भारत की अर्थव्यवस्था विषमताओं के अनेक दुश्चक्रोँ का सामना कर रही है. विकसित देश अपरंपरागत आर्थिक नीतियों से आतंकित कर रहे हैं. आयातित वस्तु व सेवाओं पर प्रशुल्क की दर को बढ़ा देने की धमकी मिल रही है. जोखिम और अनिश्चितता का माहौल बना है. चले आ रहे युद्ध से कई जरुरी माल और आपूर्ति की श्रृंखलाएं अवरुद्ध हैं. हमारी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में ‘विकसित भारत’ की भावना है जिसकी दीर्घकालिक आकांक्षा पूरी करने के लिए न्यूनतम 8 प्रतिशत की विकास दर बनाए रखना जरुरी है. इस सन्दर्भ में 2025 का बजट आर्थिक वृद्धि, राजकोषीय अनुशासन और जनकल्याण के बीच समन्वय के साथ सरकार की परीक्षा का सम विच्छेद बिंदु बन जाता है.
(Article by Mrigesh Pande 2025)
देश का व्यावसायिक स्वरूप तेजी से बदल चुका है. नए परिवेश में विकास प्राथमिकताओं के चयन की सूझबूझ व समझ दिखानी है. खेती के साथ विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ाना है. किये जाने वाले विनियोग से शीघ्र आपूर्ति का तालमेल बनाना है. मध्य वर्ग बढ़ गया है जिसकी उपभोग और बचत प्रवृति को विस्तार देना है. स्वायत्त हो या प्रेरित हर क्षेत्र में विनियोग बढ़ाना है तो सरकारी व्यय का सही प्रतिफल के लिए प्रवाह भी तो वित्तीय संतुलन भी देखना है अन्यथा अर्थतंत्र आतंरिक असंतुलन और वाहय असमायोजन से घिरा ही रहेगा. नीतियों का आधा अधूरापन कीमत अस्थिर करेगा. बेकारी बढ़ेगी जिससे सबसे महत्वपूर्ण मानवीय संसाधन अवशोषित ही रहेंगे. उत्पादन कम होने से व्यापार में घाटा बढ़ेगा तो भुगतान संतुलन का खतरा निरन्तर रहेगा. सही नीतियों व योजनाओं के द्वारा ही उन चुनौतियों को अवसर में बदलने की सम्भावना बनती है जो आज बजट के रूप में सामने हैं.
राष्ट्रपति ने अभिभाषण में कहा कि सरकार वैश्विक चुनौतियों के बीच अर्थव्यवस्था को नीतिगत पंगुता से उबारने के लिए मजबूत कदम उठाने जा रही है. विकास के लिए रिफार्म, परफॉर्म व ट्रांसफार्म का आधार लिया जा रहा है. प्रधान मंत्री देश के सर्वांगीण विकास की दिशा में नवाचार, समावेश और निवेश के द्वारा आर्थिक गतिविधि का रोडमैप बनाने का पक्ष रखते हैं. वित्तमंत्री आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते आशान्वित रहतीं हैं कि विवेकपूर्ण नीति प्रबंधन से आर्थिक वृद्धि 6.3 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के बीच स्थिर हो सकती है पर विनिर्माण के ढीले रुख और गिरते कॉर्पोरेट निवेश से इसके गिर कर 6.4 प्रतिशत रह जाने की आशंका भी सामने है. भारत को भविष्य में यदि महत्वाकांक्षी आर्थिक वृद्धि दर के 8 प्रतिशत पर टिके रहने का लक्ष्य हासिल करना है तो उसके लिए निवेश की वर्तमान 31 प्रतिशत की दर को बढ़ा कर सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 35 प्रतिशत करना ही होगा.आधारभूत अंतरसंरचना- भूमि, भवन, श्रम,सार्वजानिक उपयोगिताएं व सार्वजनिक सेवा वितरण क्षेत्रों, ऐआई, रोबोटिक्स, बायो टेक्नीक में लगातार विनियोग कर यह सम्भव भी होगा.
आर्थिक सलाहकार डॉ. वी अनंत नागेश्वरन भावी विकास में निजी क्षेत्र की विशिष्ट भूमिका को रेखांकित करते है जिसके लिए कॉर्पोरेट द्वारा रिसर्च व डेवलपमेंट पर विनियोग बढ़ाना जरुरी है.वह वेतन की असमानता दूर कर आय के उचित वितरण का सामाजिक दायित्व भी स्वीकारें जिससे श्रमिक को दिए जाने वाले भत्ते तो बढ़ें ही, कार्य स्थल की संस्कृति व सुरक्षा के साथ मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल भी हो जिसका सीधा प्रभाव कार्य क्षमता पर पड़ता है..कारोबार को गतिशील करने के लिए उनकी रणनीतिक सोच सुलझी व स्पष्ट हो.ज्ञान, कौशल, उपक्रम के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संयोग द्वारा प्रतिफल की दर को उन्नत करने का यह सही समय है.
