहक हैं यहाँ के बुग्याल. यानी “अल्पाइन मीडोज”.
(Bugyal of Garhwal)
यहाँ हैं अल्प जीवन चक्र वाले छोटे कद के अनगिनत असंख्य फूल रंग बिरंगे… मोहक सुवास वाली एरोमेटिक वनस्पति. लतायें कुंज झाड़ियाँ जो अपने हिस्से के भूगोल से उगती पनपतीं हैं. ‘मामला’ घास के गद्दे, ‘बुग्गी’ घास की प्रधानता और इस धरा के गर्भ में पनपती दुर्लभ जड़ी बूटियां व भेषज. आयुष का प्राकृतिक भंडार. रूद्रवंती, शिवधतूरा, वत्सनाभ या मीठा जहर, पदम्पुष्कर, नीली पौपी, प्रिमरोज, पोंटेटिला, संकुलम, प्रिमुला, विष कंडार, मेरि गोल्ड, ब्रह्मकमल, हेम कमल, फेन कमल के फूल तो डोलू, बीसी, मिट्ठा,सालम मिश्री, सालम पंजा या हतथा जड़ी, उतीस, अतीस, जटामासी, अरक, मिरग,महामेदा,पाषाण भेद, पाषाण फूल, पत्थर लौंग, वन तुलसी, वज्र दंती, सोमलता, रतनजोत, बालछड़, हंसराज,कीड़ा जड़ी जैसे कुछ सामान्य नामों के अलावा चार हजार से अधिक दुर्लभ वनस्पतियां यहाँ हैं. वनस्पति शास्त्रियों ने उनकी पहचान की है. उनका रासायनिक विश्लेषण किया है. उनके गुण और फायदे गिनाये हैं.
गढ़वाल हिमालय में ढाई हजार से पांच हजार मीटर की ऊंचाई में आखिरी वृक्ष रेखा और स्थाई हिमरेखा के मध्य अल्पाइन वनस्पति का इलाका कहलाता है बुग्याल. यहां शीत ऋतु में हिम की चादर फैल जाती है तो गर्मी पड़ते जब यहाँ जमीन की बर्फ पिघलना शुरू होती है तो दिखाई देने लगतीं हैं नाना प्रकार की घास, नई नई कोंपलें मुलायम गद्देदार हरी परत. इस परत के भीतर हैं अनगिनत भेषज, जड़ी बूटियां और इन सब के साथ हैं मादक सम्मोहन से भरे पुष्प, लता, पेड़, फ़्लोरा फोना का अद्भुत संसार. यहां पहाड़ी ढालों के उत्तर में फूलों भरी झाड़ियाँ और मादक खुशबू व सुवास युक्त सगंध वनस्पति है तो दक्षिण में ढालों पर फैले विस्तृत घास के हरे भरे मैदान. इन मैदानों में बुग्गी (ट्रेकेडियन रॉयली) नामक घास ज्यादा है जिससे इन फैले मैदानों को “बुग्याल” कहा गया. गढ़वाली में यह ‘मामला’ घास भी कही जाती है.
गढ़वाल हिमालय में 2500 मीटर में उत्तरकाशी के इलाके मुखेम में 293 हे. तक फैला ‘वेलख’ व 200 हे.का ‘सेम’ इलाका व इसी नाप का गंगनानी में ‘गिडियारा’ बुग्याल है. ‘भुक्खी’ टकनौर में खेड़ा ताल के 150 हेक्टेयर इलाके में बुग्गी घास के मैदान विस्तृत दिखते हैं. गंगोरी में 3000 मीटर की ऊंचाई पर 374 हेक्टर तक विस्तृत ‘केदार गंगा’ में घास के मैदान हैं जहां ब्रह्म कमल के साथ ही कई अन्य भेषज पाई जातीं हैं. फिर ‘दयारा’ बुग्याल (3307 मी.) 410 हैक्टर से अधिक का है जहां जिरेनियम, मैरिगोल्ड, पोंटेसिला, सेक्सीपेग, मार्स, प्रिमुला, जेंटियम व प्राइम रोज के दर्शन होते हैं. भटवाड़ी से दस किलो मीटर आगे रैथल गाँव होते या फिर बारसू गाँव के रस्ते दयारा बुग्याल पहुंचा जाता है. दयारा में विस्तृत घास के मैदान व फूलों की बहार के साथ हरियाली की चादर से ढकी ढलानें हैं.
