फोटो: अमित श्रीवास्तव
समय की सबसे बड़ी समस्या है अविश्वास ! नहीं नहीं मैं कहूँगा गोल डिस्प्लेसमेंट! अं…ऊँ… खैर छोड़ो ! (Belief in the Time of Disbelief)
देखो तो! उत्पादकता बढ़ाने के लिए कर्मचारियों को बायो मेट्रिक मशीन से गुज़रना होता है अब. हैं?? बायो मेट्रिक? उत्पादकता? उपस्थिति लिखा होगा ठीक से देखो ! नहीं? बाबूजी समय से आकर कार्यालय में सोएं ये सुनिश्चित करना है? कौन बताए कि कार्यालय में होना और होकर काम भी करना कर्मियों के आचरण के दो अलग-अलग प्रस्थान बिंदु हैं. दोनों के अलग ग्राफ बनाए जा सकते हैं. उपस्थिति से उत्पादकता का रिश्ता साढ़ू भाइयों टाइप होता है. होते दोनों अलग प्रजाति के हैं लेकिन कहलाते भाई हैं. अविश्वास?… अं गोल डिस्प्लेसमेंट?… अं… (Belief in the Time of Disbelief)
उधर देखो! सीसी टी वी परफॉर्मेंस अप्रेजल का माध्यम हुआ जा रहा है. इसका मुंह अंदर की तरफ हो गया है. अपने विक्रम पर सवार है ये बेताल. शोल्डर सर्फिंग यू नो. इतनी खोहों कन्दराओं में इसकी घुसपैठ हो चुकी है कि अगर सांप के बिल में हाथ दो तो केंचुल की जगह ए वी वायर निकलता है. अविश्वास?… अं गोल डिस्प्लेसमेंट?… अं…
लड़कियों की सुरक्षा के लिए स्कवाड बनाना पड़ता है अब. क़ानून का नून निकल गया है उसी तरह जैसे हमारी आँख का पानी. हर धरना, हर मीटिंग, हर लीफलेट, हर बैनर से चिपककर एक टोल फ्री नम्बर निकलता है. हर संघर्ष का हासिल है ये टोल फ्री नम्बर. क्या कहा? इसके बावजूद काम नहीं हुआ?अरे भाई आपकी कॉल के पैसे तो बच गए. टोल फ्री है भईया टालमटोल फ्री नहीं. अविश्वास?… अं गोल डिस्प्लेसमेंट?… अं…
पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अलग से क़ानून माँगा जा रहा है डॉक्टर के लिए अलग. मांग इतनी बढ़ने वाली है कि क़ानून की सुरक्षा का क़ानून बनने वाला है. अविश्वास?… अं गोल डिस्प्लेसमेंट?… अं…
क़ानून से लंगड़ी फंसाए खाप-कंट्रोल नए फंकी लुक में ट्रोल बन गया है. सिर्फ पुलिस थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करती है तफ्तीश में? नहीं साहब ! बहुत सी थर्ड डिग्रियां टहल रही हैं मार्केट में आपको दिखती नहीं. नकल रोकने के लिए वस्त्र और अंतः वस्त्र तक जांच लिया जा रहा है. पढ़ाई नहीं नकल रोकना धर्म हो गया है. और धर्म क्या हुआ है? मेरा वाला क्रीम!! अविश्वास?… अं गोल डिस्प्लेसमेंट?… अं…
औचक निरीक्षण और छापामार युग है ये ! चौचक चेहरे और चुक गए चरित्र वाला. सालों बाद जब इस समय के इतिहास को कुरेदा जाएगा तो भस्माक्षरों में लिखा मिलेगा कि जो तुम पढ़ रहे हो वो लिखा ही नहीं है.
अविश्वास?… अं गोल डिस्प्लेसमेंट?… अं…
जिसने कोई जुर्म नहीं किया उसे अपने ऊपर अविश्वास करना चाहिए ! अब उसे अपनी ज़ुबान नहीं गर्दन बचानी चाहिए!! बिकॉज़…
बर्डन ऑफ़ प्रूफ इज़ ऑन यू माई डियर सिटीजन एंड बिलीव मी यू आर नाउ अनप्रोटेक्टेड अगेंस्ट सेल्फ इनक्रिमिनेशन
अमित श्रीवास्तव. उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता) और पहला दखल (संस्मरण) .
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आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों…
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बहुत खूब।
Amazing piece of writing! जोशी जी के ख़लीक मियां याद आ गए अचानक !