समाज

दो बेतालों के बेटे-बेटियों की रहस्यमयी शादी का किस्सा

आज से कोई 40-45 साल पहले एक रहस्यमय घटना अखबारों की भी सुर्खियां बनी थी कि बेतालघाट के बेताल नकुवा बूबू के बेटे की शादी काकड़ीघाट के बेताल की बेटी से होनी है. तब स्थानीय लोंगो के बीच यह काफी चर्चा का विषय बना था. क्या थी, वह घटना इसे जानने से पहले काकड़ीघाट व बेतालघाट के बारे में संक्षिप्त जानकारी होना जरूरी है.
(Betalghat Uttarakhand History & General Information)

हल्द्वानी-अल्मोड़ा राजमार्ग पर हल्द्वानी से 66 किमी की दूरी पर स्थित काकड़ीघाट नामक स्थान एक नहीं, कई कारणों से चर्चा में रहा है. काकड़ीघाट में प्राचीन शिवमन्दिर के साथ भैरव देवता का मन्दिर भी है, जो पौराणिक कौशिकी (वर्तमान नाम कोसी) नदी के बायें तट पर स्थित है. भैरव देवता को शापित होकर बेताल के नाम से पृथ्वीलोक में आना पड़ा , इस पौराणिक आख्यान की विस्तृत चर्चा बाद में. पहले काकड़ीघाट के चर्चा में आने के कुछ अन्य कारणों को जानें. यह स्थान आध्यात्मिक गुरू स्वामी विवेकानन्द की उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना का साक्षी रहा है.

कहते हैं कि अगस्त 1890 में स्वामी विवेकानन्द जब बैल्लूर मठ से उत्तराखण्ड की या़त्रा के लिए अपने शिष्य अखण्डानन्द के साथ निकले थे , तो  उन्होंने अपनी यात्रा मंे काकड़ीघाट में कौशिकी व सुयाल नदी के संगम पर अपना रात्रि पड़ाव डाला. दूसरे दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर वे पास के पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान में बैठ गये और उन्हें यहॉ पर असीम शान्ति व आनन्द का अनुभव हुआ. लगभग एक घण्टे बाद जब ध्यान टूटा तो अपने शिष्य अखण्डानन्द से बोले आज मेरी एक बड़ी समस्या का समाधान हो गया, मुझे समष्टि और व्यष्टि का ज्ञान हो गया है कि अणुब्रह्माण्ड और विश्व ब्रह्माण्ड एक ही नियम से संचालित हैं. इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द के ज्ञान प्राप्ति के स्थल के रूप में इसे ख्याति मिली. स्वामी विवेकानन्द जैसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के महापुरूष से जुड़े इस स्थान को जो अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिलनी चाहिये थी, सच तो ये है कि इसे वह मिली नहीं. काकड़ीघाट, उत्तराखण्ड के सिद्धसन्त सोमवारी बाबा की तपस्थली भी रहा , जहॉ मॉ अन्नपूर्णा का महिला वेश में सोमवारी बाबा के आश्रम में आने का भी एक रोचक प्रसंग है.  

सन् साठ के दशक में विश्वविख्यात सन्त बाबा नींब करौरी ने इसी कौशिकी नदी के तट पर काकडी़घाट में हनुमान मन्दिर का निर्माण कराया और बाबा नींब करौरी के जीवन पर्यन्त, जब भी वे काकड़ीघाट आश्रम में ठहरते तो श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता और हर समय भण्डारा चला करता. यदि इससे  और पीछे जायें तो पुराने समय में  जब अल्मोड़ा के लिए वर्तमान मोटर मार्ग का निर्माण नहीं हुआ था, तो यहीं से कर्णप्रयाग होते हुए बद्रीनाथ जाने का पैदल मार्ग हुआ करता. आज भी काकड़ीघाट पुल के पास काकड़ीघाट-कर्णप्रयाग मार्ग का बोर्ड इसकी गवाही देता है. जाहिर है कि उस समय अधिकांश पैदल तीर्थयात्री काकड़ीघाट में ही रात्रि पड़़ाव डाला करते होंगे , इसीलिए दानवीर जसुलीदेवी ( जसुली शौक्याणी) ने उत्तराखण्ड अन्य स्थानों के साथ ही यहॉ भी धर्मशाला का निर्माण कराया, जो आज भी यहॉ पर मौजूद है.