(Article by Mrigesh Pande 2025)
यह ऐसा दिलचस्प दौर है जिसमें विश्व में हो रही मंदी के साथ विभिन्न देशों के बीच चल रही गुटबाजी व व्यापार समझोते तो हैं ही बड़ी ताकतों के मध्य छिड़ा हुआ युद्ध भी है.उस पर अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियों ने असंतुलन कारी धटकों को बढ़ावा देते हुए अनिश्चय की स्थिति पैदा कर दी है. प्रशुल्क बढ़ाने की उनकी धोषणा इसका एक उदाहरण है.
ऐसी परिस्थिति में देश की आतंरिक नीतियों को बहुत स्पष्ट व सुद्रढ़ बनाना आवश्यक है जिसके लिए पूर्ववत अपनाए नीतिगत निर्णयों में सुधार करने जरुरी हैं. देश का पिछला बजट आतंरिम बजट था जिसे आम चुनावों से पहले प्रस्तुत किया गया था. दीर्घ कालिक आर्थिक सुधारों की अपेक्षा स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया गया. रोजगार सृजन पर ठोस योजनाओं की कमी, कृषि व ग्रामीण विकास पर कम ध्यान, स्वास्थ्य व शिक्षा क्षेत्र के लिए अपर्याप्त फंडिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर व हरित ऊर्जा निवेश में सीमित बढ़ोत्तरी से यह स्थिरता और निरन्तरता तक ही परिसीमित रहा जिसमें मध्यम वर्ग, रोजगार, कृषि और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए अपेक्षित सुधारों की न्यूनता झलकती थी.सुस्त अर्थ व्यवस्था से राजस्व घाटा बढ़ा तो अन्य गैर -ऋण पूंजी प्राप्तियां बजट अनुमान स्तर से कम रहीं.
अब बजट में शिक्षा, अनुसन्धान व अवस्थापना में विनियोग के साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में अंतरसंरचना के निर्माण पर समुचित ध्यान दिया गया है. कौशल विकास के लिए राष्ट्रीय केंद्र की स्थापना करना और अटल टिंकरिंग लैब की पहुँच का विस्तार इसमें सम्मिलित है. चिकित्सा शिक्षा हेतु बेहतर प्रबंध व आई आई टी में सीट बढ़ाने की योजना से रोजगार सृजन की आशा की गई है. शहरी क्षेत्र व गिग मजदूरों के लिए की गई पहल अवसरों को बढ़ाने की दिशा में अच्छी पहल है.ग्रामीण भारत को समर्थ, समृद्ध और रोजगार परक बनाते हुए कहा गया है कि इस बजट से निर्धन, युवा, अन्नदाता व नारी शक्ति( जिसे संक्षेप में ‘ज्ञान’ शब्द दिया गया) को निश्चित लाभ होगा.
(Article by Mrigesh Pande 2025)
2025 के बजट में मांग और पूर्ति पक्ष को प्रभावित करने वाले तरीकों का तर्कसंगत सम्मिश्रण बनाया गया है. जैसे खेती में फसल विविधीकरण और टिकाऊ खेती के तरीकों को अपनाये जाने, फसल कटाई के बाद भंडारण बढ़ाने, सिंचाई सुविधाओं में सुधार, दीर्घकालिक व अल्प काल के ऋण उपलब्ध कराने के साथ कम उत्पादकता वाले सौ जिलों में उपज बढ़ाने पर जोर है. इसे ‘प्रधानमंत्री धन -धान्य कृषि योजना’ कहा गया है.साथ ही समुद्री उत्पाद पर कस्टम ड्यूटी कम की गई है व मछुवारों के लिए विशेष आर्थिक जोन बनाये जाने हैं जिससे एक्वा कल्चर तेजी से बढ़ सके.
भारत की कृषि लम्बे समय से विभिन्न आर्थिक, पर्यावरणीय व नीतिगत चुनौतियों का सामना कर रही है. किसानों की मांग कानूनी रूप से गारंटीकृत एमएसपी की रही. कई फसलों के लिए एमएसपी बढ़ा पर यह बाजार दर से कम ही रहा अतः किसान नुकसान में बने रहे. अकाल, बाढ़, सूखा व अनियमित मानसून जैसी समस्याएं फसलों को प्रभावित करती रहीं. ऐसे में किसानों के लिए जलवायु अनुकूल खेती की जरुरत महसूस की गई. डीज़ल, खाद, कीटनाशक और बीज की कीमतें बढ़ती रही और लघु और सीमांत किसानों के लिए तो किफायती कृषि उपकरण और उर्वरक सुनिश्चित करना चुनौती बना साथ में फिर कृषि ऋण व कर्ज संकट की समस्याएं तो थी ही. किसानों को सरकार की कर्ज माफी योजनाएँ अस्थायी राहत देती हैं, स्थाई समाधान नहीं. मण्डी और आपूर्ति श्रृंखला की कमियों में किसानों को उनकी उपज का सही दाम नहीं मिलता क्योंकि बिचौलियों का दबदबा बना है. शीत गृह व वेयरहाउसिंग की कमी के कारण फसल खराब होती रही है. कई किसान फसल बीमा योजना में शामिल नहीं हो पाते या उन्हें समय पर मुआवजा नहीं मिल पाता. फिर आपदा राशि कई बार देर से मिलती है या अपर्याप्त होती है.
