धरती गोल है और गोले में कोई बिंदु आखिरी नहीं होता. अक्सर आखिरी पहला हो जाता है. हिमालय की घाटियों में बहुत से गाँव आखिरी गाँव कहे जा सकते हैं. सबसे मशहूर आखिरी गाँव माणा है. लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा, गोले में कोई बिंदु आखिरी नहीं होता. यह गाँव है जोहार घाटी का सबसे ऊंचा गाँव, सबसे अलग थलग गाँव ल्वा. अगर सिन्धु सतह से ऊंचाई की बात करें तो यह मिलम से भी ऊंचा है, लगभग 3900 मीटर पर. जोहार घाटी में गोरी नदी की मुख्य घाटी से अलग यह गाँव पूर्वी नंदा की तरफ है. मर्तोली से गोरी की तरफ जाएँ तो मिलम आखिरी गाँव होता है लेकिन बांये निकल कर पांगर पट्टा की तरह जाएँ तो आखिरी गाँव है ल्वा. यह मर्तोली से सामने दिखता है लेकिन अब इसको इतनी दूर से ढूंढना आसान नहीं होता. Old woman in the Last Village Lvaa
जोहार घाटी में हमें ग्यारह-बारह दिन हो चुके थे. इससे पहले हम रालम से बृजगांग टॉप को पार कर इस घाटी में दाखिल हुए थे. टोला, बुर्फू, मिलम और गनघर में हमने कुछ रातें काटी और अलग अलग बुग्यालों-हिमनदों में हमारे दिन गुजरे. ल्वा मर्तोली से बहुत दूर नहीं है. हम दोपहर के बाद भात खा कर निकले थे. लगभग एक घंटे में हम ल्वा पंहुच गए. यह हमें बहुत बीरान नजर आया. कुछ ही घर साबुत बचे थे. अधिकतर खंडहर हो चुके थे.
पहली नजर में ऐसा लग रहा था कि अब यहाँ कोई नहीं रहता होगा. लेकिन गाँव में एक छोर पर एक घर से एक छोटा सफ़ेद कुत्ता भौंकते हुए आया तो यहाँ और किसी के होने का आभास हुआ. एक बुजुर्ग महिला कुत्ते के पीछे बाहर आई. मोहित करने वाली मुस्कान और मीठी जुबान में उन्होंने हमें बैठने को कहा. उनका घर बस एक कमरे का था. बाहर आंगन और एक दो क्यारियां भी हरी थी. हमने अपने आने का मकसद बताया तो उन्होंने हमारे लिए सामने का एक पुराना मकान खोल दिया. शायद यह किसी और का था जिसकी चाबी इनके पास थी. सामान रखने के बाद पानी पीकर सुस्ताये तो अम्मा ने अपनी बात बतानी शुरू की.
यह गाँव जोहार के मुख्य रास्ते से हट कर है इसलिए यहाँ लोगों का आना जाना बहुत कम होता है. आईटीबीपी की कोई स्थाई पोस्ट भी इस तरफ नहीं है इसलिए यहाँ अक्सर सुनसानी रहती है. बस कभी-कभी पर्वतारोहियों के बड़े बड़े दल इस तरफ से पांगर पट्टा जाते हैं जो पूर्वी नंदा का बेस कैम्प है. अम्मा का बेटा भी ऐसे ही एक दल के साथ पोर्टर का काम कर रहा था और कल ही पांगर पट्टा को गया था.
अम्मा बताती हैं कि किसी समय यह गाँव वैसे ही संपन्न था जैसे जोहार के बाकी गाँव. यहाँ से लोग तिब्बत तक जाते थे व्यापार के लिए. दूसरी और एक दर्रा बागेश्वर में पिंडर में खुलता है, यहां से भी लोगों का आना जाना था. समय के साथ गाँव उजड़ते चले गए. मिलम के मुख्य मार्ग के गाँव तो आज भी पर्यटकों और सेना के आने जाने से कुछ आबाद हैं लेकिन यह गाँव लगभग मिट चुका है. अम्मा बताती है कि उनकी बहू यहाँ कभी नहीं आई, आना भी नहीं चाहती. वह इसलिए आती है कि थोड़ा बहुत सेकुवा, गंद्रेंण, लाल जड़ी इकठ्ठा हो जाय और कुछ बहुत पैसे हाथ में आयें. शायद यह उनका आखिरी प्रवास हो. इस बार उनके बेटे ने दल के साथ दो फेरे लगा लिए हैं. यही उसकी आय है.
