Featured

वैशाख में बिखौती – विषुवत संक्रांति के दिन विष झाड़ने के जतन

वैशाख आते ही रवि  की फसल, गेहूं की सुनहरी बालियाँ पहाड़ के उपराऊ सीढ़ी दार खेतों से ले कर तलाऊँ के सेरों में पसर जाती है. साग-सब्जी जरूर जाड़ों की वनस्पति थोड़ा सिमटती है. तमाम स्थानीय देवी द्याप्तों को नये अनाज की भेंट चढ़ती है. देवता के भोग के बाद ही इन्हें ग्रहण किये जाने की रीत है. Bikhauti Vishuvat Sankranti

इसके लिए भी दिन-वार, पैट-अपैट देखने का विधान है. नये गेहूं को भली भांति सुखा सूपे से छटक घट में पिसवा लिया जाता है. इस पिश्यू से रोटी बनने के दिन भी त्यौहार की तरह पकवान बनते ही हैं. ज्यादा न सही तो कसार तो भूना ही जाता है. पूरी, हलवा, पुआ, रोट भी बनते हैं.

चैतमाह के मासांत की रात से द्वाराहाट के विमाण्डेश्वर मंदिर में मेले की सुगबुगाहट बढ़ती है. आस-पास के पूरे इलाके से ग्रामवासियों के दल पूरी तैयारी के साथ सज संवर ढोल नगाड़ों की गूँज और धमक के साथ चल पड़ते हैं. छोलिया नर्तकों का समूह नाचता बजाता थिरकता चलता है. विमाण्डेश्वर मंदिर रात भर झोड़ा चांचरी भगनौला की लय ताल गमक से सभी स्थानीय देवी देवताओं को जाग्रत कर देता है.

 वैशाख एक गते को गाँव-गाँव से द्वाराहाट बाजार में कौतुक शुरू हो जाता है. हर गाँव के दल के साथ ढोल नगाड़े का निनाद है. अपना निशान है. उल्लास से झूमते बालगोपाल, सैणी मेंस, चचा ताऊ, आमा जेडजा सब इस ‘बटपूजै’ के मेले में आनंद से भरे हैं. सारे दल ‘ओड़ा’ भेंटते हैं. शाम होते-होते लोकथात – गीतों, नृत्यों की तरंग में चरम तक जा पहुँचने को आकुल व्याकुल हो उठती है. माल भाबर से आए व्यौपारी कपड़ा लत्ता, घरेलू बर्तन भांडे, क्रीम पोडर, बच्चों के खिलोने पीपरी बंसी, खाने-पीने के माल की बिक्री बट्टे में पल की फुर्सत नहीं पाते.

भोजन भजन, रात्रि जागरण के बाद भोर हो उठती है. आज के दिन लगता है स्याल्दे बिखौती का मुख्य मेला जिसमें ‘नौज्यूला आल’ और ‘गरख आल’ दल दिन दोपहर होते,  टोली  बना ढोल दमुए छोलिया निशान के साथ ओड़ा भेंटते हैं. नौज्यूला आल दल में में छः गाँव शामिल हैं : तल्ली मिरई, मल्ली मिरई, बिजेपुर, किरोली, डढोली और बिजेपुर तो दूसरी तरफ गरख आल दल के सात गाँव बेढुली, सिमल  गाँव, सलना, बुंगा, बसेरा, छतगुल्ला और असगोली शामिल हैं. सदियों से चली आई रीत के अनुसार हर दल अपने गाँव के निशान लिए ओड़ा भेंटता है.

वैशाख मास की एक गते जब सूर्य मीन राशि से मेष राशि में आ जाता है तो यही बिखौती है जिसे ‘विषहर’  या ‘विषुवत’ संक्रांति  कहा जाता है. इसे ‘विखुवा’ भी कहा जाता है. बदन में होनेवाले किसी भी विष विकार या प्रकृति के कोप के निवारण के लिए इस पर्व का विशेष मह्त्व है. विष झाड़ने के अनेक जतन किये जाते हैं. जौ की बाली से भी विष झाड़ा जाता है. नान्तिनों की नाभि के  पास तालू गरमा उससे दागा जाता है. यह भी कहा जाता है कि अगर विषुवत संक्रांति के दिन बरखा पड़ जाए तो पेड़ पौंधों का विष नाश हो जाता है. Bikhauti Vishuvat Sankranti

वैशाख शुरू होने के दिन गढ़वाल में फुलवाड़ी या फूल डालने के दिन का समापन होता है. घर आँगन देली में फूल डालने वाली बालिकाओं को भेंट में रुपये पैसे अर्पित करते हैं. पूरी और पापड़ी का भोग लगाते हैं. पापड़ी चावल पीस कर तेल में तल कर बनती है. विषुवत संक्रांति के दिन प्रमुख नदियों व संगम स्थलों में स्नान का विशेष मह्त्व है. श्रीनगर, हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग, कोटेश्वर, टिहरी और उत्तरकाशी में स्नान का अनोखा महा कुंभ होता है.

गढ़वाल के सीमांत जन जाति वाले इलाकों में विषुवत संक्रांति ‘मौण मेले’ के नाम से मनाते हैं. संक्रांत के  आरम्भ से पांच गते तक रवाईं जौनपुर में विषु नाम से उत्सव मनाया  जाता है. पहाड़ी लाल चावलों को पीस कर उनके पापड़ बनाये जाते हैं जिन्हें ‘शाकुली’ कहा जाता है. विषु पर्व के चलते धनुष -बाण चला नृत्य किये जाते हैं.

पूरे देश में चैत माह के अंत में वैशाखी धूमधाम से मनाई जाती है. उत्तर पूर्व भारत में यह ‘विहू’ व ‘विशू’ के रूप में मनाई जाती है. वैशाख शुक्ल पक्ष कि तृतीया ‘अक्षय तृतीया’ कहलाती है. इस दिन सोना खरीदना शुभ  माना जाता है. वहीं वैशाख शुक्ल पक्ष पूर्णिमा बुद्ध पूर्णिमा  मनाई जाती है. Bikhauti Vishuvat Sankranti

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

9 hours ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

10 hours ago

कुमाऊँ की खड़ी होली

इन दिनों उत्तराखंड के कुमाऊँ में होली की धूम है. जगह-जगह खड़ी होली और बैठकी…

6 days ago

आधी सदी से आंदोलनरत उत्तराखंड का सबसे बड़ा गांव

बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी जब देश भर में घूमकर और लिखकर…

2 weeks ago

फूल, तितली और बचपन

बचपन की दुनिया इस असल दुनिया से कई गुना खूबसूरत होती है. शायद इसलिए क्योंकि…

2 weeks ago

पर्वतीय विकास – क्या समस्या संसाधन की नहीं शासन उपेक्षा की रही?

पिछली कड़ी : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन आजादी के दौर…

2 weeks ago