इस साल काफी मेहनत के बाद लौकी व कद्दू की बेल अच्छी हुई है. लौकी में बालमृत्यु दर बहुत ज्यादा है. मैंने किसी तरह की रसायनिक खाद व कीटनाशक दवा का प्रयोग नहीं किया. बड़ी मुश्किल से एक लौकी लगी. जो आज की एक नई भाषा में पूरी तरह से विशुद्ध जैविक लौकी है. लौकी को गांव की मान्य परम्परानुसार भूमिया देवता को आज बुलबुल की ईजा के साथ जाकर तुलसी एकादशी के दिन पूजा अर्चना के बाद अर्पित कर दिया. गांवों में रवि व खरीब की फसल होने के बाद नए अन्न का भोग भूमिया देवता को लगाया जाता है. जहॉ मैं रहता हूँ वह पहले गांव का ही हिस्सा था. पर हल्द्वानी नगर निगम के सीमा विस्तार के बाद गत नवम्बर 2018 में हुए नगर निकाय के चुनाव में हमारा गांव वाला क्षेत्र भी नगर निगम क्षेत्र का हिस्सा हो गया है. यह गांव – बिष्ट धड़ा, बिठौरिया नम्बर – एक, हल्द्वानी कहलाता था. जिसका भूमिया मन्दिर बिष्ट धड़ा में है.
लोक परम्परा में भूमिया को ग्राम देवता माना गया है. जो हमारे फसलों, जानवरों की रक्षा करते हैं. हर साल रबी व खरीब की फसल होने पर नया अन्न सबसे पहले भूमिया देवता को चढ़ाया जाता है. हल्द्वानी के आस-पास के गांवों को शहरीकरण ने लील लिया है. इन ग्राम देवताओं को अब नया अन्न नहीं के बराबर चढ़ता है. अब मन्दिर है तो शहरी लोगों ने अपनी सुविधा के लिए भूमिया के साथ दूसरे देवताओं को भी बसा लिया है. अब भूमिया के थान में हर दिन लोग किसी न किसी देवता को पूजने के लिए पहुँचते रहते हैं. उन देवताओं को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद भूमिया पर भी चढ़ जाता है. इससे भूमिया देवता की भूमिका भी ग्राम देवता से ऊपर समाज देवता की हो गई है.
मेरे बचपन का कुछ हिस्सा गांव – हरिपुर तुलाराम, पोस्ट – अर्जुनपुर ( गोरापड़ाव ) हल्द्वानी में बीता तो कुछ हिस्सा गांव – खनवाल कटान (चोरगलिया) हल्द्वानी बीता. मुझे अब भी याद है कि रवि और खरीब की फसल होने के बाद नैनाग चढ़ाने के लिए परिवार के पुरोहित शुभ मुहुर्त के अनुसार एक दिन तय करते थे. उसी तय दिन पर भूमिया के थान में पूजा-अर्चना की जाती थी. प्रसाद के लिए पन्जीरी बनाई जाती थी. पंडित जी भूमिया की पूजा करते हुए आगामी फसल के भी खूब बढ़िया होने की कामना करते थे. साथ ही घर के पशुओं को भी रोग मुक्त करने व घर में खूब दूध, दही व धिनाली होने का आशीर्वाद भूमिया देवता से मांगते थे. वे यह भी कामना करते थे कि जजमान के घर से कोई भी कभी भूखा न जाय और न जजमान के परिवार को कभी भूखा सोना पड़े. हम लोग बड़ी बेसब्री से पूजा खत्म होने का इन्तजार करते थे ताकि मीठी व स्वादिष्ट पन्जीरी खाने को मिले.