अब बात करें बेतालघाट की. बेतालघाट के बेताल नकुवा बूबू के नाम से जाने जाते हैं.  प्रत्येक क्षेत्र के एक क्षेत्रदेवता अथवा क्षेत्रपाल  होते हैं, बेतालघाट के नकुवा बूबू भी यहां क्षेत्रपाल के रूप में  पूजनीय हैं तथा भगवान शिव के गणों के मुखिया माने जाते हैं. इसके पीछे शिवमहापुराण के अन्तर्गत रूद्रसंहिता में नकुवा बूबू को मॉ पार्वती द्वारा शापित बताया गया है. पौराणिक आख्यान के अनुसार जब नारद पृथ्वी लोक का भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि  भूत-पिशाच तथा आसुरी शक्तियां मृत्युलोक के वासियों को आतंकित व त्रस्त कर रही हैं , उन्होंने इन आसुरी शक्तियों से मृत्युलोक के लोगों की रक्षा हेतु भगवान शिव की शरण ली और उनसे  मृत्युलोक के लोगों की इन नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना की. भगवान शिव ने नारद की बात सुनकर एक लीला रची और कुछ दिनों के लिए मॉ पार्वती के साथ अज्ञातवास में जाने का निर्णय लिया तथा अपने प्रमुख गण भैरव को द्वारपाल बनाकर हुक्म दिया कि अज्ञातवास के दौरान कोई भी उनके पास न आने दिया जाय, चाहे वे ब्रह्मा अथवा विष्णु ही क्यों न हों. द्वारपाल ने भी बड़ी निष्ठा से अपने कर्तव्य का पालन किया.
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जब अज्ञातवास की अवधि पूरी हुई तो मॉ पार्वती को देखकर उनके मन में बुरे विचार आने लगे और द्वारपाल भैरव ने मॉ पार्वती का हाथ पकड़ लिया. इस पर मॉ पार्वती ने कुपित होकर द्वारपाल भैरव को श्राप दे दिया कि तू अब मृत्युलोक में बेताल बनकर रहेगा. द्वारपाल भैरव इस शाप व्यथित हो गये और इस शाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या करने लगे. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कहा कि मैं पार्वती के शाप से तुम्हें मुक्ति तो नहीं दिला सकता, लेकिन मैं तुम्हें वरदान देता हॅू कि मृत्युलोक में जहॉ-जहॉ मेरी पूजा होगी वहॉ तुम मेरे साथ ही  भैरव देवता के रूप में पूजे जाओगे. कहते हैं कि भैरव देवता ने सर्वप्रथम कौशिकी नदी के किनारे अपने आराध्य भगवान शिव की बेतालेश्वर के रूप में स्थापना की और भैरवदेवता को स्थानीय लोगों द्वारा नकुवा बूबू नाम दिया गया। नकुवा संभवतः नेकुवा से बना है, जो क्षेत्र के लोगों की आसुरी शक्तियों से रक्षा का नेक कार्य करते थे, नेक से नेकुवा और फिर नकुवा हो गया और बूबू कुमाउनी में दादा के लिए बोला जाता है. मान्यता है कि नकुवा बूबू आज भी अपने आराध्य भगवान शिव की पूजा के साथ-साथ क्षेत्रपाल के रूप में स्थानीय लोगों की रक्षा करते हैं. माना जाता है कि इसके बाद शेष 107 जगहों ( बेतालेश्वर सहित कुल 108) पर बेताल के आराध्य के मन्दिरों का निर्माण कराया गया, वे सभी स्थान जिनके अन्त में घाट लगता है, बेतालेश्वर से संबंधित माने जाते हैं.

सन् 1980 का दशक इन दो बेतालों के पुत्र व पुत्रियों की शादी का गवाह रहा. तब अखबारों की सुर्खियों में ये खबर प्रकाशित हुई कि अमुक तिथि को बेतालघाट के नकुवा बेताल के बेटे की शादी काकड़ीघाट के बेताल की बेटी से होनी तय हुई है. बताया गया कि नकुवा बेताल के बेटे की बारात अमुक तिथि को काकड़ीघाट के बेताल की बेटी से शादी रचाने प्रस्थान करेगी. तब आमजनता में हर घर , हर दुकान व नुक्कड़ें पर यह कौतूहल व प्रमुख चर्चा का विषय बना था. लोग कहते थे कि नकुवा बेताल दिन में आम आदमी के वेश में लोगों के बीच रहता और कुछ चुनिन्दा लोगों को इस शादी में आने का न्यौता भी देता. ये चुनिन्दा लोग या तो जगरिये होते या डंगरिये अथवा जिनके शरीर में देवता का अवतरण होता.

शादी की नियत तारीख से एक दो माह पहले से लोगों में यह चर्चा का विषय होता कि आज अमुक डंगरिये या जगरिये को भी बेताल का न्यौता आ गया है. यह सिलसिला लगभग एक माह तक चलता रहा. लोग बाकायदा उन डंगरियों व जगरियों से इसकी पुष्टि करते और डंगरिये अथवा जगरिये इसे स्वीकार भी करते और जिन जगरियों व डंगरियों को न्यौता नहीं पहुँचा होता वे इन्तजार करते. अब ये पता नहीं कि उन्होंने भौतिक रूप से बेताल की शादी में शिरकत की अथवा वर्चुवल तौर पर. लेकिन किसी प्रत्यक्षदर्शी ने इस शादी का ऑखों देखा हाल बयां नहीं किया. लेकिन आज की वैज्ञानिक सोच की दुनियां में यह अभूतपूर्व शादी आजतक रहस्य ही बनी रही.
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– भुवन चन्द्र पन्त

भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.

इसे भी पढ़ें: पहाड़ी लोकजीवन को जानने-समझने की बेहतरीन पुस्तक: मेरी यादों का पहाड़

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