फोटो: फेसबुक पेज भीमताल से
उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मंडल के नैनीताल जिले के सुंदर तालाबों में से एक है भीमताल. काठगोदाम से इसकी दूरी 24 किमी है. 5000 फीट लम्बे और 1500 फीट चौड़े इस तलब की गहराई 15 मीटर तक बताई जाती है.
भीमताल का पौराणिक नाम भीमह्नद व भीमेश्वर महादेव बताया गया है. स्कन्द पुराण के मानस खण्ड में सप्तसरोवरों— नैनीताल, भीमताल, नौकुचियाताल, रामताल, सीताताल के उल्लेख के साथ भीमेश्वर महादेव की उत्पत्ति का भी वर्णन है.
पौराणिक कथा है कि एक बार भीम रानीबाग से चित्रशिला के दर्शन कर हिमालय के ओर जा रहे थे तो उन्हें आकाशवाणी हुई कि वे इस इलाके में शिव मंदिर की स्थापना करें. भीमताल को इस कार्य के लिए उपयुक्त मां भीम ने वहां पर शिव मंदिर की स्थापना की. उन्होंने अपनी गदा से करीब की पहाड़ी पर प्रहार किया और उसमें गंगा प्रवाहित करके इस सरोवर का निर्माण किया. उन्होंने यहाँ शिवलिंग की स्थापना की और इस जल से उसका अभिषेक किया. पुराणों में यहाँ स्नान करना गंगास्नान जैसा ही पवित्र बताया गया है.
मानसखण्ड के अनुसार भीमताल में शिव मंदिर की स्थापना 12वीं-13वीं शताब्दी में हो गयी थी. हिमालयन गजेटियर में अटकिन्सन आधुनिक मंदिर को सत्रहवीं शताब्दी में राजा बाज बहादुरचन्द द्वारा बनवाया गया बताते हैं. जानकारों का यह भी कहना है कि यह मंदिर हजारों साल पुराना है लेकिन बाज बहादुर ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था.
1743 -44 में रुहेलों ने इस मंदिर को क्षतिग्रस्त किया और शिवलिंग को भी खंडित कर दिया. इस शिवलिंग को बाद में ताम्बे का खोल चढ़ाकर दुरस्त किया गया है.
1824 में बिशप रेगिनाल्ड हैवर रुद्रपुर से भीमताल के रास्ते अल्मोड़ा गए. इस यात्रा का वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि तब यहाँ तटबंध न होने की वजह से तालाब में ज्यादा पानी नहीं था. झील के आसपास कंपनी के गार्डरूम, गोदाम तथा एक टूटी हुई झोपड़ी के अलावा कोई भवन नहीं था.
भीमताल की झील और आसपास के कस्बे को विकसित करने का काम अंग्रेजों द्वारा किया गया. उन्होंने यहाँ डाठ (तटबंध) बनाकर तालाब का आकार बढ़ाया. इस पूरे क्षेत्र में बंगले बनवाए. इस तरह यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनने लगा.
आज भीमताल उत्तराखंड के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में है. यहाँ श्रावण के महीने में हरेले का मेला लगा करता है. कभी स्थानीय व्यापार और कला, संस्कृति के सम्मिलन के लिए जाना जाने वाला यह मेला अब आधुनिकता की भेंट चढ़ चुका है.
(उत्तराखण्ड ज्ञानकोष, प्रो. डी. डी. शर्मा के आधार पर)
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