यदि सरकार एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की स्पष्ट नीति बनाए व एमएसपी तय करने के लिए लागत के साथ स्वामीनाथन आयोग की संस्तुति के आधार पर पचास प्रतिशत मुनाफा लागू करे तो स्थिति संभले. कृषि ऋण सस्ते हों. छोटे व सीमांत किसानों को शून्य या न्यून ब्याज की दर पर ऋण मिले. प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए सिंचाई परियोजनाओं को अधिक बजट मिले व किसानों को सूखा-रोधी व जलवायु-अनुकूल बीज प्रदान किये जाएं. किसान सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ें जिसके लिए ई-नाम व डिजिटल मण्डी को मजबूत बनाया जाए. डीज़ल पर कृषि उपयोग के लिए छूट मिले ताकि खेती की लागत नियंत्रण में रहे.
जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए खाद आपूर्ति व इस पर मिलने वाली सब्सिडी का बढ़ना भी जरुरी है ताकि समुचित प्रोत्साहन के साथ लागत भी नियंत्रण में रहे. अभी जलवायु परिवर्तन की मार खेतिहर पर सबसे अधिक है इसलिए फसल बीमा सुधार भी चाहिये. बीमा राशि समय पर और पारदर्शी तरीके से किसानों को मिले इसके लिए डिजिटल क्लेम सेटलमेंट सिस्टम लागू होना भी आवश्यक है.
आशा थी कि कृषि क्षेत्र में ऐसे संरचनात्मक सुधार लाये जाएं जिनसे किसान कर्ज मुक्त व आत्मनिर्भर हो सकें.सरकार ने इन परिस्थितियों में प्राकृतिक व जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए दस हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया. उद्देश्य रहा किसानों को रासायनिक उर्वरकों और कीट नाशकों के उपयोग को कम करने के लिए प्रेरित करना जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हो और पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़े.
अनाज के बाद दालों के उत्पादन में स्वनिर्भर होने की पहल की गई तो फलों,सब्जियों व मत्स्य पालन को सम्मिलत करते हुए उपभोक्ताओं की बदलती रुचियां ध्यान में रख इन क्षेत्रों में पर्याप्त उत्पादन करने की योजना बनी. पोषण के मापदंड और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की भावना भी उपजी. खेती के साथ सूती कपड़े की बढ़ती मांग से कपास उत्पादन में राष्ट्रीय मिशन संचालित करने का निर्णय हुआ. साथ ही उच्च उपज वाले बीज संवर्धित करने की पहल भी की गई.बिहार में राष्ट्रीय खाद्य प्रोद्योगिकी संस्थान बनने की घोषणा की गई जिससे खाद्य प्रसंस्करण की सुविधा बढ़े व खाद्य अपशिष्ट में कमी आये. राष्ट्रीय जीन्स बैंक स्थापना से खाद्य व पोषण सुरक्षा के साथ जैव विविधता के संरक्षण की आस जगी. जलवायु परिवर्तन की मार से बचने के लिए हरित विकास को बढ़ावा देना प्राथमिकता बना जिसके लिए सरकार स्वच्छ ऊर्जा के उपभोग और घरेलू उत्पादन की अभिवृद्धि के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों का विस्तार व पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने पर योजनाओं का विस्तार करेगी.अक्षय ऊर्जा के दोहन और इलेक्ट्रिक वाहनों का समर्थन भी इसमें शामिल होगा. परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की घोषणा हुई जिससे स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में नवाचार और विनियोग हो.
(Article by Mrigesh Pande 2025)
उपर्युक्त उपाय देश की संकटग्रस्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए प्रेरक माने गए हैं जिनमें कॉर्पोरेट क्षेत्र की भूमिका नई व मुख्य रहनी है.बजट में ‘मेक इन इंडिया मेक फॉर वर्ल्ड ‘ के लिए ग्रामीण भारत को समुन्नत करने की पहल प्राथमिक महत्त्व की है क्योंकि अधिकांश क्षेत्रों के लिए यहीं से कच्चा माल प्राप्त होता है.