जब तक नए अन्न का नैनाग भूमिया देवता को नहीं चढ़ाया जाता था, तब तक नए अनाज का उपयोग घर में भोजन के रुप में नहीं किया जाता था. कभी कोई मांगने वाला आ गया तो उसे नया अनाज यह कह कर नहीं दिया जाता था कि अभी नैनाग नहीं चढ़ाया है. शहर में रहने वाले नाते-रिश्तेदारों के यहां भी नैनाग चढ़ाने के बाद ही नया अनाज पहुँचाया जाता था. उत्तराखण्ड में आमतौर पर दो तरह के देवताओं का लोकमानस में प्रभाव है. एक हैं जन प्रचलित देवता. जैसे राम, कृष्ण, शिव, हनुमान, गौरा, सीता व राधा आदि. दूसरे हैं लोक प्रचलित देवता. जो यहां के लोकजीवन में अंचल विशेष के आधार पर बदलते रहते हैं. इनमें हैं कलबिष्ट, गंगनाथ, हरज्यू, सैम, ग्वल्ल, गढ़देवी, परि, चॉमू, नन्दा देवी, भूमिया, ऐड़ी, भैंरों, भोलनाथ, ग्वेल , झालीमाली, ज्वालपा देवी, राज राजेश्वरी आदि. जनप्रचलित देवताओं की अपेक्षा यहॉ के लोकजीवन में स्थानीय लोक प्रचलित देवताओं का प्रभाव ज्यादा है.
शहरीकरण ने हमारी जीवन शैली ही नहीं बल्कि हमारे लोक व ग्राम देवताओं पर भी संकट खड़ा कर दिया है. लोक ही नहीं होगा तो आदमी का अस्तित्व रहेगा क्या? भाबर के हर गांव में भूमिया देवता के मन्दिर हैं. जो बहुत आलीशान व संगमरमर के बने हुए नहीं, बल्कि साधारण व सामान्य तरीके से हल्दू, पीपल, बड़ आदि जैसे विशाल प्रजाति के पड़ों की शीतल छाया में उसकी जड़ में बने हुए हैं. जिस भी काश्तकार के खेत में भूमिया का थान है या होता था, वह उसके आसपास काफी जमीन भूमिया के थान को एक तरह से अर्पित कर देता था. पर जब से गांवों में शहरीकरण की होड़ तेज हुई है, तब से भूमिया के थान की जगहें भी तेजी के साथ सिकुड़ती जा रही हैं, क्योंकि जिस जगह पर भूमिया के थान हैं, उनके लिए अपने खेतों की काफी जगह खाली रखने वाली पीढ़ी अब इस दुनिया में नहीं है.
उनकी दूसरी व तीसरी पीढ़ी ने भी ग्राम देवता भूमिया का पूरा सम्मान किया और उनकी जगह के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की. पर जो अब की पीढ़ी है, उसने बढ़ते शहरीकरण में अपने दो-तीन पुरानी पीढ़ी की जमीन पर फीता लगाना शुरु कर दिया है. जमीन पर लगाया जा रहा फीता एक-एक फुट की कीमत हजारों में दे रहा है. फुट के तौर पर जमीन पर बिछ रहे नोटों के कारण नई पीढ़ी ने भूमिया की जगह को भी कम कर दिया है. ऐसा नहीं है कि उसकी आस्था लोक देवता भूमिया में नहीं रही. पर इस पीढ़ी को लगता है कि जब खेती की जमीन ही नहीं रही या वह लगातार कम हो रही हो तो ऐसे में भूमिया के थान के लिए भी बहुत जगह रखने का क्या तुक है?
शहरीकरण ने भूमिया के थान व दूसरी जगहों पर लगे ऐसे विशाल पेड़ों को भी धीरे-धीरे उजाड़ दिया है. भावर में पहले पाखड़, पीपल, हल्दू, बड़ आदि के हजारों पेड़ थे. जो पर्यावरण के लिए भी लाभदायक थे. विभिन्न प्रकार की चिड़ियों के भी ये रैनबसेरे होते थे. खेतों में जब से सीमेंन्ट कंक्रीट की फसल बोई जाने लगी है, तब से इन पेड़ों पर बेदर्दी से आरिया चलाई जा रही हैं. वन महकमा इन विशाल पेड़ों को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा है. इस तरह के सैकड़ों पेड़ आज भी भावर में हैं, जिन्हें समय रहते बचाए जाने की आवश्यकता है. वन विभाग व पर्यावरण प्रेमी इस सम्बन्ध में कारगर पहल करेंगे?
जगमोहन रौतेला
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जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं.
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