समाज

अर्जुन का अवतार है कुमाऊं का ऐड़ी देवता

ऐड़ी (अहेरी) कुमाऊं मण्डल का एक बहुपूजित लोक देवता है. देवकुल में इसका महत्वपूर्ण स्थान है, सैम व गोरिया के समान इसकी पूजा सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रचलित है. प्रमुख रूप से पशुचारक वर्ग का देवता माना जाता है. एटकिंसन के अनुसार दिन में घने जंगलों में छिपा रहता है और रात्रि में उल्टे पैर वाली परियों के साथ वनों तथा पर्वत शिखरों पर विचरण किया करता है. माना जाता है कि रात्रि में इसके सम्मुख जाने पर दर्शक की तत्काल मृत्यु हो जाती है. इसके सम्बन्ध में कहा जाता है कि इसकी आंखें माथे पर होती है, इसके चार हाथ होते हैं जिनमें धनुष, बाण, त्रिशूल, गाजा, (लौहदण्ड) धारण किए रहता है. यात्रा में यह पूरी सजधज के साथ पालकी में बैठकर निकलता है. जिसके साथ दो कुत्ते भी होते हैं और घड़े में घण्टी बंधी होती है जो बजती रहती है. पालकी के दायें-बायें आंचरी-चांचरी नाम की दो चुड़ैल अंगरक्षिकाएं भी रहती हैं. Airi Devta of Kumaon is Arjun Reincarnation

जागरगाथा के अनुसार ऐड़ी को महाभारत के अर्जुन का अवतार माना जाता है. ऐड़ी को तुरन्त फलदायी व वरदायी देवता माना जाता है. इसके थान में आकर निःसंतान लोग सन्तान के लिए, अन्याय से पीड़ित न्याय के लिए तथा पशुचारक पशु की रक्षा के लिए मनौतियां करते हैं. पशुचारक वर्ग का देवता होने के कारण इसी वर्ग में इसकी अधिक मान्यता पायी जाती है. पशुओं के प्रसव होने पर प्रसवा की अवधि के बाद उनके प्रथम दुग्ध को नियत रूप से इसे अर्पित किया जाता है. Airi Devta of Kumaon is Arjun Reincarnation

कभी-कभी प्रत्यक्षतः देखा भी गया है कि इसके कुपित होने पर दुधारू पशुओं के थनों से दूध के स्थान पर रक्त क्षरण होने लगता है. चैत्र तथा असोज की नवरात्रियों में इसकी पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. ऐड़ी के प्रतीक त्रिशूल व इसके बाणों के प्रतीक पाषाण खण्डों को उनके अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति नहीं छू सकता. इसकी पूजा में दूध, मीठा रोट, नारियल तथा अन्य पकवान उसे चढ़ाये जाते हैं. कभी-कभी बकरे की बलि भी दी जाती है. बकरे के माथे पर रोली का टीका लगाया जाता है और गले में माला पहनाई जाती है. Airi Devta of Kumaon is Arjun Reincarnation

प्रकृति के वैभव के बीचोबीच है ऐड़ाद्यो का मंदिर

देखिये ऐड़ाद्यो के जंगल में ऐड़ी देवता के विख्यात मंदिर की कुछ तस्वीरें (सभी फोटो: अशोक पाण्डे).

(प्रो. डी. डी. शर्मा की पुस्तक ‘उत्तराखंड के लोकदेवता’ के आधार पर)

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

पहाड़ो में भूस्खलन

उत्तराखण्ड का अधिकांश भूभाग हिमालय की पर्वतीय श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ तीव्र ढाल, गहरी नदी घाटियाँ, युवा…

2 days ago

जर्मन की लड़ाई और रुद्रनाथ की चढाई

पनार बुग्याल के ऊपरी छोर वाले रास्ते पर अब हम चल रहे हैं. पनार चोटी…

2 days ago

हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी

पिछली कड़ी : कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा : आर. डी. सनवाल सन 1928 में अल्मोड़ा…

2 days ago

हैप्पी बर्थडे कॉर्बेट साहब

जिम कॉर्बेट उन चुनिंदा विदेशी मूल के भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने भारत में…

4 days ago

28 साल के युवा से जब टिहरी रियासत डर गई

रात का वक्त था. जुलाई की बारिश पहाड़ों को भिगो रही थी, और भिलंगना नदी हमेशा…

4 days ago

दुनिया में शांतिपूर्ण आंदोलनों का संक्षिप्त इतिहास

मानव इतिहास में सत्ता के विरुद्ध विरोध उतना ही पुराना है जितना संगठित शासन. प्रारंभिक…

5 days ago