फोटो: अंकना सेन
अस्कोट में कुल क्षेत्रफल प्रति एकड़ चार आना नौ पाई राजस्व निर्धारित है जबकि कृषि भूमि पर यह दर सात आना नौ पाई है. पटवारी बाड़कोट में रहता है. स्कूल देवल में है. अस्कोट में कास्तकारी सारे कुमाऊँ से अलग तरह की है. इन पहाड़ियों में यही एक परगना है जहाँ जमींदारी परम्परा है. यह जमींदारी कई पीढ़ियों से कत्यूरी राजाओं के वंशजों के पास है जो अपने नाम के साथ ‘पाल’ लगाते हैं और जिन्हें ‘रजबार’ उपाधि मिली है. इनके बारे में कुछ जानकारी कुमाऊँ के इतिहास में दी जा चुकी है और यहाँ हमें केवल राजस्व इतिहास की चर्चा करनी है.
(Askot Riyasat History)
रजबार पीढ़ियों तक अस्कोट का राजस्व लेते रहे लेकिन बाद में चंद राजाओं से हारने के बाद उन्हें वार्षिक नजराने की शर्त पर यह अधिकार मिला. नजराना चंदों के वर्चस्व का प्रतीक था. गोरखाली विजय के समय नजराना 400 रुपया वार्षिक था जो गोरखों के समय ही बढ़ाकर 2000 रुपया कर दिया गया था और अंग्रेज हुकूमत तक राजस्व की यही दर रही. गोरखाली राज में यह रकम सम्भवतः सारे परगने से वसूल होने वाली राशि के बराबर थी. इस दौरान कोई बन्दोबस्त नहीं हुआ और ‘टंका’ नाम से वसूली होती रही. टंका एक तरह से नजराना ही है. हमारे समय में सबसे पहले बन्दोबस्त में नजराना का निर्धारण किया गया जो पहले से कम था.
पारिवारिक रिवाज ऐसा था कि बड़ा बेटा ही उत्तराधिकारी होता था और अन्य छोटे सदस्य उसी के साथ भूमिधारक होते थे. गोरखा राज में इस नियम की अवहेलना की गई और रजबार की मृत्यु पर उसके भाई व पुत्र रुद्रपाल तथा महेन्द्रपाल को उत्तराधिकारी बना दिया गया ताकि दोनों में से हरेक स्थानीय गोरखाली सेना नायक के हित में एक-दूसरे पर हमला करता रहे.
ब्रिटिश सरकार द्वारा किये गये प्रथम बन्दोबस्त में दोनों लोगों की सुलह करायी गयी और उन्हें परगने का पट्टाधारक बनाया गया. पिछले अनुबन्धों की तुलना में यह पट्टा इस मामले में अलग था कि इसमें गाँवों के नाम लिखे थे और कुल राजस्व निर्धारित किया हुआ था. राजस्व माँग का गाँववार विभाजन पूरी तरह रजबार के निर्णय पर निर्भर था और इसमें गाँव के भूमिधारक की सहमति की कोई जरूरत न थी.
(Askot Riyasat History)
दूसरे बन्दोबस्त में यही प्रणाली अपनायी गयी और तीसरे बन्दोबस्त में केवल यही फर्क रहा कि रुद्रपाल और महेन्द्रपाल के बीच व्यक्तिगत समझौते के अनुरूप रुद्रपाल की सहमति पर उसका नाम अनुबन्ध पत्र से हटा दिया गया. कालान्तर में दोनों के बीच मतभेद हो गये और रुद्रपाल ने न्यायालय में अर्जी दे दी. परिणास्वरूप वादी के पक्ष में यह निर्णय हो गया कि जैसी पहले त्रैवार्षिक बंदोबस्त में स्थिति थी उसी हिसाब के परगने की एक तिहाई रजबारी रुद्रपाल को उसके एक तिहाई हिस्से के वास्ते और तीसरा नयी खेती वाले उन गाँवों के बारे में जो महेन्द्रपाल ने अपने संसाधनों से पूर्व के तीन वर्षों में हासिल किये थे और जिनके बारे में न्यायालय ने निर्णय नहीं दिया था.
परिवार के अन्य सदस्यों ने भी रजबारी में हिस्सों का दावा किया लेकिन चूंकि इनमें से किसी भी सदस्य ने पिछली सरकार के समक्ष अधिकार का दावा नहीं किया था और न इस बाबत पिछला अनुबंध था इसलिए स्थानीय प्रचलित नियमों के हिसाब से उनका दावा खारिज कर दिया गया.
