प्रो. मृगेश पाण्डे

तिजोरी से कम राज नहीं हैं आमा के भकार में

पहाड़ों में ज्यादा मात्रा में अनाज को भकार में रखा जाता. तुन, चीड़ और देवदार के तख्तों या पटलों से भकार बनाये जाते. इसमें कई खाने बना दिये जाते और हर खाने में अनाज की अलग-अलग किस्म रख कर लकड़ी के बने ढक्कन से बंद कर देते. Bhakar Traditional Storage Box in Uttarakhand

लकड़ी को सफेदा, बिरोजा, तारपीन के तेल के बने पेंट से पोत दिया जाता. लकड़ी को सुरक्षित रखने के लिए चीड़ के लीसे में तेल मिला कर भी पोता जाता.

छह तख्तों या पटेलों से बना भकार छः पटेलिया भकार कहा जाता. इसके  बीचों-बीच तख्ते की बाड़ लगा एक ओर अनाज तो दूसरी ओर दन्याली – दूध , दही, घी रख देते. इसे धड्याव या ढढयाओ कहते.

खास बात यह कि इसे लकड़ी की बनी कीलों से ही ठोका जाता. लोहे का कोई सामान उपयोग में नहीं लाते. अनाज को सुरक्षित रखने के लिए गोबर के कंडो जिन्हें गुपटोल कहते हैं, की राख भी डाल दी जाती. 

थारू और बोक्सा जनजाति द्वारा अनाज रखने के लिए बांस निंगाल से कुट्टे बनाये जाते जो गोबर मिट्टी से लीपे जाते. दालों पर सरसों का तेल चुपड़ दिया जाता जिससे उनमें छेद करने वाले कीड़े न घुस पाएं. थोडा बहुत अन्न, दाल, मिर्च -मसाले मिट्टी गोबर से लीपे हुए काठ-लकड़ी के बक्सों में रखे जाते. संदूक, पिटार या पिटारी कहे जाते.

ऐसे ही बड़ी कंडी को डवक और डोकको कहा जाता. जानवरों के लिए सूखे पत्ते जमा करने की काफ़ी बड़ी कंडी पतेलिया डवक कहलाती. 

गगरी व फॉँण्लै जो पीतल तथा ताँबे से बने होते, जब पिचक जाने टूट जाने पर पानी सारने के काम में नहीं आते तब इनका उपयोग भी चीज-बस्त रखने में किया जाता. भरने के बाद इनका मुंह भी पत्थर या लकड़ी के फट्टे  से ढाप दिया जाता. फटे पुराने कपड़ों या लुनतूरों का बूजा भी लगा दिया जाता. कनस्तर, कंटर भी ढक्कन बना कर काम में लाये जाते. Bhakar Traditional Storage Box in Uttarakhand

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

View Comments

  • कहां गया गुरूजी वो दौर अब? बस थोड़ी मेहनत और टाइम ही तो मांगता था। और इन डोकों, भकारों को बनाने में एक मजा भी तो आता ही होगा। वाह, रेडियो सुनते सुनते करते रहो अपना काम।
    और अब? अब तो धरती को विष से भर देने वाले प्लास्टिक के भांडे, बर्तन आ गए हैं जिनको नदी, नालों, गधेरों में यदि सालों तक पड़े रहने दिया जाए तो धरती पानी सब विषैला हो जाने वाला हुआ।

Recent Posts

उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी

पिछली कड़ी : एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता हिमालय को जानने समझने व…

2 weeks ago

एक ‘युवा’ एथलीट जिनकी उम्र 92 वर्ष है!

आम तौर पर एक उम्र के बाद व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त, बेबस…

2 weeks ago

रिंगाल: पहाड़ की बुनावट में छिपा रोजगार और जीवन

पहाड़ों में जीवन हमेशा प्रकृति के साथ जुड़कर चला है. यहाँ जंगल सिर्फ पेड़ों का…

2 weeks ago

हिमालय के गुमनाम नायक की कहानी

इस तस्वीर में आपको दिख रहे हैं "पंडित नैन सिंह रावत" — 19वीं सदी के उन महान…

1 month ago

भारतीय परम्परा और धरती मां

हमारी भारतीय परंपरा में धरती को हमेशा से ही मां कह कर पुकारा गया है. ‘माता…

1 month ago

एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता

तत्कालीन नार्थ वेस्टर्न प्रोविनेंस यानी उत्तर प्रदेश के जिस ब्रिटिश अधिकारी ने उन्नीसवीं शताब्दी के…

1 month ago