2025 के बजट में किसानों के लिए प्रधान मंत्री धन-धान्य कृषि योजना आई है जिसका उद्देश्य ऐसे सौ जिलों का विकास करना है जहां अभी कम फसल होती है या ऋण की दशा बेहतर नहीं है. इस योजना में किसानों को उनकी जरुरत के हिसाब से अधिक ऋण उपलब्ध कराया जायेगा. साथ ही फसल विविधीकरण को बढ़ावा देते हुए कटाई के बाद की सुविधाओं में सुधार किया जायेगा. आशा की गई है कि इससे लगभग 1.7 करोड़ किसानों को लाभ मिलेगा.किसान क्रेडिट कार्ड के ऋण की सीमा भी तीन लाख ₹ से बढ़ा पांच लाख ₹ की गई है जिससे किसानों, डेयरी किसानों और मछुवारों को वित्तीय मदद मिलेगी.भारतीय विशेष आर्थिक क्षेत्र और गहरे समुद्र से मत्स्य पालन को बढ़ाने, कपास उत्पादन के लिए मिशन और स्वदेशी यूरिया उत्पादन बढ़ाने की भी योजना है. बिहार में मखाना किसानों के लाभ के लिए एक मखाना बोर्ड स्थापित होगा जो उत्पादकों को एफ पी ओ के माध्यम से संगठित करेगा, साथ ही प्रोसेसिंग और मार्केटिंग में सुधार के साथ सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ प्रदान करेगा. इधर असम के नामरूप में एक नया यूरिया संयन्त्र स्थापित किया जायेगा जिससे किसानों की बढ़ती जरुरत पूरी की जा सके.
दाल की कीमतों में इधर हुई तेजी देखते हुए इनके उत्पादन की वृद्धि के लिए छह वर्ष का मिशन आरम्भ किया जाना है जिसमें अरहर, उड़द और मसूर जैसी दालों की खेती पर फोकस होगा. सहकारी संस्थाएं जैसे नेफेड और एनसीसीएफ अगले चार वर्षों तक किसानों से दालों की खरीद करेगी. किसानों को दाल उत्पादन के लिए अतिरिक्त समर्थन मिलेगा. दाल आयात पर निर्भरता कम करनी है.दलहन व तिलहन के उत्पादन के लिए विशेष घोषणाऐं की गईं हैं तथा सब्जियों और फलों की ढुलाई में कम कार्बन उत्सर्जन वाले परिवहन माध्यमों को बढ़ाने की बात कही गई है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुद्रढ़ बनाने में पोस्ट ऑफिस व डाक सेवकों की भूमिका ‘इंडिया पोस्ट ‘ को ‘ लार्ज पब्लिक लोजिस्टिक्स आर्गेनाईजेशन ‘ में रूपांतरित कर की जानी है
केंद्र सरकार बजट में व्यक्तिगत आय कर में भारी छूट दे कर आम जनता के हाथों में ज्यादा क्रय शक्ति दे बढ़ते उपभोग से आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने की घोषणा कर चुकी है. अब जी एस टी और प्रत्यक्ष कर संग्रह को बढ़ाने के साथ टैक्स अनुपालन सुधार की नई नीतियों की जरुरत महसूस की जा रही है ताकि राजकोष के घाटे को 4.5% तक समेटा जा सके. इसके लिए सब्सिडी व कल्याण कारी योजनाओं के व्यय पर अंकुश लगाना जरुरी है. खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करना भी जिसके कारण मुद्रा स्फीति का प्रसार होता है. अमेरिका और यूरोप की आर्थिक स्थिति, कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक मंदी भी भारत की आर्थिक स्थिति के लिए अवरोध बन रहीं हैं. इनका असर देश से होने वाले निर्यातों व विदेशी विनियोग पर पड़ रहा है.ब्याज की दरों व मुद्रा आपूर्ति को संतुलित करने के लिए रिज़र्व बैंक की नीतियों से बेहतर तालमेल भी जरुरी है.अब मौद्रिक नीति में भी परिवर्तन किया गया है जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था को मांग प्रेरित समर्थन मिले.
नए बजट में पीएम-किसान, एमएसपी, सिंचाई और फसल बीमा योजनाओं के बजट को संतुलित करना चुनौती बना तो ग्रामीण रोजगार योजनाओं (एमजीएनआरईजीए) के लिए पर्याप्त फंडिंग की जरुरत भी महसूस हुई.
रोजगार और आर्थिक वृद्धि के लिए विनिर्माण व एम एस एम ई क्षेत्र को बढ़ावा देने के साथ स्टार्ट अप और नई कंपनियों को कर राहत व निवेश प्रोत्साहन से उत्पादन को प्रेरित करने पर बल दिया गया. अर्थव्यवस्था को स्थायी मजबूती देने के लिए यह जरुरी समझा गया कि लम्बे समय से पूंजी की कमी का अनुभव कर रहे व कर्ज न मिल पाने की समस्या का सामना कर रहे छोटे और मध्यम उद्योगों को सुद्रढ़ किया जाए.अब इस क्षेत्र को सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से अधिक संसाधन देने की व्यवस्था की गई है.
