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4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – नवीं क़िस्त
पिछली क़िस्त का लिंक: सबसे मुश्किल है अच्छा इंसान बन पाना
चलो आज मैं तुम्हें अपने उस ‘सीक्रेट‘ के बार में बताती हूं जिसका जिक्र मैंने इस खत के शुरू में किया था. ये बात पूरे परिवार में सिर्फ मेरे और तुम्हारे पिता के बीच ही है. मेरी शादी के कुछ ही समय बाद तुम मेरे गर्भ में आ चुके थे और पहले ही माह में मैंने अपना गर्भपात करा लिया था. मुझे न तो इसके लिए कोई अफसोस है न ही अपराधबोध. क्योंकि मैंने कोई जीवहत्या नहीं की. तुममें जीवन आया ही कहां था तब तक…तुम सिर्फ टेनिस की बॉल जितने एक मांस के एक टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं थे. असल में इतनी जल्दी बच्चा करके मैं हमारे साथ के खूबसूरत और आजादी से भरे समय को जल्दी ही खत्म नहीं करना चाहती थी. यूं तो हर इंसान और शायद जानवरों के लिए भी आजादी बहुत कीमती है. पर एक लड़की के लिए आजादी… क्या कहूं, जैसे बिना पंखों के उड़ पाना!… जैसे गड़ा खजाना मिल जाना!
पहले ही महीने के अंतिम दिन मेरे लिए इतने मुश्किल बना दिये थे तुम्हारी उपस्थिति ने, कि मैं बता नहीं सकती मेरी जान. लगभग एक सप्ताह उल्टियों का जो दौर चला वो किसी भी दवाई से रुका नहीं. खाना खा पाना तो दूर पानी भी यदि पेट में रुक जाता तो बड़ी बात थी. कई दिनों तक लगातार पेट खाली होने के कारण फिर गैस का दर्द. ऐसा भयानक दर्द था वो मेरी बच्ची, कि मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती. रात भर दर्द के मारे मैं उकडू बैठी रही थी, सोचो जरा उस वक्त क्या मुझे तुम पर जरा सा भी प्यार या तरस आ सकता था? नहीं न,…आया भी नहीं था. फिर डॉक्टर से मिल के मैंने गर्भपात की दवा ली. शायद लगभग एक महीने तक (ठीक से याद नहीं) मुझे ब्लीडिंग होती रही थी. लेकिन फिर भी तुम्हारा जाना, तुम्हारे होने से कम दुखदाई था!
उसी खून के न रुकने वाले रिसाव के साथ मुझे किसी काम से बाड़मेर जाना था. वहां एक रात मैं ‘कलाकारों की बस्ती‘ में रुकी थी. ये एक ऐसी बस्ती है, जहां रहने वाले पुश्तैनी रूप से गाते-बजाते हैं. जिनके छोटे-छोटे बच्चे भी अदभुत गाते हैं. गीत-संगीत उनके खून में है. उस बस्ती में मैं जिनके यहां रुकी थी, वहां टायलेट नहीं था. किसी और के घर में जा के मुझे टायलेट इस्तेमाल करना पड़ा था. उस टायलेट में रोशनी का साधन सिर्फ सड़क के खंबे पर लगे बल्ब की रोशनी थी, जो कि टायलेट के दरवाजे की दरार से छनकर आ रही थी. मोमबत्ती, लैंप या लालटेन भी नहीं थी उनके यहां. मैंने पेशाब किया ही था कि कुछ पल में मेरे निचले हिस्से से मांस की बदबू आने लगी. बदबू इतनी तेज थी कि उसके चलते मुझे अपनी नाक दबानी पड़ी. फिर अचानक से महसूस हुआ कि जैसे मेरे भीतर से कुछ खुद-ब-खुद बाहर आ रहा है, मांस की बदबू और बढ़ गई थी.
रौशनी न होने से मेरी घबराहट बढ़ रही थी. मुझे लगा कि मैं बाहर आने वाली उस चीज को अपने हाथ से पकड़ लूं, ताकि उंगलियों की छुअन से मैं उसे देख सकूं, महसूस कर सकूं. फिर अचानक से खून और मांस की बदबू के तेज गुबार के साथ, टेनिस की गेंद जैसा कुछ मेरी हथेली में आकर गिरा, जिसे गिलगिले और लिजलिजे अहसास के कारण मेरी हथेली ने तुरंत फेंक दिया! वो शायद मेरे सामने ही पड़ा था, पर मैं उसे देख नहीं पा रही थी.
