फोटो: सुधीर कुमार
2022 का नया सवेरा इतिहास की एक नयी तहरीर लेकर मेरे सामने आकर खड़ा हो गया. यह नया सवेरा मेरे सामने क्यों हाज़िर हुआ? मुझे यह कोई सन्देश देना चाहता है, यादों का गुलदस्ता भेंट करना चाहता है, या आगे की ज़िंदगी का ऐसा पैगाम लेकर आया है जिसके बारे में कुछ भी अनुमान लगा सकना मेरे लिए संभव नहीं है.
(Batrohi January 2022 Article)
उसके हाथ में हाल ही में प्रकाशित मेरी किताब ‘हम तीन थोकदार’ है और सुनहरी किरणों के रूप में उसमें से फूटते असंख्य सवाल. पैंसठ साल पहले मेरे ममकोट के गाँव पनुवानौला में हल्द्वानी-पिथौरागढ़ मार्ग पर बैठे एक ज्योतिषी ने मुझे बताया था कि मेरी उम्र विधाता ने चित्रगुप्त के रजिस्टर में सिर्फ 75 साल लिखी है और वह साल बीतते ही मेरी मृत्यु हो जाएगी.
पचहत्तर साल बीत चुके हैं मगर मैं अभी तक जिंदा हूँ. मुझे खरोंच तक नहीं आई, उल्टे, मैंने अपनी बीती ज़िंदगी को लेकर इस बीच एक भरा-पूरा आख्यान लिख डाला. 18 अप्रैल, 2020 की डायरी से शुरू हुए लॉक डाउन के साथ ही जन्मा यह आख्यान अगले एक साल में ही वेब-पत्रिका ‘समालोचन’ में धारावाहिक प्रकाशित भी हो गया और ‘समयसाक्ष्य’ से पुस्तकाकार प्रकाशित भी. पाठकों ने इस पर जमकर अपनी प्रतिक्रिया दी और अपने तरीके से इसका स्वागत किया.
हिंदी में इस तरह की चीजें लिखने-पढ़ने का चलन नहीं है इसलिए फ़िलहाल इसके मुद्रित रूप को लेकर कोई खास हलचल सुनाई नहीं दी है.
यह आख्यान इसके रचनाकार का आत्म-व्यंग्य है; खुद के विडम्बनापूर्ण स्मृति-इतिहास का अपनी ही लेखनी से मखौल उड़ाने का उपक्रम-सा. खुद के महिमामंडन और आत्म-रति के वर्तमान दौर में ये बातें अटपटी लगेंगी, इसे मैं जानता था. इस बीच जमाना पूरा-का-पूरा बदल चुका है. अब तो किताब छपते ही बिना उसे पढ़े ही, कवर का डिजाइन देखकर बधाइयों का सिलसिला शुरू हो जाता है और तब तक चलता रहता है, जब तक कि किताब दुकान पर या पुस्तक-मेले में दिखाई नहीं देती.
आत्म-व्यंग्य को जिंदगी की सच्चाई की तरह स्वीकार करने का धैर्य हिंदी में अब नहीं है. अब तो लेखकगण उदास भंगिमाओं के साथ हमेशा तनाव में रहते हैं कि उन्हें कोई मुंह नहीं लगाता; उनकी कोई प्रायोजित मंडली नहीं है जो बिना उसकी रचना पढ़े तारीफों के खूबसूरत पुल बांधकर रख दे. विडंबना यह है कि वो अपने लिखे को खुद ही पढ़ने के लिए अभिशप्त हैं.
(Batrohi January 2022 Article)
क्या हिंदी लेखकों का चेहरा हमेशा से ही ऐसा था? हिंदी का लेखक पहले तो इतना तनावग्रस्त नहीं दिखाई देता था. मस्ती में जीता था, खाता-पीता, कुश्ती करता हमेशा एक-दूसरे की मदद के लिए तैयार रहता था, खूब यात्राएँ करता था. आज वह अपनी छीछालेदर से क्यों इतना घबराने लगा है?
असलियत यह है कि हिंदी लेखन का जन्म ही आत्म-व्यंग्य में से हुआ है. कबीर से लेकर आधुनिक हिंदी के मूर्धन्य लेखकों आमिर खुसरो,बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र और बालमुकुन्द गुप्त तक या भारतेंदु की ‘अंधेर नगरी’ से लेकर प्रेमचंद की ‘बड़े भाई साहब’ और ‘कफ़न’ तक इस जिंदादिल आत्मव्यंग्य के कितने ही चेहरे हमारे बीच मौजूद हैं; मगर गंभीर-उदात्त सौंदर्यशास्त्र के हमारे साहित्यिक मसीहा ऐसी रचनाओं को हमेशा फुटकर खाते में डालते रहे, मुख्यधारा की संवेदना के रूप में इनकी चर्चा से बचते रहे. ‘नई कहानी’ के दौर में तो अतुलनीय किस्सागो हरिशंकर परसाई ने आत्म-व्यंग्य को एक नयी विधा की शक्ल दे दी, मगर हिंदी के आचार्यों और पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान के मसीहाओं ने उन्हें कितना स्वीकार किया? आज तक परसाई फुटकर लेखक बने हुए हैं, शास्त्रकारों ने अपनी पवित्र रसोई में उन्हें एंट्री आज तक नहीं दी है, उनके पकवानों के स्वाद की शास्त्रीय-चर्चा तो दूर की बात है.