(Article by Mrigesh Pande 2025)
महिलाओं तथा अनुसूचित जाति व जनजाति को ध्यान में रख स्टैंड अप इंडिया के अंतर्गत खिलौने व खाद्य प्रसंस्करण कैसे उद्योगों को विस्तार देने को प्राथमिकता भी है.श्रम प्रधान उत्पादन इकाईयों जैसे फुटवियर व चमड़े के अन्य उत्पाद के उत्पादकों के लिए विशेष योजनाओं द्वारा अतिरिक्त पूंजी जुटाने के प्रबंध हुए हैं. यह भी जरुरी समझा गया कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय को बढ़ाना है खासकर एनईपी 2020 के क्रियान्वयन और देश की गिरती स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रसंग में, तो डिजिटल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और आयुष्मान भारत योजनाओं की सार संभार भी करनी है.
कई योजनाएँ सार्वजनिक-निजी भागीदारी से चलाई जानी हैं जिनके लिए निजी विनियोग की सम्भावनाओं व राज्यों में उनके गठन पर नये समझौते होंगे. यदि राज्य पंद्रहवें वित्त आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप चलते हुए ऊर्जा उत्पादन में सुधार करते हैं तो तो उन्हें सकल राष्ट्रीय उत्पाद का अतिरिक्त 0.5 प्रतिशत उधार लेने की अनुमति होगी.
ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से आम आदमी इस बजट से बड़ी उम्मीद लगाए था. जीवन निर्वाह आ वश्यताओं को पूरा करने के लिए मंहगाई पर अंकुश लगाना था जिसके लिए सुविचारित नीति व योजना की आवश्यकता प्रतीक्षित थी. खाद्य पदार्थ, गैस, पेट्रोल व डीज़ल की कीमत में राहत नहीं होने से घर का बजट तो बिगड़ ही रहा था, उन पदार्थों की कीमत भी स्फीति के जाल में फंस रहीं थीं जिनके लिए यह कच्चा माल या इनपुट है. उपभोग का स्तर बढ़ा कर व आय में बचत की गुंजाइश होने से ही आम जन अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाने की उम्मीद संजोता है. ऐसे में कर ढांचे को गहराई से तार्किक बनाया गया और विविध आय वर्गों के हर समूह को राहत देने के लिए कर ढांचे का पुनर्गठन किया गया.
2025 के बजट की यह विशेषता रही कि इसने मध्यम वर्ग के हाथों में अब अधिक क्रय शक्ति दे दी व कर नियमों के पालन को भी सरल बना दिया. आम आदमी में खास कर मध्य वर्ग के लिए खास बदलाव की खबर कर मुक्त आय सीमा में वृद्धि रही अर्थात अब 12 लाख रूपये की वार्षिक आय आयकर मुक्त रहेगी तो वरिष्ठ नागरिकों के लिए टैक्स कटौती की सीमा दोगुनी कर एक लाख रूपये कर दी गई है. किराये पर टी डी एस की सीमा 2.4 लाख रूपये से बढ़ा कर 6 लाख रूपये कर दी गई. युवाओं के शिक्षा ऋण पर लाभ की गुंजाइश के लिए टी सी एस में छूट का ऐलान है मतलब कुछ खास वित्तीय संस्थानों से लिए गये दस लाख रूपये तक के शिक्षा ऋण पर टीसीएस नहीं लगेगा.मध्य वर्ग हाउसिंग परियोजनाओं के निर्माण में अटके हुए घर स्वामी स्कीम से भी प्रभावित हुआ जहाँ पचास हजार घर बन कर तैयार बताए गये हैं. इस योजना के दूसरे फेज में एक लाख और घर बनने का वादा है जिसके लिए पंद्रह हजार करोड़ रूपये रखे गये हैं.
उद्योग विकास व प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए कई घोषणाएं की गईं जिनमें तेजी से बढ़ते मध्य वर्ग के लिए आय कर की सीमा में पहली बार काफी राहत दी गई है जिससे उनकी क्रय शक्ति क्षमता बढ़ेगी व उपभोग में वृद्धि होगी. इससे उद्योगों के लिए समर्थ मांग बढ़ेगी.’मेक इन इंडिया’ प्रतिमान को बनाए रखने के लिए छोटे, मध्यम और बड़े उद्योगों की सहभागिता के लिए राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन की रुपरेखा बनाई गई जिसका उद्देश्य ही घरेलू उत्पादन का विस्तार और आयात पर निर्भरता को कम करना है. ‘मेक इन इंडिया’ नीति के अनुरूप, इंटरएक्टिव फ्लैट पैनल डिस्प्ले पर सीमा शुल्क को दस प्रतिशत से बढ़ा कर अब बीस प्रतिशत कर दिया गया है जबकि ओपन सेल और अन्य घटकों पर सीमा शुल्क को कम करके पांच प्रतिशत किया गया है. सूक्ष्म उद्योगों के लिए पांच लाख ₹ की सीमा वाला क्रेडिट कार्ड निर्गत करने की घोषणा है जिससे छोटे कारोबारी अपने व्यवसाय के विस्तार में वित्तीय सहायता सुविधा पा सकेंगे.
