पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के संस्थापक अध्यक्ष रहे बलवन्त सिंह चुफाल हल्द्वानी वह भाबर के क्षेत्र में पर्वतीय समाज के लिए एक ऐसा नाम रहा है, जो निडर थे और पहाड़ के किसी व्यक्ति के उत्पीड़न की घटना पर आगे खड़ा हो जाते थे. स्थानीय स्तर पर एक खॉटी दमदार पहाड़ी नेता के तौर पर उनकी अलग पहचान थी. एक स्वाभिमानी पहाड़ी व्यक्ति के तौर पर हमेशा आगे रहने वाले थे बलवन्त सिंह चुफाल. चुफाल का भोलापन और जिद्दीपन उनके ठेठ पहाड़ी होने की झलक देता था. किसी दौर में वह हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में अपनी दबंगता के लिये पहचाने गये और भाबर में पर्वतीय समाज को एकजुट करने के लिये उनका मजबूत और निर्भीक नेतृत्व सामने आया था. इन्हीं बलवंत सिंह चुफाल की आज 10 फरवरी 2025 को पहली पुण्यतिथि है.
(Balwant Singh Chuphal Uttarakhand)
उल्लेखनीय है कि पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के संस्थापक अध्यक्ष रहे बलवन्त सिंह चुफाल का 10 फरवरी 2024 को मुखानी (हल्द्वानी) के एक अस्पताल में इलाज के दौरान ह्रदयाघात से निधन हो गया था. हल्द्वानी के मल्ली बमोरी स्थित सैनिक कालोनी में रहने वाले चुफाल 76 वर्ष के थे. उन्हें कई साल से प्रोस्टेट और डायबिटीज की परेशानी थी. उनके प्रोस्टेट के दो ऑपरेशन हो चुके थे. मृत्यु से एक हफ्ते पहले उन्हें पेशाब में परेशानी के चलते अस्पताल में भर्ती किया गया था. जहॉ उनका एक बार फिर से ऑपरेशन किया गया और वे तेजी के साथ स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे.
गत 10 फरवरी 2024 को उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर जाना था. पर डिस्चार्ज होने से पहले ही सवेरे उन्हें ह्रदयाघात हुआ और डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके. इस तरह कुमाउनी समाज का एक दमदार नेतृत्व हमेशा के लिए खामोश हो गया और पीछे छोड़ गया अपनी बहादुरी, सच्चाई, नैतिकता के सैकड़ों किस्से. वह अपने पीछे पत्नी हेमलता चुफाल, पुत्री विनीता, पुत्र इशान, पुत्रवधु बीना चुफाल, पोते रुद्राक्ष और पोती अंजलि को शोकाकुल छोड़ गये.
स्थानीय स्तर पर एक खॉटी दमदार पहाड़ी नेता के तौर पर उनकी अलग पहचान थी. एक स्वाभिमानी पहाड़ी व्यक्ति के तौर पर हमेशा आगे रहने वाले बलवन्त सिंह चुफाल का जन्म 14 अप्रैल 1948 को पिथौरागढ़ जिले के डीडीहाट तहसील के सिंणी (खेतकाना) गॉव में हुआ. सिंणी गॉव के बैराग सिंह की पहली पत्नी से तीन पुत्र और दो पुत्रियां हुई. जिनमें गोपुली देवी, हिम्मत सिंह, धन सिंह, रमुली देवी और त्रिलोक सिंह हुए. पहली पत्नी के अल्पायु में मौत के बाद उन्होंने दूसरा विवाह किया. जिससे उनकी पॉच संतानें चार पुत्र और एक पुत्री हुई. जिनमें धर्म सिंह, मोहन सिंह, एक पुत्री, जवाहर सिंह, शेर सिंह हुए.
