अफ्रीकी लोक-कथाएँ: 3
(एक पारम्परिक ज़ुलू लोककथा)
बहुत, बहुत साल पहले की बात है. यह इतनी पुरानी बात है जब शायद पहले आदमी और पहली औरत को धरती पर आए बहुत समय नहीं हुआ था. इसी धरती पर कहीं मान्जादाबा नाम की एक औरत अपने पति जेंजेले के साथ रहा करती थी.
वे एक पारम्परिक गाँव के एक पारम्परिक घर में रहा करते थे. उनके बहुत से बच्चे थे और ज़्यादातर समय वे बहुत खुश रहा करते थे. दिन भर वे काम करने, टोकरियाँ बुनने, खालों को रंगने, शिकार और अपने घर के नज़दीक की ज़मीन जोतने में व्यस्त रहते. कभी कभी वे नीचे समुद्र किनारे जाया करते और धूप तले रेत पर खेलते, तेज़ी से तट पर भागते, अटपटे केकड़ों पर हंसते, चिड़ियों को समुद्र में डुबकी लेता देख प्रसन्न होते और समुद्री पवन में गोते लगाते. जेंजेले के भीतर एक कलाकार का दिल था और उसे अपनी कुल्हाड़ी की मदद से लकड़ी के कुंदों और पत्थरों पर खूबसूरत चिड़ियाँ, बाघ और हिरणों की आकृतियाँ उकेरना अच्छा लगता था. मूर्तिकार जेंजेले की कलाकृतियों से उनका घर भरा रहता.
लेकिन शामों को जब सोने से पहले सारा परिवार आग के चारों तरफ बैठा करता, सभी लोग उतने प्रसन्न नहीं होते थे. बुनाई या मूर्तिकारी के लिए अँधेरा हो चुका होता था जबकि नींद के हिसाब से उतनी देरी भी नहीं होती थी. “माँ” बच्चे चिरौरी किया करते “हमें कहानियाँ चाहिए! हमें कहानियाँ सुनाओ माँ!” मान्जादाबा सोचती जाती और सोचती ही जाती कि बच्चों को सुनाने के लिए उसके दिमाग में कोई कहानी आ सके. मान्जादाबा और जेंजेले को कोई कहानी आती ही नहीं थी. उन्होंने हवा को सुना. क्या हवा उन्हें कोई कहानी सुनाने की कोशिश कर रही थी? नहीं. उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया. न कोई कहानियाँ थीं, न सपने, न ही कोई तिलिस्मी किस्से.
एक दिन जेंजेले ने अपनी पत्नी से कहा कि उसे कहानियों की तलाश में निकल पड़ना चाहिए. उसने वादा किया कि अगर वह परिवार और पड़ोसियों के लिए कहानियाँ लेकर आएगी तो वह घर पर बच्चों की देखभाल के साथ ही बाकी सारे काम भी करेगा. मान्जादाबा मान गयी. उसने अपने पति और बच्चों को चूमकर उनसे विदा ली और कहानियों की तलाश में निकल पड़ी.
मान्जादाबा ने तय लिया कि वह रास्ते में मिलने वाले हर जीव-जंतु से कहानियों के लिए निवेदन करेगी. सबसे पहले उसकी मुलाक़ात नोग्वाजा नाम के खरगोश से हुई. वह इस कदर शरारती था! लेकिन मान्जादाबा ने सोचा कि एक बार उस से पूछ लेने में हर्ज ही क्या है. “नोग्वाजा, क्या तुम कोई कहानी जानते हो? मेरे लोग कहानियों के लिए भूखे हैं!”
“कहानियाँ?” नोग्वाजा चिल्लाया “क्या बात करती हो! मुझे सैकड़ों, हजारों बल्कि लाखों कहानियाँ आती हैं!”
“कृपा करो नोग्वाजा” मान्जादाबा गिडगिडाते हुए बोली “कुछ कहानियाँ मुझे भी दो न ताकि हम भी खुश हो सकें.”