रौशनी के बिना अपनी सिक्स बाई सिक्स की आईसाइट के बावजूद मैं पूरी तरह अंधी थी! रौशनी की जितनी कमी मुझे उस पल खली थी बेटू, उतनी अभी तक की जिंदगी में कभी महसूस नहीं हुई. टायलेट के दरवाजे को जरा सा और खोलकर रौशनी की पतली सी लकीर में मैंने, उस गेंद जैसी चीज को देखने की भरसक कोशिश भी की थी…पर संभव नहीं हुआ. फिर जल्दी ही उंगलियों से टटोलकर मैंने उस बेहद बदबूदार, गिलगिली और खून में सनी गेंद को टायलेट में लुढ़का दिया! अपराधबोध, गिल्ट या ऐसे किसी भी अहसास ने मुझे नहीं छुआ; जो कि ऐसे मौकों के लिए लड़कियों के अंदर भरे जाते हैं, दबा-दबाकर ठूंसे जाते हैं!
मैं खुश थी. मैंने कुछ भी नहीं खोया था, न वर्तमान, न भविष्य, न ही सपने, न इच्छाएं, कुछ भी तो नहीं. ऐसा सिर्फ इसलिए हो सका कि मैंने ये बात परिवार में किसी को भी नहीं बताई. यदि बता देती, तो मेरे मायके और ससुराल में अच्छा-खासा बवंडर खड़ा हो जाता. ऐसा नहीं है मेरे बच्चे, कि मुझे ये सब छिपाकर बहुत खुशी मिली. लेकिन बात ये है मेरी जान, कि सच को बर्दाश्त करने या उसके स्वीकारने की आदत नहीं है यहां किसी को. मेरा दृ़ढ़ विश्वास है कि जब तक इस समाज में सच सुनकर उसे स्वीकार करने और बर्दाश्त करने की आदत नहीं पनपेगी तब तक झूठ की संख्या बढ़ती ही रहेगी.
पता है मेरी ब्लडिंग उसके बाद भी नहीं रुकी थी. मैं उस वक्त बाड़मेर के किसी गांव में थी, आखातीज के दिन होने वाले बाल-विवाह देखने के लिए. मेरे नैपकिन खत्म होते जा रहे थे और खून बहना रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था… और फिर नैपकिन खत्म हो ही गए. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. मेरे पास उन लोगों से (जहां मैं ठहरी थी) कपड़े मांगने का विकल्प भी नहीं था. वह काफी गरीब परिवार था, जिनके पास पहनने के लिए बेहद लिमिटेड कपड़े थे, फिर पीरियड के लिए एक्सट्रा कपड़े की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी. मैं ऐसी जगह थी जहां लड़कियां एक ही कपड़े को धो-धोकर सालों तक पीरियड्स में इस्तेमाल करती थी, जब ताकि वो फट न जाए, गुम न हो जाए या कोई दूसरी लड़की/औरत उसे चोरी न कर ले जाए! मेरे पास अपनी काली सूती चुन्नी को फाड़ने से अलग कोई विकल्प नहीं था. उस काली सूती चुन्नी को फाड़ते वक्त मेरा दिमाग कितना शांत था.
ये सब पढ़कर तुम डर गई हो न मेरी जान? डरो मत, ये दोबारा नहीं होगा. इस बार अभी तक इतना दबाव मेरे ऊपर है कि मैं ऐसा करने का सपने में भी नहीं सोच सकती… अब तुम जरूर पूछोगी कि यदि मेरे ऊपर दबाव न हो तो, तो मैं कोशिश करती कि ऐसा करने की नौबत ही न आए. देखो मैं तुम्हें बता चुकी कि अभी तक मुझे मां बनने का मन नहीं है. क्या इस कारण कि एक लड़की मां नहीं बनना चाहती उससे घृणा की जानी चाहिए? उसे दोषी ठहराया जाना चाहिए? क्या सिर्फ एक बच्चा न दे पाने के कारण, समाज को दिया गया मेरा सारा योगदान बेकार है?… व्यर्थ है? क्या मुझे अपने शरीर, दिल, दिमाग और जीवन को पूरी तरह प्रभावित करने वाली चीज के बारे में निर्णय लेने का पूरा अधिकार नहीं होना चाहिए रंग? क्या ये अधिकार सिर्फ और सिर्फ मेरा ही नहीं होना चाहिए कि मैं मां बनना चाहती हूं या नहीं? बनना चाहती हूं तो कब…? कितनी बार…? और किसके बच्चे की…? मुझे अपनी लिखी कविता याद आ गई…
जितनी बार ‘वे‘ चाहे
उतनी ही बार
भर-भरकर
रीतती रहती हैं
स्त्री ‘खूंटे के बंधी‘ नाव होती है!
उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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