समुद्री परिवहन की सुविधा बढ़ाने के लिए तीन बिलियन डॉलर के समुद्री विकास कोष की स्थापना से पोत -निर्माण व मरम्मत उद्योग को समर्थन दिया गया है जिसमें एकावन प्रतिशत पूंजी बंदरगाहों व निजी क्षेत्र से जुटाई जाएगी व शेष सरकार वहन करेगी. साथ ही तेल रिफाइनरियों व शिपिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया के साथ मिल कर एक नई शिपिंग कंपनी बनाने की योजना है जिससे बेड़े का विस्तार हो और विदेशी वाहकों पर निर्भरता कम हो.
बजट में हवाई यात्रा की सुविधा के विस्तार पर बल है विशेषतः हवाई कनेक्टिविटी व पर्यटन की आधार संरचना को अधिक रोजगार क्षमता वाले पर्यटन क्षेत्र की पहचान व सत्कार क्षेत्र के प्रसंग में ध्यान में रखा जाना है.
बजट में मध्यम वर्ग के लिए कर कटौती जैसे अल्पकालिक उपायों पर जोर दिया गया है जबकि दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए आवश्यक संरचनात्मक सुधारों की कमी भी दिखती है जैसे कि कृषि बाजार, श्रम कानून और व्यापार विनियमों में और गहन सुधार होने चाहिए.व्यापक आर्थिक धरातल पर इस वर्ष सकल घरेलू उत्पाद की दर 6.3 से 6.8 प्रतिशत के मध्य संभावित है जबकि विकसित भारत का सुदीर्घकालिक लक्ष्य 8 प्रतिशत की वृद्धि दर पर आधारित किया गया है.
मध्यम वर्ग के लिए आय कर में व्यापक छूट से उनकी क्रय शक्ति क्षमता बढ़ेगी. छोटे धर्मार्थ ट्रस्टों को भी बजट में मजबूती दी गई है. यह चिंता भी स्वाभाविक है कि इन कर कटौतियों से कर राजस्व पर प्रभाव पड़ सकता है जो अंततः विनियोग को संकुचित करेगा.
निवेशकों का ध्यान भारतीय रिज़र्व बैंक की मुद्रा नीति पर भी रहा. देखना तो यह है कि अब रेपो रेट में जो कटौती की गई है उसका प्रभाव आम जन की क्रय शक्ति बढ़ाने में कितना समय लेता है. भारतीय रिज़र्व बैंक के नए गवर्नर संजय मेहरोत्रा ने नीतिगत दर में 25 आधार अंको की कटौती की है. अब यह तो स्पष्ट है कि इसका प्रभाव आम जन की क्रय शक्ति पर पड़ेगा ही क्योंकि नीति गत दर में की गई कटौती से उधार लेने की लागत कम हो जाती है तब कर्ज की दर भी घटतीं हैं. यहां यह ध्यान रखना है कि नीतिगत दरों में परिवर्तन करने के बाद भी एम पी सी ने अपने तटस्थ रुख को कायम रखा है. रिजर्ब बैंक ने बस एक सीमा में तरलता बढ़ाई है. पांच वर्ष के पश्चात रिज़र्व बैंक ने नीतिगत दर यानी रेपो रेट को 6.5 प्रतिशत से घटा कर 6.25 कर दिया. रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है. अब बैंकों को रिज़र्व बैंक से पहले से कम दर पर ऋण मिलेगा. अब पुराने ऋणों की मासिक किश्त कम होगी तो लोगों को उधार भी सस्ता मिलेगा. बैंकों द्वारा आम जनता को दिए जाने वाले आवास, कार व व्यक्तिगत ऋण की दरों पर इसका असर पड़ेगा. रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कमी से फ्लोटिंग रेट पर उधार लेने वालों को लाभ होगा. बैंकों के अधिकांश ऋण अभी रेपो रेट जैसे बाहरी बेंच मार्क से जुड़े हैं जिससे इसमें की गई कमी से तमाम तरह के खुदरा ऋण की ब्याज दरें कम हो जानी हैं. एक तरफ आय कर में दी गई छूट व दूसरी ओर ब्याज दर में कमी होने से क्रय शक्ति तो बढ़नी ही है.