“हम्म्म्म…” नोग्वाजा बोला “फिलहाल मेरे पास कहानियों के लिए समय नहीं है. तुम देखती नहीं मैं किस कदर व्यस्त हूँ? दिन के समय कहानियाँ … वाह जी वाह!” नोग्वाजा ऊछ्लता कूदता तेज़ी से नज़रों से ओझल हो गया. मूर्ख नोग्वाजा झूठ बोल रहा था. उसे कोई कहानी नहीं आती थी.
लम्बी सांस भरकर मान्जादाबा आगे चल दी. अब उसे अपने बच्चों के साथ बैठी एक माता लंगूर नज़र आई. “ओह फे-ने! मैं देख सकती हूँ कि तुम भी एक माँ हो! मेरे बच्चे कहानियों के लिए मरे जा रहे हैं. क्या तुम्हारे पास कोई कहानी है जिसे लेकर मैं उनके पास जा सकूं.”
“कहानियाँ!” माता लंगूर हंसी “क्या मुझे देखकर तुम्हें लगता है कि मेरे पास कहानियों के लिए वक़्त होगा? हावू! अपने बच्चों को गर्म और सुरक्षित रखने के लिए मुझे इतना ज़्यादा काम करना पडता है. तुम समझती हो मेरे पास कहानियों के लिए कुछ बचता होगा? मैं खुशकिस्मत हूँ कि मेरे बच्चे आदमी के बच्चों जैसे नहीं जो ऐसी बेवकूफीभरी चीज़ों के लिए रोते हैं.”
मान्जादाबा अपनी राह चलती रही. आगे उसने एक जंगली अंजीर के पेड़ पर बैठे एक उल्लू को देखा. “ओह खो-वा!” उसने उल्लू को आवाज़ दी “क्या तुम मेरी मदद करोगे? मैं कहानियों की तलाश में निकली हूँ. क्या तुम मुझे मेरे घर ले जाने के वास्ते कुछ कहानियां दे सकते हो?”
दिन के वक्त नींद से जगाए जाने पर उल्लू बहुत खीझ गया. “कौन हल्ला मचा रहा है?” उसने गुस्सा करते हुए पूछा “मुझे परेशान क्यों कर रही हो? क्या चाहिए तुम्हें? कहानियां? कहानियों के लिए तुमने मुझे मेरी नींद से उठाने की हिम्मत कैसे की? कैसी बदतमीजी है!” ऐसा कहकर उल्लू एक दूसरे पेड़ की काफी ऊपर की डाल पर जा कर बैठ गया. उसे उम्मीद थी वहां उसे कोई तंग नहीं करेगा. और जल्द ही उसे फिर से नींद आ गयी. उदास हो कर मान्जादाबा आगे चल दी.
अब उसकी मुलाक़ात एक हाथी से हुई. “ओ दयालु न्दलोवू!” उसने कहा “क्या तुम्हें पता है मुझे कहानियां कहाँ मिल सकती हैं? मेरा परिवार कहानियों के लिए प्यासा है. हमारे पास कोई कहानी है ही नहीं.”
हाथी सचमुच दयालु था. उसने मान्जादाबा की आँखों में देखा और देखते ही उसे उस पर दया आगी. “प्रिय स्त्री!” उसने कहा “मुझे तो कोई कहानी नहीं मालूम. लेकिन मैं बाज़ को जानता हूँ. वह पक्षियों का राजा है और बाकियों से कहीं ऊंचा उड़ सकता है. क्या तुम्हें नहीं लगता कि वह तुम्हारी मदद करने में कामयाब होगा?”
“ओह दयालु न्दलोवू!” वह बोली “तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद.”