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इनमें से शेर सिंह के बेटे बलवन्त सिंह हुए. उनकी मॉ का नाम मंगला देवी चुफाल था. पिता शेर सिंह कुमाऊँ रेजिमेंट में सूबेदार के पद सेवारत थे. वहीं 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सीमा की चौकसी करते हुए 1963 में जोशीमठ के सीमान्त में उनका निधन हुआ. बलवन्त सिंह पॉच भाई- बहनों में सबसे बड़े थे. उसके बाद उनकी बहन धना कोश्यारी थी. जिनका विवाह पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के टनकपुर निवासी चाचा दीवान सिंह कोश्यारी के बेटे हयात सिंह कोश्यारी से हुआ.
दीवान सिंह कोश्यारी पटवारी थे. धना कोश्यारी का कम उम्र में ही निधन हो गया था. उनकी दो बेटियॉ हैं. उनके बाद की बहन बसन्ती का विवाह रुद्रपुर के दानपुर गॉव में मोहन सिंह भण्डारी के साथ हुआ. जो रुद्रपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं. उसके बाद भाई विक्रम सिंह चुफाल थे. जो हल्द्वानी के अधिवक्ता थे. कम उम्र में ही एक दुर्घटना में उनका भी असामयिक निधन हो गया था. सबसे छोटी बहन गुड्डी का विवाह नैनीताल निवासी हरेन्द्र सिजवाली के साथ हुआ. जो नैनीताल की वेधशाला में साइंटिफिक ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हुए.
इनमें से बलवन्त सिंह, धना चुफाल और बसन्ती चुफाल का जन्म डीडीहाट के सिंणी गॉव में ही हुआ. उसके बाद उनके पिता शेर सिंह अपने अन्य भाइयों के पास गौलापार-हल्द्वानी के जसपुर खोलिया गॉव में 1955-56 में आ गए. जिनमें से उनके दो बड़े भाई धर्मसिंह चुफाल और जवाहर सिंह चुफाल 1946 में ही पैत्रिक गॉव सिंणी से जसपुर खोलिया आ गए थे. शेर सिंह ने भी गौलापार में 1946 में ही जमीन खरीद ली थी. पर उनका परिवार 1955-56 में गौलापार-हल्द्वानी आया.
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जब बलवंत सिंह चुफाल के पिता शेर सिंह चुफाल का निधन हुआ तो उस समय बलवंत सिंह रानीखेत के केंद्रीय विद्यालय में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे थे. पिता की आकस्मिक मौत के बाद उन्हें केंद्रीय विद्यालय के छात्रावास से अपने घर गौलापार लौटना पड़ा. उसके बाद उन्होंने एमबी इंटर कॉलेज से इंटर किया और एमबी डिग्री कॉलेज में बीए में एडमिशन लिया. पर घर की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के कारण वे स्नातक पूरा नहीं कर पाए. पिता के सेना में कार्यरत होने के कारण वे उनके ही साथ रहे और उनकी प्रारंभिक शिक्षा कानपुर में हुई. उसके बाद उन्होंने छठी से आठवीं तक गौलापार के कुंवरपुर इंटर कॉलेज में पढ़ाई की. वे वहां छात्रावास में रहते थे. इसके बाद उनके पिता ने उन्हें केंद्रीय विद्यालय रानीखेत में भर्ती कर दिया. उनके पिता शेर सिंह चुफाल ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के अलावा 1948 की कश्मीर की लड़ाई में भी हिस्सा लिया था.