आम दिनों बहुत कम रोजगार रहता है. अभी तो उनको यहाँ अकेले रहना पड़ता है – डर क्यों नहीं लगता बाबू. बहुत लगता है कभी तो. परसों ही दस बारह भरल आ गए आंगन में. देखो उस क्यारी में मूली थी. सब चार गए. एक दिन इतना बड़ा जड्यो आ गया था. भालू भी देखे हैं एक दो बार. डर तो लगता है बाबू पर क्या करूं? गरीबी तो इनसे ज्यादा डराती है. कल बेटा पार्टी का सामन छोड़कर आएगा तो उसको पका गास तो दूंगी. शायद इस बार उसके साथ वापस धापा चली जाउंगी. इसके बाद कोई पार्टी नहीं आती. बेटे को काम नहीं मिलेगा. फिर अकेली कैसे जाउंगी. वैसे साथ है न मेरे यह (सफ़ेद कुत्ता) साथ ही सोता है. भौत हुस्यार है हाँ. एक चिड़िया भी हिले तो भौंकने लगता है.
अम्मा ने हमें इस गाँव के ग्राम देवता, जंगल, चारागाह, पानी सब चीजों के बारे में बताया. जितना वह बता सकती थी बताया. गांव के ऊपर की ओर इशारा कर उन्होंने बताया – यह जंगल है जहाँ हमारे इष्ट देवता रहते हैं. औरतें नहीं जा सकती उनके पास. तुम जाना. बर्तन पड़े होंगे उनके देखना और वहीं कहीं एक झाड़ी में एक पानी का धारा है. जब पाइप टूट जाती है मैं वहीं से लाती हूँ पानी.
इस खुश्क पहाड़ में पानी का धारा हो सकता है यह यकीन करना कठिन हो रहा था. खैर हम सामान छोड़ निकल पड़े गाँव को टटोलने. मंदिर, पेड़, पानी की सूखी टंकी सब देखे. देवता के बर्तन जो यूँ ही बिखरे पड़े थे. लेकिन कितने बदकिस्मत रह गए हमारे देवता भी. गाँव में एक ही महिला बची है और देवता को महिला से नहीं मिलना. माँ से भी कैसा परहेज होगा देवता को? अकेलापन तो इसको भी होता ही होगा. अजीब है न? नंदा की भूमि में देवता को नंदा से परहेज? खैर देवता की देवता जाने.
हमें अम्मा के बताये अनुसार झाड़ियों के बीच पानी का धारा भी खोज ही लिया. अपने लिए पांच लीटर का जार और बोतलें भर हम वापस आ गए ठिकाने पर. अँधेरा घिर आया था. अम्मा ने कहा अब तुम अपने खाने का देखो बाबू. किसी समय ऐसा था कि पूरी बरात को खिला देती आज मेरी सामर्थ ही नहीं. अम्मा की आंखे गीली हो आई. हम खाने का सामान मर्तोली से लेते आये थे. आग जलाकर पकाने की तयारी में थे कि अम्मा ने आवाज लगाई. इस बदे से कमरे के एक तरफ हम पांच लोग थे और बीच में एक चूल्हे पर हमारा खाना बनने की तैयारी थी. अम्मा अपने साथ दो जड़ मूली ले आई थी. बस इतना ही दे सकती हूँ बाबू. अम्मा से हमने उनके खाने का पूछा तो बोली कि तीन रोटी बना ली है एक मेरे कुत्ते की और दो मेरी. Old woman in the Last Village Lvaa
हमारा खाना बन रहा था इतने में बेस कैम्प से पांच- छ नेपाली मजदूर यहाँ आ गए. वह दिन में दल का सामन लेकर गए थे लेकिन ठेकेदार ने उनको कह दिया कि उनके रहने के लिए कोई टेंट नहीं है. वापस चले जाएँ. वह अँधेरे में ही पांगर पट्टा से यहाँ पंहुच गए. उनके पास थोड़ा बहुत राशन था. बर्तन भी थे. बस पानी नहीं था. सुबह बोग्द्यार से चलकर बेस तक पंहुचे थे और वापस यहाँ. बहुत थके थे और रुआंसा. हमें लगा कि कम से कम पानी लाने में तो हम इनकी मदद कर ही सकते हैं. मैंने जूते डाले, टोर्च पकड़ा और उनमें से तीन को साथ लेकर चल पड़ा पानी के लिए. लेकिन अँधेरे में साड़ी झाड़ियाँ और उनके बीच के रास्ते सामान ही लग रहे थे. घूम फिर कर वहीँ पर पंहुच जाते, लेकिन पानी नहीं मिलता.