अपने ही बूते एक दिन ‘राग दरबारी’ ने जबरदस्ती प्रवेश किया हालाँकि अकादमी सम्मान के बावजूद उसके लेखक को अपवाद-लेखक के रूप में ही याद किया जाता रहा है. हालत यह है कि आधुनिक हिंदी की डेढ़ सौ साल की यात्रा तय करने के बावजूद हम अभी तक नहीं जानते कि कौन लेखक मुख्यधारा का है और कौन अपवाद; कौन हमारी अपनी धरती का है और कौन बाहर से आकर जबरदस्ती हमारी जमीन पर कब्ज़ा कर बैठा है!
(Batrohi January 2022 Article)
और आज नए साल की सुबह जो चेहरा मेरे सामने मुँहबाये खड़ा है, वह तो न समझ में आने वाला एक मरसिया गा रहा है; एक अस्पष्ट शोकगीत, ऐसा सियापा, जो मानो हिंदी लेखकों का स्थायीभाव बन चुका है. जहाँ तक मेरा सवाल है, पुराने ज़माने की व्यवस्था के हिसाब से संन्यास आश्रम में पहुँच चुका यह आधुनिक हिंदी का लेखक इस शोकगीत का आशय कैसे समझ सकता है? कहाँ से वह नए ज़माने का व्याकरण लाए? मगर जवाब मुझे ही तलाश करना है.
एक रचनाकार होने के नाते मेरी तो एकमात्र इच्छा होगी कि नए साल में मेरे इस अजीबोगरीब आख्यान को ज्यादा-से-ज्यादा लोग पढ़ें और मेरे आत्मव्यंग्य के बहाने मेरे पुरखे थोकदारों के बीच जाकर मेरे द्वारा की गई उनकी इस छीछालेदर का आनंद लें. बता दूं, मेरे इन पुरखों में इस आख्यान के लेखक के अलावा मेरा जाति-भाई अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ योगी आदित्यनाथ और तलचट्टी-नरेश थोकदार कल्याण सिंह बिष्ट तो हैं ही; इनके अलावा बाकी थोकदारों में हमारे उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद और मेरे साहित्यिक-प्रेरक गजानन माधव मुक्तिबोध और हिंदी कहानी की फर्स्ट लेडी शिवरानी देवी प्रेमचंद भी हैं. बाकी थोकदारों में हमारे ही पुरखे-लेखक शैलेश मटियानी, शिवानी और मनोहरश्याम जोशी के साथ उत्तराखंड भाबर में नयी-हलद्वानी बसाकर पहाड़ियों को आधुनिकता का पाठ पढ़ाने वाला पनार घाटी का थोकदार शिकारी जिम कार्वेट, कुमाऊँ विवि के प्रथम कुलपति प्रोफ़ेसर देवीदत्त पन्त, भौतिकी विभाग का मेरा सहयोगी प्राध्यापक डॉ. अतुल पांडे, कौसानीवासी महाकवि सुमित्रानंदन पन्त उर्फ़ गुसाईं दत्त, उसके साथ एक ही माँ के दूध का हम-निवाला गरुड़-बैजनाथ निवासी थोकदार गुसाई सिंह, उसकी बेटी भागुली और हल्द्वानी से प्रकाशित होने वाली वेब-पत्रिका ‘काफल ट्री’ जैसे अजीबोगरीब किरदार हैं.
एक बार आप इन किरदारों के साथ सैर करेंगे तो आप पहाड़ी संस्कृति का आशय तो आत्मसात तो करेंगे ही, नए साल के इस मरसिये का अर्थ भी समझ जायेंगे. आप निराश नहीं होंगे और आपका भरपूर मनोरंजन होगा, इसकी मैं गारंटी देता हूँ. जरूर, पहले आपको हिंदी लेखक की गुरू-गंभीर छवि से मुक्त होकर खुद के भीतर परसाई-संस्कार पैदा करना होगा, खुद की शर्तों पर नहीं, लेखक की शर्तों पर. एक पिछड़े समाज को अपने लोगों की भलाई के लिए इतना त्याग तो करना ही चाहिए.
(Batrohi January 2022 Article)
हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन.
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