उत्तरकाशी में ही गवाणा में बकरा टॉप बुग्याल (3000मी.) है और अधिक ऊंचाई(3565 मी.) पर उत्तरकाशी के रवाईं परगने की पंचगाई पट्टी में फतेह पर्वत में 10 कि. मी.से अधिक के इलाके में बंदर पूँछ पर्वत की घाटी तक जाती हर -की -दून है. इस घाटी के मध्य बहती है सूपिन नदी. हर की दून में बुरांश के विविध रंग हैं तो ब्रह्म कमल भी. फिर उत्तरकाशी के मोरी इलाके में 3962 मी. की ऊंचाई से अधिक का केदार कांठा बुग्याल है. तो हिमाचल प्रदेश की सीमा से लगा मांझी वन भी जो 5 कि. मी. से अधिक क्षेत्र में फैला है.उत्तरकाशी में भटवाड़ी से होते यहाँ पहुंचा जाता है तो चकराता होते हुए भी पथ है. फिर इतनी और इससे अधिक ऊंचाई में 10 कि.मी.से ज्यादा इलाके में फैले हैं सुक्खी और धराली के बुग्याल जहां जंगली गुलाब की अनेक किस्में हैं तो अलभ्य विष कंडार और सूर्य कमल जैसी विशिष्ट भेषज, साथ में अन्य जड़ी बूटियां.
(Bugyal of Garhwal)
4500 मी. की ऊंचाई पर 8 कि.मी. के फैलाव को समेटे है जौराई टिहरी का कुश कल्याण बुग्याल जहां रंग बिरंगे व मोहक फूलों के साथ ब्रह्म कमल भी हैं. इसी ऊंचाई पर खतलिंग (4571मी.)जहां अनगिनत फूलों के साथ बुग्गी घास की अप्रतिम छटा छायी रहती है जो 4 कि. मी. से ज्यादा इलाके में अपना परचम लहराती है. इससे नीचे 3291 मी. पर लगभग 25 कि. मी. की सरहद बनाता है पंवाली कांठा जिसके अतुलनीय साम्राज्य में असंख्य वनस्पतियों का खजाना है. इसे माटया बुग्याल के नाम से भी जाना जाता है. इसकी खासियत यह भी है कि यहाँ एक साथ दो बुग्याल अंगवाल डालते हैं. इसलिए इस मिलन स्थली को पंवाली माटया का नाम मिला है.
यह टिहरी में घुत्तू से पंवाली तक है. पंवाली से आगे फिर कई ढलान हैं जिन्हें माट्या बुग्याल (3654मी.) कहते हैं जो शीतकाल की पूरी अवधि व उसके बाद भी बर्फ से ढके रहते है. साहसिक क्रीड़ाओं व स्नो स्कीइंग के लिए यह बेहतर स्थल की प्राथमिकता भी रखते है. पंवाली के पास ही ‘मजेढ़ी राजखर्क’ बुग्याल हरे पिछोड़े की तरह है. वहीं पंवाली के पूरब में ‘ताली बुग्याल’ है. उत्तर में कई हरित पट्टियों से लहरा रही वसुंधरा है तो उत्तर दक्षिण में ‘क्यारी बुग्याल’ जिसकी छवि कुछ अनोखी व निराली है. पश्चिमी उत्तराखंड की ऊंचाइयों पर हिमाच्छादित श्रृंखलाओं का ऐसा हरित श्रृंगार और मादक सम्मोहन और कहीं नहीं.गढ़वाल हिमालय की यह मोहिनी अनूठा वशीकरण रचती है.
मखमली घास चमोली के जोशीमठ में कल्पनाथ घाटी (3000मी.) में चार कि. मी. तक पसरी है तो और ऊंचाई पर ओली, गोरसों (3352 मी.) तथा वान में वेदिनी बुग्याल (3354 मी.) है जहां आते ही वृक्ष रेखा सिमट जाती है और चहुँ ओर फैली ढलान सजीव हो उठती हैं.बीच बीच में मैदान भी पसरे हैं जहां औषधि युक्त फूलों के साथ विविध वनस्पतियां कुछ समय के लिए अपनी छवि दिखाती हैं फिर हिम में विश्राम का लम्बा समय लेती हैं. सबसे अधिक ऊंचाई पर 6 कि. मी. का विस्तार लिए रूपकुण्ड (4876मी.) है जो रहस्य मय भी है तो दुर्गम भी.