सो मान्जादाबा न्कीवाज़ी नाम के महान बाज़ की खोज में निकल पड़ी. वह उसे तुगेला नदी के मुहाने पर मिला. उत्तेजित होकर वह उसकी तरफ़ भागी. जब उसने बाज़ को पुकारा वह अपने डैने फैलाए आसमान से नीचे गोता लगाता हुआ नदी में से एक मछली पकड़ने के जतन में लगा हुआ था. “न्कीवाज़ी! न्कीवाज़ी!” उसकी आवाज़ सुनकर बाज़ इस कदर ठिठका कि उसकी चोंच में दबी हुई मछली वापस पानी में गिर गयी. आसमान का एक चक्कर लगाकर वह मान्जादाबा के नज़दीक ज़मीन पर उतरा.
“हावू!” उसने मान्जादाबा को डांटते हुए कहा “ऐसी क्या जल्दी थी कि तुम मुझे ढंग से खाना भी नहीं खाने दे रही हो?”
“ओ महान और बुद्धिमान न्कीवाज़ी!” मान्जादाबा ने बोलना शुरू किया (यहाँ आपको पता होना चाहिए कि बाज़ को दूसरों से अपनी तारीफें सुनना अच्छा लगता है. सो खुद को महान और बुद्धिमान कहे जाने पर घमंड के मारे उसने अपने पंख फुला लिए और मान्जादाबा को सुनने लगा) “न्कीवाज़ी, मेरा परिवार कहानियों के लिए भूखा है. कई दिनों से मैं कहानियों की तलाश में भटक रही हूँ. क्या तुम जानते हो मुझे कहानियां कहाँ मिलेंगी?” मान्जादाबा हताश भाव से उसकी तरफ देख रही थी.
“अच्छा!” वह बोला “हालांकि मैं खासा बुद्धिमान हूँ पर मुझे सब कुछ नहीं आता. मैं तो सिर्फ उन चीज़ों के बारे में जानता हूँ जो यहाँ धरती पर मौजूद हैं. लेकिन एक जानवर और है जो समुद्र की अंधेरी गहराइयों के रहस्यों को जानता है. शायद वह तुम्हारी मदद कर सके. मैं कोशिश करके उसे यहाँ तुम्हारे लिए बुला सकता हूँ. तुम यहीं ठहर कर मेरी पतीक्षा करो!” सो मान्जादाबा ने कुछ और दिन तक वहीं अपने दोस्त बाज़ की प्रतीक्षा की. अंततः वह वापस आया “मान्जादाबा!” वह चिल्लाया “मैं लौट आया हूँ और र्मैने अपने प्यारे दोस्त उफुन्दू इवासोल्दान्देल, जो एक समुद्री कछुआ है, को मना लिया है कि वह तुम्हें उस जगह तक ले कर जाएगा जहां कहानियां मिला करती हैं.” इसी के साथ एक विशाल समुद्री कछुए के अपना सिर पानी से बाहर निकाला.
“नमस्ते मान्जादाबा!” अपनी गहरी आवाज़ में कछुवे ने बोलना शुरू किया “मेरी पीठ पर बैठ जाओ और मेरे कवच को थामे रखना. मैं तुम्हें आत्माओं के देश ले कर जाऊँगा.” सो मान्जादाबा ने वैसा ही किया और वे समुद्र की गहराइयों को नापने निकल पड़े. मान्जादाबा आश्चर्यचकित थी. उसने अपने जीवन में ऐसी सुन्दर चीज़ें कभी नहीं देखी थीं. आखिरकार वे आत्माओं के देश पहुँच ही गए. कछुआ उसे लेकर सीधा राजा और रानी के सिंहासन तक ले कर पहुंचा. वे इस कदर राजसी थे! पहले मान्जादाबा को उनकी तरफ़ देखने में डर लगा पर बाद में वह उनके सम्मान में झुक गयी.
“सूखी धरती से आई ओ स्त्री! तुम्हें हम से क्या चाहिए?” उन्होंने पूछा.
सो मान्जादाबा ने उन्हें अपने दिल की इच्छा बतला दी.