अभी देश में शहरी मांग कमजोर है जिसके लिए ऐसे प्रोत्साहन आवश्यक थे. इन नीति गत परिवर्तनों का असर आय, उपभोग व बचत पर रातों रात नहीं पड़ता. सैद्धांतिक रूप से राजकोषीय व मौद्रिक नीति का उचित संयोग विकास की दर को स्थायित्व के साथ बढ़ाने में सक्षम होता है. व्यवहारिक रूप से आय कर की कटौती से घरेलू स्तर पर बचत महसूस होती है जिससे आमजन की खर्च क्षमता बढ़ती है जो खपत को बढ़ावा देती है. ब्याज दर कम होने से धन आपूर्ति बढ़ती है जो फिर बाजार में आपूर्ति को उपभोग के द्वारा खर्च बढ़ने से प्रोत्साहित करती है. इन सभी कारकों के मध्य एक चक्रीय संबंध है जो आय व आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकल राष्ट्रीय उत्पाद को सुधार की गति देता है. सस्ते कर्ज से यदि बाजार में मांग बढ़ती है तो यह अर्थव्यवस्था के विकास के लिए प्रेरक होता है सावधानी यह रखनी होगी कि अत्यधिक नकदी प्रवाह से पहले से संकट बनी महंगाई और अधिक न बढ़ जाए.
नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस बजट को गेम चेंजर मानते हैं जिसमें तात्कालिक व अल्पकालिक दोनों चुनौतियों को ध्यान में रखा गया है. व्यक्तिगत आय कर सुधार कर टैक्स छूट बढ़ा क्रय शक्ति में जो विस्तार होगा उससे आपूर्ति बढ़ेगी साथ ही बचत की प्रवृति बढ़ने से विनियोग बढ़ेगा.कुछ मुख्य श्रम -प्रधान क्षेत्रों जैसे कपड़ा, चमड़ा, खिलौने व खाद्य प्रसंस्करण को पुनर्जीवित कर असंगठित क्षेत्र की समस्याएं सुलझने के साथ आपूर्ति बढ़ेगी. सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों को समर्थन देते हुए साख गारंटी को दुगना करना वित्त पोषण की कई समस्याओं को सुलझाएगा जिससे ये उद्योग पनपेंगे और रोजगार सृजन में सहायक भी रहेंगे. फण्ड ऑफ़ फण्ड स्कीम के लिए दस हज़ार करोड़ ₹ की पुनः आपूर्ति और वैकल्पिक निवेश फण्ड के द्वारा स्टार्टअप के लिए घरेलू उद्यम पूंजी को विस्तार दिया गया है तो नवाचार पर खासा जोर भी. आशा की जा सकती है कि एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और जैव प्रोद्योगिकी में विनियोग से वैश्विक प्रतिद्वंदिता बढ़ेगी.
अंतरसंरचना, विकास और नवाचार के लिए की गई दो मुख्य घोषणाएं महत्त्वपूर्ण हैं जिसमें पहली तो यह कि राज्यों को अंतरसंरचना निर्माण परियोजनाओं के लिए 50 साल तक ब्याजमुक्त ऋण के रूप में 1.5 लाख करोड़ ₹ दिलाए जायेंगे और दूसरा अगले 5 वर्षों में नई परिसंपत्ति मुद्रीकरण योजना के अधीन नई अंतरसंरचना के विकास के लिए 10 लाख करोड़ ₹ जुटाए जायेंगे. राज्य पीपीपी मॉडल के अधीन प्रस्ताव बना इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट डेवलपमेंट फण्ड से केंद्र द्वारा सहायता ले सकेंगे. यह एक नया प्रयास है जिनसे सार्वजनिक-निजी सहभागिता से लम्बे समय से चल रही योजनाओं को बल मिलने की आशा बनती है.दस लाख करोड़ ₹ की संपत्ति मुद्रीकरण योजना संसाधन दक्षता बढ़ाने का दृष्टिकोण उपजाती है. साथ ही 2047 तक सौ गीगावाट परमाणु ऊर्जा विकसित करने का लक्ष्य, छोटे मॉड्यूलर रियेक्टरों पर अनुसन्धान के लिए बीस हज़ार करोड़ ₹ का आवंटन ऊर्जा परिदृश्य को आधुनिक बनाने का संकेत देता है.
सरकार राजकोषीय अनुशासन के प्रति सचेत है. राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 पर स्थिर रख आर्थिक प्रोत्साहन को विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंध के साथ संतुलित किये जाने से निवेशक यह विश्वास कर सकते हैं कि सरकार स्थाई आर्थिक प्रशासन पर निर्भरता बढ़ा रही है.घरेलू विकास को बढ़ावा देते हुए धीमी होती वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निबटने के लिए एक बेहतर रणनीति की संभावना बनाई गई है जिसमें राजकोषीय अनुशासन, कर सुधार, कृषि उत्पादकता, विनिर्माण प्रोत्साहन, वित्तीय क्षेत्र उदारीकरण और सामाजिक कल्याण पर ध्यान केंद्रित कर एक लचीली और समवेशी अर्थव्यवस्था बने.