(Bugyal of Garhwal)
असीमित विस्तार की दृष्टि से 25 कि. मी. से अधिक का परचम रुद्रप्रयाग में 3000 मी. की ऊंचाई पर लहराता है ‘रूद्र हिवांल’ बुग्याल में तो यहाँ स्थित मदमहेश्वर कम से कम 7 कि. मी. की पट्टी सा फैला है. वहीं 15 कि. मी. से अधिक दूरी तक हिम शिखरों की गोद में बैठी भूँडार घाटी के सम्मोहन का वर्णन तो शब्दों से परे उस भावना में निहित है जिसके लिए 1939 में क्यू बोटनीकल गार्डन की सुकुमारी जान मारग्रेट लेंग वर्षों के अनुसन्धान व प्रकृति के परमानन्द साहचर्य तप की प्रक्रिया में इसी फूलों की घाटी में चिर निद्रा में विलीन हो गईं. यहाँ बने उनके स्मारक में हिमालय के प्रति उनके मोह पाश की अभिव्यक्ति भी अमिट हो गई :
I will lift up mine eyes
Unto the hills,
From whence cometh my help.
अपनी भावनाएं इन्हीं शब्दों में अपने निर्वाण से एक दिन पहले वह अभिव्यक्त कर गईं थी. तब वह यह नहीं जानती थीं कि उनकी डायरी में लिखी ये चंद लाइनें हिमालय की इस श्रृंखला को देखने के लिए शब्द बेधी बाण है. वह चिर शांति के विश्राम से विश्व के लिए ऐसी आशा भरी दृष्टि इन पहाड़ियों की ओर हमेशा के लिए संकेंद्रित कर गईं जहां से अपार सहायता मिलती है.आत्म बोध होता है.तब से फूलों की घाटी और यहाँ के बुग्यालों का आकर्षण निरन्तर बढ़ता ही गया.
(Bugyal of Garhwal)
‘वैली ऑफ़ फ्लावर्स’ किताब 1931 और फिर 1937 की अवधि में संचित अनुभव सिद्ध मूल्यांकन और तीन सौ से अधिक पुष्प प्रजाति के फूलों की खोज बीन का नतीजा थी जिसे ‘एडिनबरा बोटनिकल गार्डन’ के वैज्ञानिक एफ. एस. स्मिथ ने सौ दिन तक इस इलाके में रह लिखा था.
चमोली जिले में 3658 मी. से 3950 मी की उच्च हिमालयी पर्वत पट्टी में जोशीमठ से पूर्व की ओर फूलों की घाटी(3658 मी.) है जो गंधमादन और नंदा देवी के तल पर 15 कि. मी. से अधिक के इलाके में पसरी है यह भयूडार गाँव के नाम से भी जानी जाती है.यहाँ विशिष्ट रूप से फेन कमल, कोपस तीली, जिरेनियम और प्रचुर मात्रा में ब्रह्म कमल के साथ अनगिनत रंगबिरंगे, मोहक, सुगंध सुवास युक्त आकर्षक भेषज हैं. इस सम्पदा के उचित रखरखाव व बनाये बचाये रखने को भारत सरकार ने 6 नवंबर 1982 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, तदन्तर 7 फरवरी,2001 को इसे नंदा देवी बायो स्पेयर संरक्षित वन के अधीन किया जिसका विस्तार 87.5 वर्ग कि. मी. रहा.
बुग्यालों को प्रभावी संवेदनशील सोच विकसित कर बनाये बचाये रखना है. जब से आवाजाही बढ़ी इस दुर्लभ सम्पदा का सबसे बड़ा शत्रु साफ दिखाई देता है. अपने निजी हित व स्वार्थ से दुर्लभ व बेशकीमती जड़ी बूटियों व भेषज का अंधाधुंध दोहन कर कई प्रजातियां समाप्तप्राय कर दी गईं हैं. समूचे इलाके में पाए जाने वाले उच्च शिखरों के पशु पक्षी पोचिंग के घेरे में हैं. इनका संरक्षण करने वालों से कहीं अधिक ताकतवर वह शिकारी और सफेदपोश हैं जिनकी श्रृंखलाएं लोभ और स्वार्थ के वशीभूत हो उस अनमोल सम्पदा का क्षरण करती जा रहीं हैं जिसके गुण गाते पर्यावरण विद थकते नहीं.
जंगलों की आग की तरह सब कुछ विनिष्ट होने की कगार में है. कभी वह पीढ़ी थी जो तुरंत घर के बर्तन उठा डंडे लाठी ले जंगलों की ओर भागती थी. आपदा में एकजुट होती थी. अब बचाव में जन सहभागिता विलुप्त प्राय सी है.आने वाली पौंध भी यही देख रही कि जब वन विभाग आएगा, हेलीकाप्टर से परिक्रमा लगेगी तब सब ठीक हो जाएगा. आगे उन्हें भी बुग्याल जा स्नो स्कीइंग करनी है. डब्बाबंद सामग्री बोतलों में पानी और पॉलिथीन ले जाना है और वहीं हिमनदों में इनके अवशेषों के विसर्जन का कर्मकांड करना है.
(Bugyal of Garhwal)
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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