चुफाल का भोलापन और जिद्दीपन उनके ठेठ पहाड़ी होने की झलक देता था. किसी दौर में वह हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में अपनी दबंगता के लिये पहचाने गये और भाबर में पर्वतीय समाज को एकजुट करने के लिये उनका मजबूत और निर्भीक नेतृत्व सामने आया था. उनके दुस्साहस भरे व्यक्तित्व के बारे में उनके भिनज्यू ध्यान सिंह रौतेला बताते हैं कि गौलापार में 1960 के दशक में दो सिख भाइयों का बहुत आतंक था. वे लोगों को यूं ही परेशान करते रहते थे. दूसरे के खेत में जा रहा पानी भी वह तोड़कर अपने यहां ले जाते. किसी के कुछ कहने पर उनकी जमकर पिटाई भी कर देते. लोगों को आतंकित करने के लिए नंगी तलवार लेकर घूमना उनका शगल था. जिसकी वजह से लोग उनसे बहुत डरे रहते और उनसे कुछ नहीं कह पाते थे. ऐसे ही एक बार खेत में पानी लगाने को लेकर 19-20 साल की उम्र के बलवंत सिंह चुफाल का उन सिख भाइयों से झगड़ा हो गया. उन्होंने उनसे डरने की बजाय अपने दो और साथियों के साथ मिलकर उनकी जमकर पिटाई कर दी. उस पिटाई का दोनों सिख भाइयों पर ऐसा खौफ छाया कि उन्हें गौलापार में अपनी जमीन बेचकर वहां से जाना पड़ा. बलवंत सिंह के दुस्साहस के कारण लोगों को उनके आतंक से मुक्ति मिली.
उनका मन खेती-किसानी में बहुत कम लगता था. इसी वजह से वह हल्द्वानी शहर में ही छोटा-मोटा व्यवसाय करके रहने लगे और अपने छोटे भाई विक्रम सिंह और बहन गुड्डी को भी हल्द्वानी रहकर ही पढ़ाने लगे. इसी दौरान बलवंत सिंह ने देखा कि हल्द्वानी के ढाबों और दुकानों में काम करने वाले पहाड़ के लोगों की दशा बहुत खराब है. उस समय हल्द्वानी के व्यवसाय पर पंजाबी, सिखों और बनियों का ही एकाधिकार था. वे लोग पहाड़ के युवाओं को अपने यहां नौकरी पर रख लेते थे, लेकिन उन्हें उनका वेतन न तो समय पर देते और न पूरा वेतन देते थे. अगर कोई कुछ कहता तो उसकी पिटाई कर उसे भगा देते. बलवंत सिंह ने धीरे-धीरे अपने साथियों के साथ इसके खिलाफ आवाज उठानी शुरू की. जो दुकानदार काम करवाने के बाद भी अपने नौकरों को उनकी पूरी मजदूरी नहीं देता तो उनसे पूरी मजदूरी दिलवाते. जिससे उनके छवि अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले व्यक्ति के तौर पर हल्द्वानी में बन गई.
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1980 में जब पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच की स्थापना हल्द्वानी में हुई इसके गठन के मूल में भी कारण इसी तरह की घटनाएं थी. पहाड़ के लोगों की बहुलता वाला क्षेत्र होने के बाद भी हल्द्वानी शहर में उनकी कोई विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान नहीं थी. एक तरह से पहाड़ के लोग बिखरे हुए से थे. इसी दौरान वहां दूसरे वर्गों सिख और मुसलमानों के विभिन्न अवसरों पर निकाले जाने वाले पारम्परिक जुलूस शहर में अमन चैन की बजाय शक्ति प्रदर्शन का जरिया बन रहे थे. इन जुलूसों में स्थानीय के अलावा बाहर से भी लोग काफी संख्या में एकत्र होने लगे थे. जिसके कारण शहर में कई दिन तक अराजकता और गुंडागर्दी का सा माहौल बना रहता. इस दौरान रेस्टोरेंट और ढाबों में आए दिन झगड़े होने लगे थे.
वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार रहे आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी : स्मृतियों के झरोखे से’ में इस बारे में काफी जानकारी मिलती है. उप्रेती अपनी किताब में लिखते हैं कि कुछ विचलित कर देने वाले घटनाक्रमों के बाद 1981 में बलवंत सिंह ने अपने सहयोगियों से विचार विमर्श किया और एक बैठक तत्कालीन नगर पालिका के सभासद किरण पांडे के निवास पर हुई. इस बैठक में पर्वतीय क्षेत्र के मूल निवासियों को संगठित करने पर बात की गई. बैठक में वक्त आने पर संगठित होकर मुकाबला करने और एक-दूसरे को सहयोग करने पर विचार हुआ. साथ ही एक संस्था का गठन किया गया. जिसका नाम पर्वतीय सांस्कृतिक एकता मंच रखा गया. इसका अध्यक्ष एडवोकेट ललित मोहन भट्ट को बनाया गया और बलवंत सिंह चुफाल इसके संयोजक बने.
