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बार-बार अपनी जड़ों की ओर क्यों उगते हैं बंबई के डेढ़ यार

अल्मोड़ा से बम्बई चले डेढ़ यार – तीसरी क़िस्त

कठोपनिषद की तीसरी वल्ली (अध्याय) का पहला मंत्र है:

ऊर्ध्व्मूलोSवक्शाख एशोSश्वत्थः सनातनः !
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते !
तस्मिंल्लोकाःश्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन!!
एतद्वै तत् !!1!!

इसका अर्थ है:

यह पीपल का वृक्ष ऊपर की ओर जड़ों वाला और नीचे की ओर शाखा वाला है. इसका मूल ही विशुद्ध तत्व है और वही अमृत कहलाता है. सारे लोक उसी के आश्रित हैं; कोई भी उसको लाँघ नहीं सकता… यह वही है जिसके बारे में तुमने जिज्ञासा व्यक्त की है!

ऐसा कतई नहीं है कि अल्मोड़ा नाम्नी प्राचीन नगरी से महानगरी बम्बई की ओर पलायन किये हुए ये डेढ़ पहाड़ी-यार अपने पुरखे ऋषियों की तरह ब्रह्म-जिज्ञासु हो गए थे और बोरीवली से बोरीबंदर तक अपने महाप्रभु कैलाश को तलाशने के लिए सागर-तट पर आए हों!… डेढ़ यार पहाड़ियों की ऐसी हिम्मत कहाँ! महानगरी के कोलाहल में तो ये लोग वैसे ही भभरी गए थे!

जरा हाल सुनिए ‘बोरीवली से बोरीबंदर तक’ के नायक वीरेन उर्फ़ शैलेश मटियानी की दिन-दोपहरी में भूखे पेट दादर टेसन पर खाने की तलाश में भटकते दर्दभरी दास्ताँ :…

“दादर स्टेशन से बाहर निकल जाने के बाद वीरेन ने भूखे पेट पर चिपकी हुई कमीज को सहलाया, फिर सामने शिवाजी हिन्दू विश्रांति गृह की ओर मुड़ गया.
‘काय पाहिजे?’ छोकरे ने कान में खोंसी हुई पेन्सिल को हाथ में लेकर घुमाते हुए पूछा – ‘काय आण, साहिब?’

‘मैं तुम्हारी बात कुछ समझा नहीं, भाई’ कहते-कहते वीरेन ने अपनी दृष्टि सामने टंगे मेन्यु पर डाली, उसके पढ़ने के साथ-साथ छोकरा बोलता गया – ‘पुरी-भाजी, पुरी पातळभाजी, सादा डोसा, मसाला डोसा, उपमा, उत्तप्पा, मिक्स भजीया, बटाटा, पोहा-सीरा’…

‘एक कप चाय ले आओ,’ अन्यमनस्क-सा वीरेन बोला – ‘यह सीरा क्या होता है?’

उत्तर की जगह छोकरे ने चाय के कप के साथ, एक प्लेट सीरा भी रख दिया.

‘अणखी काय, साहिब?’

‘साहिब कहते हो तुम?’ वीरेन ध्यान टूटते ही टूटे स्वर में बोला, इतना तो समझा, क्योंकि होटलों के छोकरे हर किसी ग्राहक को सा’ब कहते हैं चाहे वह दरिद्र ही क्यों न हो!… बाकी तुम यह ‘अणखी’. ‘पाहिजे’, ‘काय’ क्या कहते हो, मुझे…’

‘क्या करेगा, साहिब’, छोकरा हँसकर बोला, ‘हम तो मद्रासी हैं, पर इदर ज्यास्ती ग्राहीक मराठी आता; हम ज्यास्ती करके मराठी में ही आर्डर लेता-देता.’
‘तो,’ वीरेन ने पूछा, ‘पहले तुमने मुझसे मराठी में पूछा था? क्या पूछा था?’

‘काय पाहिजे’ का मतलब ‘आपको क्या होना’ होता साहिब,’ छोकरे ने उत्तर दिया. ‘और ‘अणखी काय’ का मतलब ‘आपको क्या मांगता’ होता.’…

‘सोचता हूँ नूर’ दादा संयत स्वर में बोला, ‘जिंदगी में न जाने कितनों को गुमराह किया होगा? सोचता हूँ कुछ भलमनसाहत भी इन हाथों से हो जाये. ठाकुर साहब अल्मोड़ा-नैनीताल के रहने वाले हैं…’

‘नैनीताल के रहने वाले हैं…!’ अनजाने ही नूर के मुँह से निकल गया. अपनी उतावली पर वह बेहद शरमा गई. मन हुआ दौड़कर अन्दर भाग जाये.
पर तभी दादा ने पूछा, ‘क्यों नूर, नैनीताल का नाम सुनते ही तुम चोंक क्यों गई?’