बाद में रजबारी का छोटा हिस्सा सामान्य उत्तराधिकार में तीन भाइयों- पिर्थी, सरबजीत और मोहकम को मिला. वर्ष 1832 में ट्रेल ने हैल्पिया और उसके 24 तोकों का अलग अनुबन्ध मोहकम सिंह को स्वीकृत किया जबकि देवल और उसके 83 तोक रजबारी के पट्टे में ही रहे. इस तरह की स्वीकृति को स्थानीय कानूनों ने पहले कभी मान्यता नहीं दी थी. इन नये भू-स्वामियों ने भूमिधारकों से अलग पहचान बनाने में खूब कर्ज लिया. वे ऋण में इस कदर डूब गये कि उन्हें न्यायालय में लाया गया. उन्होंने मूर्खतापूर्ण ढंग से प्रतिवाद किया.
मोहकम सिंह अपने एक रिश्तेदार की शरण में डोटी चला गया लेकिन पिरथी सिंह को पकड़ लिया गया और कुछ समय तक वह अल्मोड़ा सिविल जेल में रहा. इस कानूनी कार्रवाई का नतीजा यह हुआ कि 1843 के कोर्ट के एक निर्णय के तहत उनकी सम्पत्ति नीलाम कर दी गई और प्रमुख लेनदार कृष्णा सयाल इस सम्पत्ति का खरीदार बना. खरीदार का बडा भाई हीरालाल मुकदमे के दौरान ही आश्चर्यजनक तरीके से गायब हो गया और देनदार और उनके दोस्तों पर उसे गायब करने का हाथ होने का संदेह था. इसके बाद कृष्णा सयाल के साथ नया बन्दोबस्त किया गया और पहले से चला आ रहा राजस्व 273 रुपये ही तय किया गया लेकिन कृष्णा सयाल कब्जा लेने ही वाला था कि पिरथी और मोहकम सिंह के लड़कों ने उसका कत्ल कर दिया और खुद बचने के लिए अपने रिश्तेदारों के पास डोटी चले गये.
कृष्णा सयाल का उत्तराधिकारी नाबालिग था और कमिश्नर की सहमति से कछ समय के लिए सम्पत्ति उस रजबार के प्रबन्ध में रही जिसने मुकदमें में भाग लिया था. इस बीच प्रत्येक गाँव के संसाधनों और वहाँ खेती करने वाले ग्रामीणों के हालातों की जाँच की गई और पाया गया कि वास्तविक हल जोतने वाले लोग डोटी के आप्रवासी थे. प्राप्तियों का अनुमानित मूल्य सीर जमीन के साथ 364 रुपये था. साथ ही पारम्परिक देय ‘साग-पात’ या ‘डोला-ढेक’ और विशेष देय ‘टीका-भेंट’ तथा सामान व पालकी ले जाने की सेवाओं के रूप में था. रजबारी का हक सदैव राज-सत्ता की इच्छा पर निर्भर था और प्राचीन परम्परा से नियम यह था कि जब तक रजबार अपने घर के लोगों की समुचित जरूरतों की पूर्ति सुचारु रूप से करता रहता है तब तक अपनी सम्पदा का लाभ लेने और उसकी मात्रा तथा उसके बँटवारे में मामले में उस पर कोई बन्धन नहीं था.
वर्ष 1847 में न्यायालय के निर्णय पर यह सम्पत्ति फिर बेच दी गई और खरीदार था अल्मोड़ा कलक्ट्रेट का खजांची तुलाराम. कब्जा लेने के लिए संसाधन वह अगले साल तक जुटा पाया लेकिन 1855 में रजबार पुष्कर पाल ने इसका अधिकार वापस खरीद लिया और अब वह पूरे अस्कोट का जमींदार है. वह इन शर्तों के साथ जमींदार है कि वह लाभ के लिए खेती बढ़ा सकता है और ऐसी व्यवस्था कर सकता है जिसे वह तालुका के लाभ के लिये जरूरी समझता हो लेकिन वह स्थाई कास्तकारों के उन कब्जों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता जो गाँव के दस्तावेजों में दर्ज हों.
(Askot Riyasat History)
1886 में प्रकाशित एटकिंसन की ‘द हिमालयन गजेटियर’ का हिन्दी अनुवाद. पहाड़ पत्रिका के पिथौरागढ़-चम्पावत विशेषांक से साभार .
Support Kafal Tree
.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
पिछली कड़ी : कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे का बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व : इतिहास से…
उत्तराखंड अपनी निराली संस्कृति के लिए जाना जाता है. यहां के लोक जीवन के कई…
‘‘...हिमालय के दूर-दराज गाँव के अत्यंत विपन्न परिवार में जन्मा एक छात्र नोबेल विजेता भौतिकशास्त्री…
अल्मोड़ा के काफलीखान गांव के रवि टम्टा ने जब अपने बनाए फ्लाइंग व्हीकल "हापिडा स्काईनेक्स"…
उत्तराखंड के पहाड़ों में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक…
पिछली कड़ी : हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी कुमाऊं को विशिष्ट…