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कुछ समय बाद संस्था की बैठक में यह निर्णय हुआ कि किसी विशेष पर्व पर सांस्कृतिक प्रदर्शन का आयोजन किया जाए. लम्बे विचार के बाद 14 जनवरी उत्तरायण के पर्व को इसके लिए सबसे उपयुक्त समझा गया. आखिरकार 14 जनवरी 1982 को वह दिन भी आ गया, जब उत्तरायणी का सांस्कृतिक जुलूस निकाला गया. बिना किसी बहुत अधिक तैयारी के हल्द्वानी के रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोग जूटे. विभिन्न जगहों से आए दर्जनों सांस्कृतिक दलों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया. शहर में एकाएक इतने लोगों के इकट्ठे होने से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई. उस दिन लोगों को सम्बोधित करते हुए कार्यक्रम के संयोजक बलवंत सिंह चुफाल ने कुमाउनी में कहा कि हमें इस सांस्कृतिक प्रदर्शन की जरूरत मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण पड़ी है.
इस दौरान जब संस्था को पंजीकृत करने की कार्यवाही शुरू हुई तो इसका नाम पर्वतीय सांस्कृतिक एकता मंच से बदलकर “पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच” रखना पड़ा. संस्था के पहले अध्यक्ष बलवंत सिंह चुफाल और महासचिव आनंद बल्लभ उप्रेती को बनाया गया. इसके बाद संस्था के कार्यालय के लिए नैनीताल रोड स्थित कोआपरेटिव बैंक के पास एक जमीन खीम सिंह बिष्ट ने संस्था को दी थी. पर, ऊपरी राजनीतिक दबाव में प्रशासन ने कहा कि यह जमीन सरकारी है. उसके बाद संस्था की जमीन के लिये बड़ा आन्दोलन हुआ और हीरानगर की जमीन पर मंच स्थापित हुआ. इसके लिये 1982 में 1 दिसम्बर से 3 दिसम्बर तक जेल भरो आन्दोलन भी किया गया. जिसमें 115 लोग जेल गए. बाद में थक कर प्रशासन ने गिरफ्तारी बंद कर दी. जब तक मंच का भवन नहीं बन गया, उसके कई वर्षों बाद तक भी उत्थान मंच का कार्यालय ‘शक्ति प्रेस’ (पिघलता हिमालय) के कार्यालय में ही बना रहा.
बलवन्त सिंह चुफाल एक ऐसा नाम रहा है, जो निडर था और पहाड़ के किसी व्यक्ति के उत्पीड़न की घटना पर आगे खड़ा हो जाता. वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार रहे आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ उनका अथाह लगाव था. दोनों ने काफी लम्बे समय तक अनके सामाजिक आन्दोलनों में एक साथ भागीदारी की थी. उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी : स्मृतियों के झरोखे से’ में इस बारे में काफी जानकारी मिलती है.
पहाड़ के हितों वाले किसी भी मुद्दे पर खड़े होने और उसका समर्थन करने में चुफाल पीछे नहीं हटते थे. इसकी बानगी पहली कुमाउनी फिल्म “मेधा आ” के प्रदर्शन को लेकर भी दिखाई देती है. रानीखेत के रतन पैलेस में 30 सितंबर 1987 को फिल्म का प्रीमियर शो हुआ. जिसका उद्घाटन पूर्व राज्यपाल बी पांडे ने किया. फिल्म के प्रीमियर शो के बाद भी कोई सिनेमा हॉल मलिक कुमाऊं में फिल्म दिखाने को राजी नहीं था इसका एक बड़ा कारण सिनेमा हॉल मालिकों का यह डर था कि लोग फिल्म देखने नहीं आए तो उन्हें आर्थिक नुकसान होगा.
