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उत्तराखंड के हर घर में बनने वाली भांग की चटनी

भांग शब्द सुनते ही अधिकांश लोगों के दिमाग में नशे जैसा कुछ आता हो या जै-जै शिव-शंकर की धुन बजती हो लेकिन अगर आप उत्तराखंड से हैं तो भांग से सबसे पहले आपको भांग की चटनी याद आयेगी. फिर आलू के गुटके, मडुवे की रोटी, गहत के पराठे, गडेरी की सब्जी और न जाने कौन-कौन से पहाड़ी व्यंजन आपकी यादों में सुगंध फैलाने लगेंगे.

दुनिया जाने या न जाने उत्तराखंड का बच्चा-बच्चा जानता है भांग सिर्फ नशे के लिये ही नहीं होता है. इसके बीजों की चटनी बनती है जो दुनिया की सबसे स्वादिष्ट चटनियों में शामिल है.

भांग के पौधे के बीज भांग के फल की तरह नशा पैदा करने वाले नहीं होते हैं बल्कि ये सेहत के लिए बेहद लाभकारी होते हैं. भांग के बीजों में प्रोटीन, फाइबर, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड होता है इसलिए इसका सेवन करना त्वचा और बालों की सुंदरता के लिए बेहद लाभकारी होता है. भांग के बीजों में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स त्वचा, दिल और जोड़ों के लिए फायदेमंद होते हैं.

भांग के बीजों में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है. 30 ग्राम भांग के बीजों में लगभग 9.46 ग्राम प्रोटीन होता है जो कि मसल्स के निर्माण में मददगार होते हैं. इसके बीजों में पर्याप्त मात्रा में फाइबर होता है. इसका सेवन करने से पेट भरा रहता है और बार-बार भूख नहीं लगती है.

भांग के बीजों में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है साथ ही इसमें आर्जिनिन और अमीनो एसिड भी होता है इसलिए इसका सेवन करना दिल के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है. भांग के बीजों में एंटी-इंफ्लेमेंट्री गुण होते हैं इसलिए इसका सेवन करने से सूजन कम होती है और मुंहासों को दूर करने में मदद मिलती है.

भांग की चटनी बनाने के लिये सबसे पहले भांग के बीजों को तवे या लोहे की कड़ाही में हल्की आंच में भुना जाता है. भांग भुन जाने के लिये पहले तवा या कड़ाही को गर्म किया जाता है. भूनते समय बीजों को लगातार हिलाया जाना चाहिये अन्यथा वे जल जाते हैं और उनका स्वाद कड़वा हो जाता है. जब इनका रंग हल्का भूरा हो जाये तो चूल्हे से उतार लेना चाहिये.

मिक्सी आने के बाद से भांग की चटनी इसी में पीसी जाने लगी है लेकिन असल स्वाद सिलबट्टे में पीसने से ही आता है. पहाड़ी व्यंजनों के अधिकांश मसाले इसी सिलबट्टे पर ही पीसे जाते हैं.

पुदीने के कटे हुए पत्तों का उपयोग भांग की चटनी में खुशबू के लिये किया जाता है. इसके साथ ही इसमें कटी हुई हरी मिर्च भी पीसी जाती है. इसको पीसते समय ही इसमें नमक और मिर्च मिला दिया जाता है. हल्का दरदरा होने के बाद इसमें दो से चार चम्मच पानी डाला जाता है. सिलबट्टे में पीसने में इसमें ज्यादा समय और मेहनत लगती है लेकिन यह चटनी मिक्सी में पीसे भांग से ज्यादा स्वादिष्ट होती है.

चटनी को खट्टा बनाने के लिये कुछ लोग पहाड़ी नींबू (चूक) के रस का प्रयोग करते हैं लेकिन उत्तराखंड में इसके लिये काले चूक का प्रयोग करते हैं. काला चूक दाड़िम या पहाड़ी नीबू को पका कर बनाया जाता है. काले चूक की दो-चार बूंद ही कटोरे भर भांग की चटनी को खट्टा बनने के लिये काफ़ी हैं.

भांग की चटनी को दाल-भात, आलू के गुटके, मडुवे की रोटी आदि के साथ खाया जा सकता है. भांग की चटनी का उपयोग सलाद में मूली के साथ मिलाकर भी किया जाता है. गर्म तासीर वाली यह भांग की चटनी उत्तराखंड के सभी घरों में बनती है फिर चाहे वह गढ़वाल हो या कुमाऊँ.

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Girish Lohani

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