“क्या आपके पास कुछ कहानियां हैं जिन्हें लेकर मैं अपने परिवार के पास जा सकूं?” उसने तनिक शर्मिन्दा होते हुए पूछा.
“हां!” वे बोले “हमारे पास बहुत सी कहानियाँ हैं. लेकिन हमें उनके बदले तुम क्या दोगी मान्जादाबा?”
“आपको क्या चाहिए? मान्जादाबा ने पूछा.
“दर असल हमें तुम्हारे घर और तुम्हारे परिवार की एक तस्वीर चाहिए.” वे बोले “ हम सूखे इलाके में कभी नहीं जा सकते इसलिए उसे देखना दिलचस्प होगा. क्या तुम हमारे लिए ऐसी एक तस्वीर ला सकती हो मान्जादाबा?”
“क्यों नहीं! मान्जादाबा ने जवाब दिया. “मैं ऐसा कर सकती हूँ. बिलकुल कर सकती हूँ. धन्यवाद!”
सो मान्जादाबा कछुए की पीठ पर सवार होकर वापस किनारे पहुँची. उसने कछुए को शुक्रिया कहा और अगली पूर्णिमा को तस्वीर लेकर उस से उसी जगह मिलने का वादा भी किया.
मान्जादाबा ने अपने परिवार को अपनी यात्रा और उस दौरान हुए अनुभवों के बारे में बतलाया. जब वह अपने अनुभवों के अंत पर पहुँची तो उसका पति खुशी से उछल पड़ा. “मैं कर सकता हूँ ऐसा. उनकी कहानियों के बदले उन्हें जो तस्वीर चाहिए उसे मैं उकेर सकता हूँ!” ऐसा कहने के साथ ही वह तस्वीर बनाने में जुट गया.
मान्जादाबा को अपने पति और उसकी कुशल उँगलियों पर गर्व था. वह देखती रही कैसे उसके पति की उँगलियों की मदद से तस्वीर जीवंत हो उठी थी. तस्वीर में उनके परिवार के सदस्य, उनका घर और उनका गांव थे. जल्दी ही लोगों को मान्जादाबा की यात्रा और आत्माओं द्वारा कहानियां दिए जाने के वादे के बारे में पता चल गया. वे सब भी जेंजेले की तस्वीर को बनता हुआ देखने आने लगे. जब पूर्णिमा आई तो जेंजेले का काम पूरा हो गया था. उसने बहुत सावधानी से तस्वीर को मान्जादाबा की पीठ पर बाँध दिया. वह कछुए की पीठ पर सवार हुई और वे चल दिए आत्माओं के देश. तस्वीर देखकर राजा और रानी बहुत खुश हुए. उन्होंने जेंजेले की कला की बहुत तारीफ की और उसके लिए उपहार के बतौर सुन्दरतम सीपियों से बना एक हार मान्जादाबा को दिया. उसके बाद वे मान्जादाबा से मुखातिब हुए. “तुम्हें और तुम्हारे परिवार को हम कहानियों का तोहफा दे रहे हैं.” उन्होंने मान्जादाबा को इतना बड़ा शंख दिया जैसा उसने कभी देखा तक नहीं था. “जब भी तुम्हें एक कहानी की ज़रूरत हो” वे बोले “इस शंख को अपने कानों से लगाना और तुम्हें कहानी मिल जाएगी.” इस दयालुता के लिए राजा और रानी को धन्यवाद कहकर मान्जादाबा वापस अपने संसार लौट आई.
जब वह किनारे पर पहुँची, उसका परिवार और गाँव के सारे लोग वहां मौजूद थे. उन्होंने एक बड़ी सी आग जलाई और चिल्लाकर बोले “हमें एक कहानी सुनाओ मान्जादाबा! कहानी सुनाओ!”
सो वह नीचे बैठी, उसने शंख को अपने कान पर लगाया और बोलना शुरू किया: “एक बार की बात है …”
अंग्रेज़ी से अनुवाद: अशोक पाण्डे
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