सिनेमा हॉल मालिकों द्वारा दिखाई जा रही बेरुखी के बीच हल्द्वानी शहर में इसके लिए पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के अध्यक्ष बलवंत सिंह चुफाल आगे आए. उन्होंने फिल्म के निर्माता जीवन बिष्ट से इस बारे में बातचीत की और उन्हें भरोसा दिलाया कि हल्द्वानी में फिल्म का प्रदर्शन अवश्य होगा. चुफाल ने इसके बाद हल्द्वानी के रामपुर रोड स्थित लक्ष्मी टॉकीज के मालिक सुशील अग्रवाल “पप्पी” से बात की और उन्हें अपने थिएटर में फिल्म के प्रदर्शन के लिए राजी किया. हल्द्वानी में फिल्म का प्रदर्शन होने के बाद कुमाऊं के कई और दूसरे शहरों में उसके बाद “मेघा आ” का प्रदर्शन हो पाया.
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सामाजिक और पहाड़ के सरोकारों से जुड़े इस तरह के अनेक किस्से चुफाल के जीवन से जुड़े हैं. ऐसे किस्से ही उन्हें वास्तव में कुमाऊं का टाइगर बनाते हैं. चुफाल के निधन पर उत्थान मंच के अध्यक्ष खड़क सिंह बगडवाल ने इसे पर्वतीय समाज के लिए अपूर्णीय क्षति बताया. उन्होंने कहा कि चुफाल ने हल्द्वानी में पर्वतीय समाज को एक नई पहचान दी. उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण लोग उन्हें कुमाऊं का टाइगर भी कहते थे. उनके निधन से कुमाउनी संस्कृति को भाबर में एक आधार देने वाला स्तम्भ ढह गया.
उत्थान मंच के सचिव देवेंद्र तोलिया ने कहा कि हीरानगर के पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के स्थल के लिए उन्होंने 1980 के दौर में बड़ा आन्दोलन किया. उस आन्दोलन में शामिल हजारों लोगों का उन्होंने नेतृत्व किया था. तब जाकर हीरानगर की जमीन संस्था को मिल पाई थी.
उत्तराखण्ड क्रांति दल के पूर्व अध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार ने तब उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि 1988 से चुफाल कुछ सालों तक उत्तराखण्ड क्रान्ति दल में रह कर राज्य आन्दोलन में भी सक्रिय रहे. उनके नेतृत्व में ही 24-25 जुलाई 1989 को हल्द्वानी में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का वार्षिक अधिवेशन हुआ था. वे इन्द्रमणि बड़ोनी और जसवन्त सिंह बिष्ट के साथ उक्रान्द के संरक्षक मंडल में शामिल थे. उनके नेतृत्व में हल्द्वानी क्षेत्र में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल को एक नया आधार व पहचान मिली थी. पंवार ने बताया कि 1989 में जब उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने 72 घंटे के उत्तराखण्ड बंद और चक्का जाम का आह्वान किया था तो उनके नेतृत्व में तब हल्द्वानी पूरी तरह बंद और चक्का जाम रहा था.
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इन्द्रमणि बड़ोनी विचार मंच के सचिव जगमोहन रौतेला ने कहा कि वे कभी हल्द्वानी के तेज-तर्रार व प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल थे. स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण पिछले लगभग एक दशक से उनकी सामाजिक गतिविधियॉ बेहद कम हो गई थी. रौतेला ने कहा कि इसके बाद भी वह हर साल उत्तरैणी कौतिक के उद्घाटन के दिन 9 जनवरी और फिर शोभायात्रा के दिन 14 जनवरी को हर स्थिति में उसमें शामिल होते थे. यह उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है. समाज के लिए उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा.