(Article by Mrigesh Pande 2025)
बजट में सुधारों पर बहुत बल दिया गया है और परिवर्तनों की व्यापक संभावनाओं से इसे जोड़ने का आवश्यक न्यूनतम प्रयास भी. अपेक्षाओं व आशाओं को अवसरों में बदलने के मार्ग की बाधाओं को पार किये बिना इसके लक्ष्य अप्रासंगिक ही होंगे जिनमें भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का प्रबंधन सबसे जरुरी है, जी 7 देशों व अन्य एशियाई देशों की नीतियाँ अप्रत्याशित रूप से बदल रहीं हैं तो व्यापार के मुख्य साथियों में प्रशुल्क के बढ़ाने की अनिश्चितता भी. भुगतान संतुलन समायोजन के संतुलन को साधने के साथ आतंरिक समायोजन बहुत कड़ी परीक्षा लेगा. चालू खाते के घाटे को प्रबंधित करने के लिए विश्व के बाज़ारों में होने वाली मंदी व आपूर्ति श्रृंखलाओं में दिखने वाली गड़बड़ी के बीच निर्यात क्षमताओं को सुधारना होगा जिससे व्यापार का घाटा 1.2 से 2.2 प्रतिशत की सीमा में रहे. फिर बड़ी चुनौती है प्रत्यक्ष विदेशी विनियोग को आकर्षित करना जिसमें बीमा क्षेत्र को सौ प्रतिशत तक पूरा मुक्त रखा गया है जिससे निजी विनियोग का प्रवाह बढ़े.
व्यापक आर्थिक स्थायित्व को आकर्षित करने के लिए कीमतों में होने वाली वृद्धि पर नियंत्रण करना होगा जिसकी दर 4.3 से 4.4 से आगे न बढ़े.साथ ही सुदीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विनियोग को 31 प्रतिशत से बढ़ा कर 35 प्रतिशत करना होगा इन सब के साथ बेहतर और कारगर तकनीक को अपनाना अब जरुरी है. बजट में किफायती लागत पर जनरेटिव आर्टिफिशल इंटेलीजेंस को अपनाने पर जोर दिया गया है. संकल्पना है कि एआई के बुनियादी मॉडल में विनियोग करने और नियम संबंधी परिवर्तनों को लागू करने से उत्पादकता बढ़ेगी जबकि सतत मॉनिटरिंग की व्यवस्था हो.समग्र रूप से अर्थव्यवस्था का प्रभावी प्रबंधन मौद्रिक व राजकोषीय नीतियों के उचित संयोग व समन्वय पर निर्भर करता है. इस बजट में नई प्रत्यक्ष कर संहिता व अप्रत्यक्ष करों में सुधार के साथ नीतियों का युक्तिकरण समरुपता दिखा रहा है. नई कर संहिता में बहुचर्चित कर छूट के साथ स्त्रोत पर कर कटौती यानी टी डी एस और टी सी एस में सुधार से उपभोग व बचत के साथ विनियोग को प्रेरित करेंगी.
बढ़ता हुआ मुद्रा प्रसार एक ऐसी समस्या है जो इन नीतिगत सुधारों के साथ तय किये लक्ष्य को निराशा में बदल सकता है. वस्तुओं और सेवाओं की लागत में इससे वृद्धि होती दिखती है. जीवन निर्वाह वस्तुओं के साथ आम आदमी द्वारा उपयोग की जा रही वस्तुओं की कीमत लगातार बढ़ रही है पर उसके सापेक्ष लोगों की आय में वृद्धि नहीं होती. देश में आय कर देने वाले लोग लगभग आठ करोड़ हैं. जी एस टी का भुगतान करने वाली जनसंख्या इसके सापेक्ष कहीं अधिक है जो वस्तु व सेवाओं का उपभोग करती है. एक आम आदमी के रूप में हम उन कारकों पर ध्यान दे सकते हैं जो हमारी आय व उपभोग याने खर्च करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं. यहाँ सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है. सरकार की घोषणाओं से औपचारिक व अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार में कितनी वृद्धि होती है यह प्रश्न महत्वपूर्ण है. खास कर ऐसी स्थिति में जब देश दक्ष व कुशल श्रम शक्ति की दृष्टि से साधन संपन्न है. कार्य के अधिक अवसर मिलने पर ही देश में स्वयं स्फूर्ति से भरा ऐसा माहौल बनेगा जो आर्थिक व सामाजिक विषमताओं को परिसीमित कर परिपक्वता की ओर ले जायेगा.
(Article by Mrigesh Pande 2025)
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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बजट २०२५ का बहुत ही प्रासंगिक विश्लेषण किया है।