‘जी, यों ही,’ अंगूठे से धरती कुरेदते नूर बोली, ‘बचपन मेरा वहीँ बीता – तल्लीताल में. वहां पिताजी यजमानों के यहाँ वृत्ति… अब्बाजान की बात मैं कह रही थी न!’ नूर न जाने क्यों घबरा गई.

हाँ-हाँ, लेकिन यों रुक क्यों गई?’ दादा ने पूछा. पर नूर छुटकारे की साँस ले भी न पाई थी कि दादा अंगुली उठाकर बोला, यह ‘वृत्ति’ क्या कहा था तूने नूर?’

पर तब तक नूर संभल चुकी थी. ‘नैनीताल की पहाड़ी बोली में यह लफ्ज आता है. इसका मतलब खाना पकाना होता है. मेरे अब्बाजान साहब के यहाँ खानसामा थे न!’…

“गाँव की बात है. एक दिन धंधार जाते समय पंडित ने पिरोल समेट रही एक किशोरी को छेड़ दिया था. पहाड़ी में उसने कहा था, ‘पिरोल भौत बटोरि है, छ्योड़ी! कलेजिक कांख पड़ी हौंस ले बटोरि ले.’

वीरेन को याद है, उसने कहा था, ‘क्या पंडित, तू भी छोटी-छोटी बच्चियों को छेड़ता है!’

पंडित हंस दिया था, ‘तुम खासियों की अकाल भी हाल के लठ्यूड़-सी मोती होती है. बावले, मिर्ची और औरत – जितनी छोटी उतनी ही तेज! समझा?

(बोरीवली से बोरीबंदर तक, पृष्ठ 22-51)

***

इससे पहले कि डेढ़ यारों के किस्से को कठोपनिषद् की जड़ों के साथ जोड़ें, आधे यार यानी मटियानी के किस्से के बाद पूरे यार यानी मनोहर यानी जोशी जी के जड़ों की बात भी कर ली जाय.

“मेरा अकेलापन उन दिनों बहैसियत पत्रकार वैश्यावृत्ति पर अनौपचारिक अनुसंधान कर रहा था….

“इस बाबू ने एक दिन मैरीन ड्राइव में मेरी जिज्ञासु दृष्टि की अपने ही ढंग से व्याख्या करने के बाद पहले मुझसे माचिस माँगी और फिर सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए सेवा-भाव से पूछा, ‘तफरी होने का?’

मैंने अनुभवी होने का नाटक करते हुए कहा, ‘इदर तो सब बंडल तफरी. उदर वर्ली में कहीं कोई एंग्लो-इंडियन बाई चलाई है कोई नवां फिलाट, उसका पता तुमकूं?’

बाबू ने सिर खुजलाया, ‘कौन बाई, नाव काय उसका?’

बाबू को कुछ और ध्वस्त करने के लिए मैंने इस दलाल से सुनी हुई बात, उस दलाल पर दे मरने का अपना नुस्खा फिर आजमाया, ‘ए जो फिल्मों में कम कर चुका मरैठी छोकरी; करमाइकल रोड में धंदा सुरू किया, उसकू जानता तुम? जिसका दलाल पवनपुल वाला बंगाली का दोस्त डिसिल्वा?’

‘नेई, इन दोन अब्बी मेरा ध्यान में नहीं. लेकिन पत्ता कर देगा.अक्खा दलाल लोक बाबू का सागिर्द.’…

उस ज़माने में जोशी जी की एक ही मुख़्तसर-सी ख्वाहिश हुआ करती थी साहब कि हिंदी को गद्य में एक ठो ‘वार एंड पीस’ और पद्य में एक ठो ‘वेस्टलैंड’ दे जाएँ. उन्हें बहुत अफ़सोस हुआ करता था कि उनके साथी साहित्यिक, वे प्रयागवासी रहे हों या प्रागवासी, अपनी आकांक्षा के आकाश को लॉरेंस ड्युरेलके गद्य और रिल्के के पद्य से ऊपर उठा ही नहीं पाए बेचारे. जब मैंने बम्बई में डोक्युमेंटरी बनाने के सरकारी महकमे में नियुक्त होने के बाद फ़िल्मी दुनिया में घुस जाने का चक्कर लगाया तब जोशी जी ने एक अदद और आकांक्षा पाल ली, ‘स्वीट डिकेडेंस’ उर्फ़ ‘मीठी सड़ांध’ की फिल्म बनाने की, समझे ना, वही कि कुछ आमिर किस्म के लोग-लुगाई दो-एकम-एक वाले घटिया से चक्कर चला रहे हैं आपस में…