एक मजदूर तो मुझ पर बरस पड़ा कि मैं उनके साथ टाइम पास कर रहा हूँ. मैंने उसे तसल्ली दी कि पानी मिल जायेगा. फिर मैंने थोड़ा जोर लगाकर सोचने की कोशिश की तो याद आया कि पानी के पास खट्टे तुरु चूख की झाड़ है और आसपास बहुत से नेजे बांधे हुए हैं. थोड़ी देर धैर्य से खोजने पर पानी मिल गया. सबसे पहले तो खुद पिया. जितना पी सकता था. इतना मीठा पानी कि मैं पीता चला गया. फिर बर्तन भरे और लौट आये ठिकाने पर.
रात कब गुजरी पता नहीं. सुबह उठे तो आज की मंजिल थी – ब्रह्मकमल का बगीचा. एक और अद्भुत कोना धरती का. उसकी बात फिर कभी.
हम यहाँ से लौट आये नीचे पुल पार कर वापस गाँव की ओर मुड़े तो देखा अम्मा अपनी गोद में अपने सफ़ेद कुत्ते को लिए गाँव के छोर में खड़ी हमें ही देख रही थी. हमने हाथ हिलाया उसने भी हिलाया. भारी मन से हम सामने की चढ़ाई चड़ने लगे. चढ़ाई खत्म कर हम फिर मुड़े उस गाँव की ओर. अब वह बिलकुल सुनसान था. कोई देखकर कैसे अंदाजा लगा पायेगा कि यहाँ एक जबरदस्त जीवट की अकेली बुजुर्ग रहती है. यहाँ से न इस बात का आभास हो सकता है कि इस रूखे से पहाड़ में किसी झाड़ी के बीच इतना मीठा पानी का धारा भी हो सकता है. कितने एक जैसे हैं न दोनों अम्मा और धारा.
रास्ते में अनवाल के डेरे में काली चाय पी जहाँ वह अपनी भेड़ों को शीतकाल में नीचे को लेजाने से पहले उनकी ऊन उतार रहा था. शांत बैठी भेड़ को यकीन था कि यह जो ऊन उतर रही है फिर लौट आएगी. पर मुझे यकीन नहीं था कि इस बार अम्मा नीचे उतरी तो फिर यहाँ वापस नहीं आ सकेगी. आखिरी सांस लेता यह गाँव मेरे लिए आखिरी गाँव था. भूगोल में शायद आखिरी न हो समय की रेखा में यह आखिरी था. Old woman in the Last Village Lvaa
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पिथौरागढ़ में रहने वाले विनोद उप्रेती शिक्षा के पेशे से जुड़े हैं. फोटोग्राफी शौक रखने वाले विनोद ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों की अनेक यात्राएं की हैं और उनका गद्य बहुत सुन्दर है. विनोद को जानने वाले उनके आला दर्जे के सेन्स ऑफ़ ह्यूमर से वाकिफ हैं.
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Bhot bhot pyara varnan kiya ama ka sir Swagat???
Bahut khoob ??