देवभूमि उद्योग व्यापार मंडल के संस्थापक अध्यक्ष हुकम सिंह कुंवर ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के गठन और आन्दोलन के बाद मंच को जमीन मिलने के बाद उत्थान मंच के परिसर में हर साल 8 दिन का उत्तरैणी कौतिक लगाने का निर्णय किया गया. जिसमें हर दिन विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल-कूद और दूसरी कई तरह की गतिविधियॉ होने लगी और दर्जनों विभिन्न तरह के स्टॉल भी लगते हैं. इसी कौतिक के तहत 14 जनवरी को हर साल विशाल शोभायात्रा शहर में निकाली जाती है. जो लोगों के आकर्षण का केन्द्र होती है.
चुफाल लम्बे समय से डायबिटीज से पीड़ित थे. पिछले साल 2024 में सार्वजनिक तौर पर वे आखिरी बार उत्तरैणी कौतिक में शोभायात्रा के दौरान हीरानगर में उत्थान मंच में शामिल हुए थे. तब उन्होंने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि हमें जात-धर्म से ऊपर उठकर केवल मानवता के लिए जीना और उसी के लिए कार्य करना चाहिए. उन्होंने कहा की गुरु नानक देव जातिवाद को नहीं मानते थे. इसी बात को लेकर उन्होंने लंगर सेवा शुरू की. जो आज भी लगातार सिख समाज द्वारा चलाई जा रही है. जिसमें अमीर-गरीब, जात-पात, हिंदू-मुसलमान आदि कुछ नहीं होता. हर तरह के लोग उस लंगर में खाते हैं. चुफाल ने कहा कि अगर नानक देव जी की बातों पर राजनीति करने वाले लोग अमल करने लगें तो यह देश के लिए कितना अच्छा हो सकता है. श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भगत, कबीर, फर्राद, रविदास, धन्ना, तरलोचन, जय देव, सूरदास जैसे महापुरुषों के विचार हैं. ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान और ना कोई सिख. सब उसी ईश्वर की संतान हैं. उस दिन का यह सम्बोधन उनके द्वारा समाज को दिया गया आखिरी सम्बोधन साबित हुआ.
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स्वास्थ्य खराब होने पर कुछ दिन पहले उन्हें हल्द्वानी के ही एक अस्पताल में भर्ती किया गया था. जहॉ इलाज के दौरान ह्रदयाघात होने पर उनका निधन हुआ. उत्थान मंच परिसर में उनके निधन पर गत वर्ष 11 फरवरी 2024 को एक शोकसभा में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई थी तो उसमें खड़क सिंह बगडवाल, यूसी जोशी, देवेंद्र तोलिया, त्रिलोक बनोली, कैलाश जोशी, चन्द्रशेखर परगांई, शोभा बिष्ट, पुष्पा सम्भल, यशपाल टम्टा, भगवान सिंह चुफाल, धर्म सिंह बिष्ट, लक्ष्मण सिंह मेहरा, कुंवर सिंह चुफाल, बसन्ती भण्डारी, गुड्डी सिजवाली, जोत सिंह चुफाल, कृपाल मेहरा, हर्षिता रौतेला बुलबुल, हयात सिंह चुफाल, हरीश चुफाल, मान सिंह चुफाल, बृजमोहन बिष्ट, विमला सांगुड़ी, निर्मला जोशी, नीरज बगडवाल, ऋतिक आर्य, मीमांसा आर्य, दया कर्नाटक, मधु सांगुड़ी, एनबी गुणवंत, विपिन बिष्ट, भुवन जोशी, लीलाधर पान्डे, भुवन तिवारी, पंकज सुयाल, हेम चन्द्र भट्ट, पूरन चंद भंडारी आदि अनेक लोग मौजूद रहे. कुमाऊं के टाइगर बलवंत सिंह चुफाल को उनकी पहली पुण्यतिथि पर पूरे पर्वतीय समाज की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि.
जगमोहन रौतेला
जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं.
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