‘किस्सा-कोताह यह कि जोशीजी को, जो पढ़े मेरे साथ वहीँ गोबर मिट्टी इस्कूल अजमेर और लखनऊ अन्वार्सिटी में हैं लेकिन जिन्हें खुशफहमी है कि सोर्बोर्न से स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त किये हुए हैं, इस एक अदद जनाना कि एक झलक में दो संभावनाएं दिखाई दीं. पहली यह कि यह पहुंचेली पतुरिया एक अदद पात्रा है, एक अदद ‘वार एंड पीस’ लिख सकने वाले पहुँचेले उपन्यासकार की तलाश में. दूसरी यह कि उपरोक्त पतुरिया, मीठी सड़ांध वाली फिल्म की मिठास भी हो सकती है.’

मगर ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ के लेखक का वास्तविक परिचय उनकी जड़ों का ही है, जो उन्हें अल्मोड़ा की गल्ली मोहल्ले से सीधे ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’ और ‘नेताजी कहिन’ तक के अंतर्राष्ट्रीय फलक तक ले जाता है, मगर अंततः पहुचते वहीँ हैं जहाँ से उन्होंने (कसप) शुरुआत की थी…

“मैं साहब मैं ही नहीं हूँ. इस काया में, जिसे मनोहरश्याम जोशी वल्द प्रेमबल्लभ जोशी मरहूम, मौजा गल्ली अल्मोड़ा, हाल मुकाम दिल्ली कहा जाता है दो और जमूरे घुसे हुए हैं. एक हैं जोशी जी, लेखक वेखक हैं. समझे ना, इडियट-इलियट टाइप. मैं तो साहब, रोटी-रोजी के लिए अनुवाद करता हूँ कभी-कभी. जोशी जी इंडियन अलांया इंडियन फलां बन जाने के चक्कर में सतत अनुवादक हैं. बहुत प्रेमपूर्वक घोटा लगाते हैं पश्चिमी साहित्य का अंग्रेजी में, और फिर हिंदी में लिखते हैं कुछ-न-कुछ, अपने आराध्य ओरोजिनल अलां या फलां की इस्टाइल में कि कोई फिर इनका साहित्य अंग्रेजी में अनुवाद करे और ओरिजिनल अलां-फलां से दाद दिलाये इन्हें. दिक्कत यह है कि पढ़-पढ़कर इनके लिए साहित्य क्या, ससुरा जीवन तक मौलिक नहीं रह गया.’ (‘कुरु-कुरु स्वाहा’ – मनोहरश्याम जोशी, पृष्ठ 8-11)

मतलब ये कि आदमी कितनी ही बड़ी छलांग क्यों न लगाए, उसे तसल्ली तभी मिलती है, तभी उसका किस्सा पूरा होता है जब वह अपनी जड़ों पर लौटता है. अनायास नहीं है कि संसार की महानतम रचनाएँ कलाकारों ने अपनी जड़ों पर लटकर लिखी हैं.

कठोपनिषद का उल्टे वृक्ष की व्याख्या भले ही हिन्दू व्याख्याकारों ने महान परमात्मा के अस्तित्व को रेखांकित करने के लिए की हो, लेकिन है यह कलाकार के अस्तित्व की पहली शर्त. रचनाकार अपनी कला-साधना के द्वारा जीवन की उचाईयों को स्पर्श करता है लेकिन वह जन-जन के कंठ तक तभी पहुँचता है जब वह एक बार फिर अपनी जड़ों पर जाकर कूद को दुबारा रचता है. ऐसा ही उपनिषद्कार ने कहा है ओर ऐसा ही हमारे वक़्त के मशहूर विचारक टीएस एलियट ने अपने विश्वविख्यात निबंध ‘ट्रेडिशन एंड इंडिविजुअल टैलेंट’ में कहा है.

(जारी है)

फ़ोटो:  मृगेश पाण्डे

 

लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही‘ हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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